जो नेता तमिलनाडु जैसे द्रविड़ राजनीति के गढ़ में भगवा झंडे को अकेले अपने दम पर लहराने का दम रखता था... जिसे बीजेपी आलाकमान तमिलनाडु में पार्टी का भविष्य कहता था... जिसने महज 3 साल में पार्टी का वोट बैंक 3% से खींचकर सीधे 11% के पार पहुंचा दिया... आज उसी चमकते सितारे ने बीजेपी लीडरशिप को अपना इस्तीफा सौंप दिया है!
राजनीति के गलियारों से यही सनसनीखेज खबर आ रही है कि अन्नामलाई अब अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने जा रहे हैं! लेकिन इस सब्जेक्ट पर अपनी राय बनाने से पहले रुकिए... क्या अन्नामलाई ने खुद पार्टी छोड़ी है, या उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर इस कदर साइडलाइन कर दिया गया कि उनके पास इसके अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा था? 2021 में अध्यक्ष बनाए गए अन्नामलाई ने 'एन मन एन मक्कल' आंदोलन किया, जिससे 2024 के लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन हुआ, लेकिन उसके बाद उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। यहां तक कि विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट तक नहीं दिया गया? आज हम इस महा-विस्फोट का इन-डेप्थ पोस्टमार्टम करेंगे। क्योंकि खेल जो दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा गहरा है!
कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। साल 2020 में एक बेहद कड़क और ईमानदार छवि वाले आईपीएस अधिकारी खाकी वर्दी छोड़कर राजनीति में आते हैं, जिनका नाम है के. अन्नामलाई। तमिलनाडु की राजनीति, जहां सालों से डीएमके और एआईएडीएमके का एकछत्र राज था, वहां बीजेपी को कोई गंभीरता से नहीं लेता था। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर महज 3.7% था, लेकिन जब अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तो उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति का व्याकरण ही बदल कर रख दिया।
सवाल यह उठता है कि आखिर 3% से 11% तक का यह सफर तय कैसे हुआ? अन्नामलाई ने एसी कमरों में बैठकर प्रेस रिलीज जारी करने वाली राजनीति को किनारे किया और खुद को सड़कों पर झोंक दिया। उन्होंने 'एन मन एन मक्कल', मेरी जमीन, मेरे लोग नाम से एक ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की और तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों की खाक छानी। जब राज्य में बीजेपी के बड़े नेता आराम कर रहे थे, तब यह पूर्व आईपीएस तपती धूप में गांव-गांव जाकर जनता से सीधा संवाद कर रहा था। इतना ही नहीं, उन्होंने सत्ताधारी डीएमके की नींद उड़ाने के लिए आक्रामक रुख अपनाया और 'DMK Files' नाम से एक सीरीज़ लॉन्च कर दी। इसके जरिए डीएमके के मंत्रियों के कथित भ्रष्टाचार, ऑडियो टेप्स और बेनामी संपत्तियों के कच्चे चिट्ठे सरेआम प्रेस कॉन्फ्रेंस में खोले गए। जिस राज्य में बीजेपी को सिर्फ 'हिंदी बेल्ट की पार्टी' कहकर खारिज कर दिया जाता था, वहां अन्नामलाई ने बीजेपी के इस ठप्पे को मिटाने के लिए तमिल अस्मिता, संगम साहित्य और 'तिरुक्कुरल' का जमकर इस्तेमाल किया। उन्होंने द्रविड़ राजनीति को उसी की भाषा में करारा जवाब दिया। पत्रकारों के तीखे और मुश्किल सवालों का निडरता से सामना करने वाले उनके वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैले। इसी अथक संघर्ष, जमीनी पसीने और 'सिंघम' वाली निडर छवि का नतीजा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में, भले ही सीटें नहीं आईं, लेकिन बीजेपी का वोट शेयर इतिहास में पहली बार उछलकर सीधे 11.4% पर पहुंच गया! राजनीतिक पंडित चौंक गए कि द्रविड़ लैंड में बीजेपी इतनी तेजी से कैसे पैर पसार रही है।
अब आता है कहानी में वो ट्विस्ट, जिसने अन्नामलाई को बगावत के रास्ते पर धकेल दिया। अन्नामलाई का विजन साफ था, वो पॉलिटिक्स में शॉर्टकट नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि बीजेपी को तमिलनाडु में बिना किसी बैसाखी के, यानी बिना एआईएडीएमके के साथ गठबंधन किए, अपने दम पर जमीन मजबूत करनी चाहिए। वो राज्य में एक 'थर्ड फोर्स' बनना चाहते थे। लेकिन दिल्ली में बैठे बीजेपी के रणनीतिकारों को लगा कि अकेले लड़ने का ये प्रयोग बहुत लंबा वक्त लेगा। जैसे महाराष्ट्र, बिहार जैसे राज्यों में स्थानीय पार्टी के साथ काम किया और फिर खुद ही सबसे बड़ी पार्टी बन गई, कहने का मतलब यह है कि बीजेपी लीडरशिप को तुरंत चुनावी फायदा चाहिए था। इसलिए, दिल्ली हाईकमान ने अन्नामलाई की लाइन को खारिज करते हुए दोबारा एआईएडीएमके के साथ गठबंधन कर लिया, और इसी मतभेद की गाज खुद अन्नामलाई पर गिरी। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया।
