क्या आप अपने दोस्तों के बजाए ज्यादा बूढ़े दिखाई देने लगे हैं? क्या आपको भी लगता है कि आपके हमउम्र आज भी जवान दिखाई देते हैं, लेकिन आप उनसे 5-7 साल बड़े दिखाई देने लगे हैं? क्या ऐसी कोई दवा बनी है, जो इंसान को बूढ़ा होने से रोक सकती है? क्या मृत्यु केवल एक जैविक सॉफ्टवेयर की खराबी है, जिसे समय रहते 'अपडेट' या 'रीप्रोग्राम' किया जा सकता है? क्या सनातन में बताए अमरत्व का वरदान आज भी पाया जा सकता है? 21वीं सदी के विज्ञान और दुनिया के सबसे ताकतवर और अमीर इंसानों के लिए यह अब कोई साइंस-फिक्शन फिल्म का प्लॉट नहीं, बल्कि खरबों डॉलर की एक गंभीर रेस बन चुका है।
अमेज़न के संस्थापक जेफ बेजोस ने मोटा पैसा उम्र रोकने के शोध पर लगाया है। पेपल के सह संस्थापक पीटर थिएल भी एजिंग पर करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं। ब्रायल जॉनसन ने हाल ही में अपनी कंपनियों को बेचकर हर साल 2 मिलियन डॉलर केवल अपनी उम्र को 18 साल के युवक जैसा बनाने में झोंक रहे हैं, जिन्होंने अपने कारोबार का पूरा पैसा ही एंटी-एजिंग प्रोजेक्ट 'ब्लूप्रिंट' पर लगा दिया है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूस के प्रमुख चिकित्सा संस्थान में 'एजिंग' को रिवर्स करने और सेलुलर रीप्रोग्रामिंग पर 26 बिलियन डॉलर एंटी-एजिंग प्रोग्राम में निवेश कर रहे हैं,....ऑल्टोस लैब्स, रेट्रो बायोसाइंसेज़, कैलिको और लाइफ बायोसाइंसेज़ जैसी कई शोध शालाएं चल रही हैं। मीडिया हाइप से अलग वास्तविक विज्ञान और अकादमिक रिसर्च पेपर्स इस बारे में क्या कहते हैं? क्या वाकई उम्र को रोका जा सकता है, और क्या सनातन धर्म में वर्णित 'अमरत्व' का कोई वैज्ञानिक आधार था? आइए इन सभी पक्षों को विज्ञान के प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ खंगालते हैं।
एंटी एजिंग में आधुनिक विज्ञान क्या कहता है? मॉर्डन जीरोन्टोलॉजी, जिसे बुढ़ापे का अध्ययन कहा जाता है, इसके अनुसार अब वृद्धावस्था को कोई प्राकृतिक नियम नहीं, बल्कि एक 'बीमारी' मानने लगी है, जिसका इलाज संभव है। विज्ञान मुख्य रूप से चार मोर्चों पर काम कर रहा है। पहला सेलुलर सेनेसेंस और सेनोलिटिक्स है। जब हमारी कोशिकाएं एक निश्चित उम्र के बाद विभाजित होना बंद कर देती हैं, तो वे मरती नहीं हैं।
वे 'जॉम्बी कोशिकाएं' बन जाती हैं, जो शरीर में सूजन और टॉक्सिन्स फैलाती हैं, जिससे बुढ़ापा आता है। Nature Medicine और The Lancet में प्रकाशित मेयो क्लिनिक के शोध बताते हैं कि सेनोलिटिक दवाओं के जरिए जब चूहों के शरीर से इन जॉम्बी कोशिकाओं को हटाया गया, तो उनकी उम्र में 36% तक की वृद्धि देखी गई और उनका शारीरिक स्वास्थ्य बिल्कुल युवाओं जैसा हो गया। अब इसका मानव ट्रायल चल रहा है।
