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अमित शाह की रणनीति को हर कोई नहीं समझ सकता!


क्या देश में चल रही सांसदों की ऐतिहासिक उछल-कूद महज़ दलबदल का खेल है, या फिर इसके पीछे साल 2029 के आम चुनाव से पहले हिंदुस्तान का पूरा सियासी नक्शा बदलने की एक बहुत बड़ी क्रोनोलॉजी छिपी है? मॉर्डन पॉलिटिक्स में अमित शाह की स्ट्रेटिजी को समझना हर किसी के बस की बात नहीं है। 14 जून को टीएमसी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों का अचानक नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी में विलय हो जाना, उसके तुरंत बाद शिवसेना उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसदों की बगावत की खबरें आना, इससे पहले 24 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों का पाला बदल लेना और सपा के सांसदों में भी खलबली की खबरों में विपक्ष के महा-बिखराव के पीछे का असली खेल क्या है? आखिर तीसरी बार गठबंधन सरकार चला रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में इतने सांसदों का साथ क्यों चाहिए? आज हम राजनीति के चाण्क्य अमित शाह के उस गुप्त मिशन को डिकोड करेंगे, जिसने भारतीय संसद के भीतर दो-तिहाई बहुमत की एक नई जंग को जन्म दे दिया है।

इस पूरे सियासी ड्रामे की कड़ियां जुड़ती हैं 16 से 18 अप्रैल 2026 के उस दौर से, जब मोदी सरकार लोकसभा में 3 बेहद महत्वपूर्ण विधेयक लेकर आई थी। तब सरकार संसद में हार गई थी, लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा था कि चाण्क्य इस खेल को बहुत अच्छे से समझते हैं। सरकार का तर्क था कि साल 2029 के चुनाव तक महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए ये कानून पारित होने जरूरी हैं। इसी कड़ी में एक बेहद महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक 131वां संविधान संशोधन विधेयक था। इस बिल के तहत देश में नया डिलिमिटेशन करके लोकसभा की अधिकतम सीटों को 550 से बढ़ाकर सीधे 850 करने और संविधान के आर्टिकल 81 और 82 में बड़े बदलाव करने के प्रावधान शामिल थे, लेकिन किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत, यानी सदन में मौजूद और वोटिंग करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन अनिवार्य होता है।

अप्रैल में जब इस ऐतिहासिक बिल पर वोटिंग हुई, तो लोकसभा में कुल 528 सांसद मौजूद थे। दो-तिहाई के कड़े गणित के हिसाब से इस बिल को पास कराने के लिए सरकार को न्यूनतम 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन जब वोटिंग मशीन का बटन दबा, तो सरकार के पक्ष में महज़ 298 वोट पड़े और विरोध में 230 वोट आ गए। नतीजा यह हुआ कि लोकसभा सीटें बढ़ाने वाला यह डिलिमिटेशन बिल सिर्फ 54 वोटों के फासले से संसद में गिर गया। फिर भी सरकार इस मोर्चे पर कदम पीछे खींचने वाली नहीं है। इस बिल को आगामी मानसून सत्र में दोबारा लाने की पूरी तैयारी है, और इसीलिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा जुटाने के लिए विपक्षी सांसदों को जोड़ने की यह भारी कवायद चल रही है। खुद एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी टीडीपी के प्रमुख और आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने 15 जून को साफ दावा किया है कि केंद्र सरकार जल्द ही डिलिमिटेशन बिल को दोबारा पेश करेगी, क्योंकि महिला आरक्षण और परिसीमन का पहिया साथ-साथ ही आगे बढ़ेगा।

आइए अब समझते हैं कि इस जोड़-तोड़ के बाद संसद के भीतर सीटों का नया सांख्यिकीय समीकरण क्या बन रहा है? साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने दम पर 240 सीटें मिली थीं और एनडीए सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा बहुमत से 20 ज्यादा, यानी 292 पर टिका था। लेकिन 14 जून को टीएमसी की काकोली घोष दस्तीदार समेत 20 लोकसभा सांसदों के एनडीए समर्थित धड़े में शामिल होने से बीजेपी गठबंधन का नंबर 292 से उछलकर सीधे 312 पर पहुँच गया। अब यदि महाराष्ट्र में उद्धव गुट के बागी 6 सांसद भी एनडीए सहयोगी शिवसेना में शामिल हो जाते हैं, तो लोकसभा में एनडीए की कुल ताकत 318 हो होगी। हालांकि, दो-तिहाई के 362 वाले पूर्ण आंकड़े को छूने के लिए सरकार को अभी भी करीब 44 और सांसदों की जरूरत होगी। इसके लिए बीजेपी की नजर तमिलनाडु की 22 सांसदों वाली डीएमके और 3 सांसदों वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा पर टिकी है। भले ही डीएमके के सूत्र बीजेपी को समर्थन देने से इनकार कर रहे हों, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों के बीजेपी के संपर्क में होने की खबरें सियासी गलियारों में आम हैं।

