दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का 'ग्लोबल पुलिसमैन' होने का दौर हमेशा के लिए खत्म हो चुका है? क्या 108 दिनों तक खाड़ी में चले इस भीषण युद्ध ने साबित कर दिया है कि वियतनाम और अफगानिस्तान के बाद अब ईरान वो नया दलदल बन गया है, जिसने अमेरिकी सैन्य अहंकार को मटियामेट कर दिया?
जब इस युद्ध की शुरुआत हुई थी, तब वाशिंगटन के नीति-नियंताओं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा था कि यह महज़ दो से तीन सप्ताह का एक 'सर्जिकल एक्शन' होगा, जिसके बाद अमेरिका ईरान में लोकतंत्र की स्थापना करके सम्मान सहित बाहर निकल जाएगा।
लेकिन 100 दिन से अधिक चले इस युद्ध ने साबित कर दिया कि आधुनिक दौर में सैन्य श्रेष्ठता का घमंड किस कदर ज़मीनी हकीकत के आगे घुटने टेक देता है। ईरान हारा नहीं, अमेरिका जीता नहीं, तानाशाही का खात्मा हुआ नहीं और परमाणु बम न बनाने की कोई लिखित गारंटी भी नहीं मिली।
ऐसे में आज के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में हम उस समझौते की इनसाइड क्रोनोलॉजी को डिकोड करेंगे, जिसने एक तरह से बिना किसी औपचारिक घोषणा के, दुनिया के सामने अमेरिका की परोक्ष हार पर मुहर लगा दी है।
शुरुआती अनुमानों और आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, इस 108 दिनों के युद्ध में अकेले अमेरिका को लगभग 120 से 150 अरब डॉलर का सीधा वित्तीय नुकसान हुआ है। इसमें मिसाइलों, स्टील्थ विमानों के ईंधन, नौसैनिक बेड़ों की तैनाती और लॉजिस्टिक्स का भारी खर्च शामिल है।
अमेरिका का एकमात्र 'हासिल' ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर बमबारी कर उन्हें अस्थाई रूप से ठप करना रहा, लेकिन इसके बदले में अमेरिका ने अपनी जो साख खोई, उसकी भरपाई नामुमकिन है। युद्ध से पहले दावा था कि ईरान में लोकतंत्र आएगा, लेकिन सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की मौत और उनके करीबी कमांडर्स के सफाए के बाद उनके बेटे को तुरंत नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया, यानी तानाशाही का ढांचा जस का तस रहा।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह युद्ध एक घरेलू राजनीतिक और नैतिक संकट बन गया है, क्योंकि आरोप हैं कि ट्रंप परिवार के रक्षा और लॉजिस्टिक्स से जुड़े कॉर्पोरेट कारोबारों ने इस युद्ध के दौरान अरबों डॉलर का मुनाफा कमाया, लेकिन यह मुनाफा अमेरिका की वैश्विक साख, हजारों मासूमों की जान और अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बलि देकर कमाया गया, जो अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा आंतरिक नुकसान है।
इस युद्ध की दूसरी सबसे भीषण मार ईरान की जनता और उसके बुनियादी ढांचे पर पड़ी। 108 दिनों में ईरान समेत दुनियाभर में 10,000 से अधिक मौतें दर्ज की गईं, जिनमें एक बड़ी संख्या मासूम नागरिकों की थी। ईरान के तेल रिफाइनरी नेटवर्क, परमाणु अनुसंधान केंद्रों और सैन्य ठिकानों को अमेरिकी बमबारी ने तहस-नहस कर दिया, जिससे ईरान को लगभग 80 से 100 अरब डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान हुआ है।
यहाँ तक कि दावा किया जा रहा है कि अमेरिका इस युद्ध में भरपाई के लिए ईरान को 300 अरब डॉलर देगा, जिसका हालांकि ट्रंप ने खंडन किया है। लेकिन अपनी इस भारी तबाही के बावजूद ईरान ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। उसकी भौगोलिक स्थिति और दमनकारी सरकारी चक्र इतना मजबूत था कि अमेरिका अपनी चाहत का 50 फीसदी भी हासिल नहीं कर पाया और ईरान ने आज भी यह लिखित वादा नहीं किया है कि वह भविष्य में परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।
यह युद्ध खाड़ी देशों और इस्राइल के लिए भी रणनीतिक रूप से एक बड़ा झटका साबित हुआ है। अमेरिका खाड़ी देशों को जो अचूक सुरक्षा कवच देने का दावा करता था, वह तिलिस्म इस युद्ध में टूट गया। हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने और हूती विद्रोहियों के लगातार ड्रोन हमलों के कारण खाड़ी देशों को अपने तेल निर्यात में करीब 40 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा और अब उनकी सुरक्षा काफी हद तक ईरान के रहमो-करम और नए कूटनीतिक संतुलन पर टिक गई है।