दूसरा सेलुलर रीप्रोग्रामिंग और यामानाका फैक्टर्स को भी इंवेस्टिगेट किया जा रहा है। नोबेल पुरस्कार विजेता शिन्या यामानाका ने 4 विशिष्ट प्रोटीन की खोज की थी, जो किसी भी बूढ़ी कोशिका को वापस 'स्टेम सेल' में बदल सकते हैं। जेफ बेजोस ने जिस 'ऑल्टोस लैब्स' में करोड़ों डॉलर का निवेश किया है, वह इसी तकनीक पर काम कर रही है। साल्क इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने Cell जर्नल में एक पेपर प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने आनुवंशिक रूप से समय से पहले बूढ़े होने वाले चूहों पर इन फैक्टर्स का आंशिक इस्तेमाल किया।
परिणाम यह हुआ कि चूहों की उम्र 20% बढ़ गई और उनके आंतरिक अंग फिर से युवा हो गए। हमारे क्रोमोसोम के सिरों पर 'टेलोमेयर' नाम की सुरक्षात्मक कैप्स होती है। हर बार जब कोशिका विभाजित होती है, यह टेलोमेयर छोटा हो जाता है। जब यह पूरी तरह खत्म हो जाता है, तो कोशिका मर जाती है। वैज्ञानिक 'टेलोमरेज' एंजाइम को सक्रिय करके इन कैप्स को दोबारा लंबा करने पर शोध कर रहे हैं।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर डेविड सिंक्लेयर के शोध के अनुसार, शरीर में NAD+ नामक को-एंजाइम की कमी से कोशिकाएं ऊर्जा बनाना बंद कर देती हैं। Cell और Science जर्नल्स में प्रकाशित उनके पत्रों के अनुसार, चूहों को NMN, जो एक तरह का सप्लीमेंट होता है, उससे चूहों में टेलोमेयर लंबे हुए" या "NAD+ बढ़ा है और उनकी Biological Age कम हुई है। इसके अलावा मधुमेह की दवा 'मेटफॉर्मिन' का इंसानों पर 'TAME', यानी 'टार्गेटिंग एजिंग विद मेटफॉर्मिन' नाम से क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है, क्योंकि बड़े डेटा एनालेसिस में देखा गया कि मेटफॉर्मिन लेने वाले शुगर के मरीजों की उम्र आम इंसानों से ज्यादा लंबी हो रही थी।
प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में इंसानी उम्र को 'रोका' या 'पलटा' जा सकता है? अकादमिक और सांख्यिकीय रूप से इस सवाल का जवाब "हाँ है, जिसके अनुसार Biological Age को कम किया जा सकता है, लेकिन अमरत्व, यानी इमोर्टेलिटी अभी भी एक दूर का सपना है।" विज्ञान दो तरह की उम्र मानता है। क्रोनोलॉजिकल एज, जो कैलेंडर के हिसाब से साल दर साल बढ़ती है, इसे बदला नहीं जा सकता, और बायोलॉजिकल एज, जो आपके डीएनए के मिथाइलेशन और अंगों की वर्किंग से तय होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर स्टीव होर्वाथ ने 'इपिजेनेटिक क्लॉक' का आविष्कार किया, जो खून की जांच से इंसान की सटीक जैविक उम्र बताती है। क्लिनिकल ट्रायल्स में देखा गया है कि ग्रोथ हार्मोन और कुछ विशिष्ट सप्लीमेंट्स के कॉकटेल से मानव की जैविक उम्र को 1.5 से 2.5 साल तक रिवर्स किया जा चुका है। लेकिन, 'हफलिक लिमिट' के अनुसार मानव कोशिकाओं के विभाजित होने की एक अधिकतम सीमा है।
अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि इन आधुनिक तकनीकों से हम इंसान की औसत आयु को 120 से 150 वर्ष तक तो खींच सकते हैं, और 80 साल की उम्र में भी 40 साल जैसा शरीर दे सकते हैं, लेकिन मौत को पूरी तरह मिटा देना वर्तमान विज्ञान के नियमों के दायरे में अभी संभव नहीं हुआ है।