यही खेल राज्यसभा में भी चल रहा है। राज्यसभा की कुल 244 सीटों में से एनडीए के पास शुरुआत में 138 सांसद थे। अप्रैल में आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने से बीजेपी की अकेले की संख्या 106 से बढ़कर 113 हुई और एनडीए 145 पर पहुँच गया। जून में हुए राज्यसभा चुनाव में अतिरिक्त सीटें जीतने और पश्चिम बंगाल से टीएमसी के 3 राज्यसभा सांसदों सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बरैक के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों को जीतकर एनडीए का यह आंकड़ा उच्च सदन में 154 तक पहुँच सकता है। इसके बाद भी राज्यसभा में दो-तिहाई के लिए जरूरी 10 सीटों का फासला पाटने के लिए सरकार को वाईएसआर कांग्रेस 4 सीटें और बीजू जनता दल 5 सीटें जैसे गैर-गठबंधन दलों के समर्थन या फिर विपक्षी सांसदों की वोटिंग के दौरान गैर-मौजूदगी की जरूरत पड़ेगी। हालांकि, सरकार के लिए नवंबर में उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनाव एक चुनौती साबित हो सकते हैं, जहाँ समाजवादी पार्टी अपनी बेहतर विधानसभा स्थिति के चलते एनडीए का गणित बिगाड़ने की ताकत रखती है।

यहाँ सबसे बड़ा नीतिगत और गंभीर सवाल यह है कि इस परिसीमन बिल को लेकर देश के भीतर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हो गया है? गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में जो फॉर्मूला समझाया था, उसके मुताबिक यदि लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 की जाती हैं, तो सारे राज्यों में सीटें आनुपातिक रूप से बढ़नी चाहिए। यानी अगर वर्तमान में तमिलनाडु के पास 39 सीटें हैं, तो नई लोकसभा में भी उसकी हिस्सेदारी 61 सीटें होनी चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि इस डिलिमिटेशन बिल में आनुपातिक रूप से सीटें बढ़ाने की गारंटी देने वाला कोई कानूनी प्रावधान शामिल नहीं है। इसके विपरीत, हमारा संविधान का अनुच्छेद 81 स्पष्ट कहता है कि संसद में सीटों का आवंटन राज्यों की जनसंख्या के अनुपात में होगा। चूंकि सरकार ने परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना को ही आधार बनाने का फैसला किया है, इसलिए उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक बहुत बड़ी खाई पैदा होने जा रही है।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश को यह गहरी चिंता सता रही है कि उन्होंने पिछले दशकों में देश की जनसंख्या नियंत्रण नीतियों का पूरी तरह पालन किया है, इसलिए जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन में उन्हें सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा और देश की राष्ट्रीय नीतियों में उनका राजनीतिक दबदबा हमेशा के लिए घट जाएगा। यही वजह थी कि साल 1976 और 2001 में भी देश की एकता को बनाए रखने के लिए परिसीमन को टाल दिया गया था। इसके विपरीत, इस नए परिसीमन से उत्तर भारत के हिंदी भाषी उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश को सीटों का बंपर फायदा मिलने जा रहा है, और ये वो राज्य हैं जहाँ बीजेपी का सबसे मजबूत होल्ड माना जाता है।

आंकड़ों के चश्मे से देखें, तो लोकसभा की सीटें 850 होने के बाद बहुमत का नया जादुई आंकड़ा 426 हो जाएगा। यदि बीजेपी साल 2019 का अपना ऐतिहासिक प्रदर्शन दोहराती है, तो उसे केवल इन 8 हिंदी भाषी राज्यों से ही रिकॉर्ड 299 सीटें मिल जाएंगी, जो बहुमत के आंकड़े का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा होगा। इसके साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक जैसे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में अपने पुराने प्रदर्शन के दम पर बीजेपी महज़ इन 12 राज्यों के सहारे अकेले ही 426 के बहुमत के आंकड़े को पार कर सकती है। यहाँ तक कि अगर बीजेपी साल 2024 के अपने कमजोर प्रदर्शन को भी आधार बनाए, तो भी नए परिसीमन के बाद अकेले हिंदी पट्टी से उसे 210 सीटें मिलेंगी, जो बहुमत का आधा हिस्सा होगा।

साफ है कि बीजेपी का प्लान केवल मानसून सत्र में एक बिल पास कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका लॉन्ग-टर्म एजेंडा देश के उन 200 से 250 निर्वाचन क्षेत्रों में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों की ताकत को सीमित करना है, जहाँ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का वोट शेयर महज 4 से 5 प्रतिशत रह गया है। बीजेपी जानती है कि अगर उसने इन क्षेत्रीय दलों की सियासी रीढ़ को अभी से कमजोर कर दिया, तो साल 2029 के महा-मुकाबले में विपक्ष का पूरा चक्रव्यूह ढह जाएगा। अब देखना यह है कि मानसून सत्र में दोबारा आने वाला यह परिसीमन बिल देश की सियासत को किस करवट लेकर जाता है। डिलिमिटेशन के खेल और दक्षिण भारत के राज्यों की चिंताओं पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताएं।

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