दूसरी ओर इस्राइल ने इस युद्ध में अमेरिका का खुलकर साथ दिया और सीरिया-लेबनान मोर्चे पर भारी बमबारी की, जिससे उसका अपना सैन्य बजट 15 से 20 अरब डॉलर तक खिंच गया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि युद्ध के अंतिम चरण में इस्राइल ने अमेरिका की युद्धविराम की बात मानने से साफ इनकार कर दिया, जिसने दुनिया को दिखा दिया कि अब अमेरिका अपने सबसे करीबी सहयोगियों पर भी नियंत्रण खो चुका है और हूती तथा हिजबुल्लाह का खात्मा इस युद्ध के बाद भी नहीं हो सका।
सबसे बड़ा झटका तो यह रहा कि नाटो ने पहले ही अमेरिका का साथ छोड़ दिया था, जो पिछले करीब 80 साल से अमेरिका के साथ हर मोर्चे पर खड़ा रहा था। नाटो ही अमेरिका की सैन्य जीत की सबसे बड़ी गारंटी मानी जाती थी, लेकिन वह भ्रम अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
इस युद्ध की आग से वैश्विक महाशक्तियाँ और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भी अछूती नहीं रहीं। हॉर्मुज दर्रा बंद होने के कारण भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए वैकल्पिक और महंगे रूट अपनाने पड़े। कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल पार करने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को कई अरब डॉलर का अतिरिक्त धक्का लगा और घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ी।
लेकिन अब इस समझौते के बाद हॉर्मुज दर्रा फिर से खुलने जा रहा है, जिससे भारत को समय पर तेल और गैस की सप्लाई मिल सकेगी और भारतीय बाजार फिर से मुस्कुराएगा। वहीं चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरान के तेल पर बहुत अधिक निर्भर है, इसलिए युद्ध के कारण चीन की औद्योगिक सप्लाई चेन बाधित हुई और उसे लगभग 25 से 30 अरब डॉलर का व्यापारिक नुकसान हुआ, हालांकि रणनीतिक रूप से चीन ने इस दौरान मध्य-पूर्व में अमेरिका विरोधी ताकतों के बीच अपनी पैठ और मजबूत कर ली।
जापान अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है, इसलिए इस युद्ध के कारण जापान को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा और उसकी अर्थव्यवस्था को लगभग 12 से 15 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जिससे वहां विनिर्माण क्षेत्र में मंदी के संकेत दिखने लगे। रूस के लिए यह युद्ध वित्तीय से ज्यादा रणनीतिक मोर्चे पर सक्रिय रहा।
युद्ध के कारण बढ़े तेल के दामों से रूस को अपने तेल निर्यात में वित्तीय फायदा जरूर हुआ, लेकिन ईरान के परमाणु ठिकानों के नुकसान और मध्य-पूर्व में अस्थिरता के कारण रूस को अपनी भू-राजनीतिक बिसात को दोबारा सेट करने में भारी कूटनीतिक ऊर्जा और सैन्य साजोसामान का नुकसान उठाना पड़ा।
देखा जाए तो यह युद्ध आधुनिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय बन गया है, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान छोटे से देश जापान द्वारा अमेरिका को उसकी असलियत दिखाने की याद ताजा कर दी। तब अमेरिका ने परमाणु बम गिराकर अपनी इज्जत बचाई थी, लेकिन ईरान के साथ इस बार एक तरह से अमेरिका युद्ध में अपनी हार की कोई औपचारिक घोषणा किए बिना, बस चुपचाप बाहर आकर अपनी बची-खुची इज्जत बचाने में ही कामयाब रहा है।
इस युद्ध में ईरान ने अमेरिका की उस सैन्य धौंस की पोल खोल दी, जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र के घर में घुसकर उसे घुटनों पर लाने का दावा करती थी। दुनिया ने हजारों मासूमों को खोकर बस इतना सीखा कि युद्ध कभी किसी समस्या का हल नहीं होते, वे सिर्फ महाशक्तियों के अहंकार की महंगी और नाकाम नुमाइश होते हैं। इस पूरे घटनाक्रम और अमेरिका के इस यू-टर्न पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।
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