अब सवाल यह भी उठता है कि सनातन धर्म का अमर होने का वरदान और आधुनिक विज्ञान की खोज कितनी मेल खाती हैं? सनातन परंपरा में अष्टचिरंजीवी, जैसे अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, महर्षि वेदव्यास और मार्कण्डेय का वर्णन मिलता है, जिन्हें समय के अंत तक जीवित रहने का वरदान है। सनातन दर्शन में योग साधना, आयुर्वेद के 'रसायन तंत्र' और कायाकल्प फैक्ट्स मौजूद हैं।
यदि हम मेटाफॉर्स को डिकोड करें तो सनातन दर्शन और आधुनिक जीनोमिक्स में कुछ बेहद दिलचस्प समानताएं दिखती हैं। आयुर्वेद के 8 अंगों में से एक है 'रसायन तंत्र'। महर्षि चरक और सुश्रुत ने 'कुटीप्रावेशिक रसायन' विधि का वर्णन किया है। इसमें व्यक्ति को महीनों तक एक अंधकारमय, नियंत्रित वातावरण वाली कुटिया में जड़ी-बूटियों के विशेष सेवन के साथ रखा जाता था।
इसके विवरण बताते हैं कि इससे व्यक्ति के बूढ़े नाखून, बाल और त्वचा गिर जाते थे और नए बाल व त्वचा आ जाती थी। यह प्रक्रिया आज की 'सेलुलर ऑटोफैगी' और स्टेम सेल थेरेपी से मेल खाती है, जहाँ शरीर की पुरानी कोशिकाएं खुद को खाकर नष्ट कर देती हैं और नई री-प्रोग्राम्ड कोशिकाएं जन्म लेती हैं। ऑटोफैगी की खोज के लिए ही 2016 में योशिनोरी ओसुमी को नोबेल पुरस्कार मिला था।
सनातन दर्शन में सांसों की गति को नियंत्रित करके, यानी प्राणायाम से आयु बढ़ाने का दावा किया गया है। इस बात के वैज्ञानिक आधार की बात करें तो 'द लांसेट ओन्कॉलोजी' में नोबेल पुरस्कार विजेता एलिजाबेथ ब्लैकबर्न के शोध पत्र के अनुसार, जो लोग गहरी ध्यान साधना, प्राणायाम और तनाव-मुक्त शाकाहारी जीवन जीते हैं, उनके शरीर में टेलोमरेज एंजाइम की गतिविधि 30% तक बढ़ जाती है।
यानी, प्राणायाम और ध्यान सीधे तौर पर आपके डीएनए के टेलोमेयर को छोटा होने से रोकते हैं, जो सनातन की बात को वैज्ञानिक आधार देता है। वेदों में 'सोमरस' का उल्लेख है, जिसे देवताओं की दीर्घायु और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। आधुनिक विज्ञान में जिस तरह NMN, मेटफॉर्मिन, या 'रैपामिसिन' जैसी दवाओं को 'एंटी-एजिंग अमृत' की तरह पेश किया जा रहा है, यह उसी प्राचीन खोज का एक सिंथेटिक रूप कहा जा सकता है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित कर उम्र को धीमा करती है।
आज मॉर्डन सांइस उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ वह प्राचीन दावों को खारिज करने के बजाय उनके पीछे के 'मैकेनिज्म' को समझने की कोशिश करना है। तो पूरी कहानी का लब्बो-लुआब यह है कि दुनिया के अरबपति और वैज्ञानिक मिलकर मौत को पूरी तरह भले न रोक पाएं, लेकिन वे 'बुढ़ापे' को ऐच्छिक स्थिति बनाने के बेहद करीब हैं।
आने वाले दो से तीन दशकों में, यह संभव हो सकता है कि 70 या 80 साल की उम्र का इंसान भी उतना ही उत्पादक, चुस्त और युवा दिखे जितना 30 साल का युवक। सनातन ने जिसे 'कायाकल्प' और 'चिरंजीवी' की साधना से जोड़ा था, आधुनिक विज्ञान उसे लैबोरेट्री में टेस्ट-ट्यूब और जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए हासिल करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।

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