हद तो तब हो गई जब इस कद्दावर नेता को हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में टिकट तक नहीं दिया गया, उन्हें पूरी तरह से चुनावी मैनेजमेंट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया! जिस नेता ने पार्टी को खून-पसीना देकर 11% वोट दिलाया, उसे किसी दूसरी पार्टी को साथ लेने के लिए अचानक हाशिए पर धकेल दिया गया। इसके बाद फरवरी 2026 में अन्नामलाई ने अपने पिता की खराब सेहत का हवाला देकर चुनाव प्रभारी पद छोड़ दिया, और 11 फरवरी 2026 को उनका नाम विधानसभा चुनाव प्रबंधन समिति से भी गायब मिला, तो उनको सबसे बड़ा झटका लगा।
बीजेपी के दिल्ली वाले चाणक्यों ने जो कैलकुलेशन की थी, वो नतीजों में ताश के पत्तों की तरह ढह गई। अन्नामलाई को साइडलाइन करके जिस एआईएडीएमके के भरोसे बीजेपी नैया पार लगाना चाहती थी, वो दांव उलटा पड़ गया। अन्नामलाई के हटने से जो युवा और न्यूट्रल वोटर्स बीजेपी से जुड़े थे, वो छिटक गए। नतीजा यह हुआ कि बीजेपी का वोट शेयर वापस गिरकर महज 3% के आसपास सिमट गया! इसी दौरान तमिलनाडु की राजनीति में एक और एंट्री होती है सुपरस्टार जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके की। जो युवा वोटर कभी अन्नामलाई के 'सिंघम' वाले अंदाज को देखकर विकल्प की तलाश में थे, उन्हें विजय के रूप में एक नया चेहरा मिल गया। यानी बीजेपी की एक गलत रणनीति ने उसे राज्य में सालों पीछे धकेल दिया।
अपमान और साइडलाइन किए जाने का यह घूंट पीने के बाद, इस पूर्व आईपीएस ने आखिरकार अपना फैसला ले लिया। दिल्ली में उन्होंने अपना 5 पन्नों का इस्तीफा BJP अध्यक्ष नितिन नबीन को सौंप दिया। पार्टी सचिव BL संतोष से मुलाकात के दौरान अन्नामलाई ने अच्छे संबंधों के साथ पार्टी से अलग होने की इच्छा जताते हुए कहा कि वह अब अपना रास्ता खुद बनाना चाहते हैं। भले ही इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन अन्नामलाई चुप बैठने वाले नेताओं में से नहीं हैं। वो अपने जन्मदिन पर एक आंदोलन की घोषणा करेंगे और अगले कुछ महीनों में अपनी एक नई क्षेत्रीय पार्टी लॉन्च करने जा रहे हैं! द्रविड राजनीति का गढ़ रहे तमिलनाडु में भाजपा के राष्ट्रवाद की लहर नहीं चल पा रही है, तो अन्नामलाई की नई पार्टी की आइडियोलॉजी बेहद दिलचस्प होने वाली है। यह न तो पूरी तरह से द्रविड़ियन होगी और न ही पारंपरिक हिंदुत्व की लाइन पर चलेगी। यह होगी 'तमिल-फर्स्ट' और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली पार्टी! यानी अन्नामलाई सीधे उन युवाओं को टारगेट करेंगे जो डीएमके और एआईएडीएमके से तंग आ चुके हैं और जिन्हें बीजेपी में बाहरी होने का अहसास होता है।
वास्तव में देखा जाए तो के. अन्नामलाई का बीजेपी से जाना तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में पार्टी के 'साउथ मिशन' के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। एक तरह से देखा जाए तो भाजपा ने दक्षिण के अपने सबसे बड़े सुपर स्टार को खो दिया है, जो दक्षिण भारत से होकर पूरे देश में पार्टी के लिए बहुत बड़ा जनाधार बनाने की कुव्वत रखता है। ऐसा लगता है कि भाजपा का आलाकमान प्रदेशों में पनपने वाले अपने सुपर सितारोंं से डर जाता है, उनका दबाने का प्रयास करता है और इस चक्कर में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। इस बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या अपनी ही पार्टी के बड़े जनाधार वाले नेताओं को साइडलाइन करना बीजेपी की पुरानी गलती है, या फिर दिल्ली के आलाकमान का क्षेत्रीय क्षत्रपों से डरने का कारण है? क्या अन्नामलाई तमिलनाडु में अलग पार्टी बनाकर वो करिश्मा कर पाएंगे जो वो बीजेपी में रहकर करना चाहते थे? क्या जोसफ विजय को काउंटर करके अगले लोकसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार जिता पाएंगे? क्या अन्नामलाई का बीजेपी छोड़ना सही फैसला है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।

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