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किरोड़ीलाल मीणा अपनी ही सरकार के खिलाफ आंदोलन करने जा रहे हैं?


क्या राजस्थान की भजनलाल सरकार अपने ही सबसे सीनियर और कद्दावर मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा को सियासी तौर पर ख़त्म करने की साज़िश रच रही है? या फिर 'बाबा' कहे जाने वाले किरोड़ीलाल मीणा एक बार फिर अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का वो झंडा उठाने जा रहे हैं जो पूरी भाजपा सरकार को घुटनों पर ला देगा? राजनीति का यह सीधा नियम है कि जिस शेर को पिंजरे में बंद करने की कोशिश की जाती है, उसकी दहाड़ उतनी ही खतरनाक हो जाती है। पिछले कुछ दिनों से राजस्थान बीजेपी और सरकार के भीतर एक ऐसा लावा उबल रहा है, जो किसी भी दिन बड़े सियासी विस्फोट में बदल सकता है। किसान मोर्चा के बड़े कार्यक्रम से दूरी बनाने के बाद, अब किरोड़ीलाल मीणा ने खुद को कृषि विभाग की महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक से भी पूरी तरह गायब कर लिया है। जिस बैठक को खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ले रहे हों, वहां विभाग के कैबिनेट मंत्री का न होना कोई सामान्य बात नहीं है। आज के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में हम किरोड़ीलाल मीणा की इस गहरी नाराजगी, सरकार की बेरुखी, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के इनसाइड खेल पर तीखे सवाल उठाएंगे और जानेंगे कि बाबा का अगला 'कड़ा फैसला' क्या होने वाला है।

डॉ. किरोड़ीलाल मीणा की यह नाराजगी आज की नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें दिसंबर 2023 में ही लग गई थीं। पिछले विधानसभा चुनाव में गहलोत सरकार के खिलाफ अकेले दम पर मोर्चा लेने वाले और लाठियां खाने वाले किरोड़ीलाल मीणा को पूरा भरोसा था कि यदि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री नहीं बनती हैं, तो वरिष्ठता के नाते अगला नंबर उनका ही होगा। लेकिन दिल्ली के आलाकमान ने सभी संभावनाओं को दरकिनार कर पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा के सिर पर ताज सजा दिया। यह किरोड़ीलाल मीणा के राजनीतिक वजूद पर पहला बड़ा प्रहार था। हद तो तब हो गई जब इतने सीनियर नेता को मर्जी के विभाग देने के बजाय खंडित और कमजोर विभागों का मंत्री बना दिया गया। इसके बाद जब दौसा विधानसभा उपचुनाव में किरोड़ीलाल के भाई जगमोहन मीणा को टिकट मिला और वे चुनाव हार गए, तब किरोड़ीलाल ने परोक्ष रूप से अपनी ही सरकार के सिस्टम को इस हार के लिए दोषी ठहराया था और जल्द बड़े खुलासे करने का दावा किया था, यह बात और है कि आज तक वो खुलासे सामने नहीं आए।

किरोड़ीलाल मीणा का गुस्सा तब सातवें आसमान पर पहुँच जाता है जब उनके कहे अनुसार सरकार काम नहीं करती और नौकरशाही उन पर हावी होने लगती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण मिला 3—4 दिसंबर 2024 की आधी रात को, जब जयपुर के महेश नगर की तत्कालीन इंस्पेक्टर कविता शर्मा के साथ किरोड़ीलाल मीणा की तीखी बहस हुई। प्रधानमंत्री की राजस्थान यात्रा के दौरान एसआई भर्ती मामले में छात्रों द्वारा प्रदर्शन करने की संभावना के चलते इंस्पेक्टर कविता शर्मा आधी रात को बिना किसी वारंट के, चुपके से छात्रों को उनके घरों से उठाने पहुँच गई थीं। जब इसकी भनक कैबिनेट मंत्री किरोड़ीलाल मीणा को लगी, तो वे तुरंत मौके पर पहुँचे और इंस्पेक्टर को कड़ी फटकार लगाई। लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि एक अदनी सी इंस्पेक्टर ने कैबिनेट मंत्री को सरेआम तेवर दिखाए। किरोड़ीलाल ने सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी, लेकिन सरकार ने उस इंस्पेक्टर का सिर्फ ट्रांसफर करके मामले को रफा-दफा कर दिया।

अब यहाँ सरकार की नीयत पर सबसे बड़ा और कड़वा सवाल खड़ा होता है। पिछले दिनों जब निर्दलीय विधायक ऋतु बनावत की नगर पालिका की ईओ अनिता कुशवाह से तनातनी हुई, तो सरकार ने तुरंत एक्शन लेते हुए ईओ कुशवाह को निलंबित कर दिया। तो फिर एक कैबिनेट मंत्री के साथ बदतमीजी करने वाली इंस्पेक्टर कविता शर्मा पर आज तक कोई कड़ा एक्शन क्यों नहीं हुआ? किरोड़ी के समर्थकों का यह आरोप बेहद गंभीर और तीखा है कि आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने में भी भजनलाल सरकार पूरी तरह जातिवाद का खेल खेल रही है, जहां एक निर्दलीय विधायक के स्वाभिमान की कीमत कैबिनेट मंत्री के स्वाभिमान से बड़ी हो जाती है।

बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकती, किरोड़ीलाल मीणा को प्रशासनिक तौर पर नीचा दिखाने का खेल लगातार जारी है। पिछले साल किरोड़ीलाल मीणा ने सूबे में नकली खाद और बीज बनाने वाली कई फैक्ट्रियों पर खुद खड़े होकर छापेमारी की थी और दर्जनों गोदामों को सील करवाया था। लेकिन मजेदार और शर्मनाक बात देखिए कि सरकारी जांच में उन सभी मिलावटखोरों को क्लीन चिट दे दी गई और उनके गोदामों की सील खोल दी गई। यह सीधे तौर पर एक कैबिनेट मंत्री की साख का कत्ल था। इस बार भी जब किरोड़ीलाल ने कई गोदामों को सील करवाया, तो इसी दौरान एक और बड़ा विस्फोट हो गया। बीज निगम के निदेशक जुगल किशोर बिश्नोई और उसके 5 साथियों को एसीबी ने 2.44 करोड़ रुपये के मूंगफली के नकली बीज को असली बताने के काले खेल में रंगे हाथों पकड़ लिया। अब कांग्रेस के नेता इस भ्रष्टाचार का सीधा आरोप कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा पर मढ़ रहे हैं और उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। हालांकि, किरोड़ीलाल ने हमेशा की तरह आक्रामक अंदाज में दावा किया है कि यदि उन पर एक भी आरोप साबित हो जाए, तो वे न सिर्फ मंत्री पद छोड़ देंगे बल्कि खुद को गिरफ्तारी के लिए पेश कर देंगे। इस मामले में एसीबी की जांच डॉक्टर शब्द पर टिकी है, जो अक्सर बड़े लेवल पर मंत्री किरोड़ीलाल मीणा के लिए प्रयोग किया जाता है। विपक्ष का मानना है कि ​मंत्री किरोड़ीलाल मीणा खुद इस मामले में शामिल हैं और उसमें से अपना नाम हटाने के लिए सरकार के उपर दबाव बना रहे हैं, जबकि सरकार ने कहा है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम किया जा रहा है। इस विवाद के बाद खुद मंत्री भी सवालों में घिरते जा रहे हैं। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किरोड़ीलाल मीणा वही नेता हैं जिन्होंने पिछले कांग्रेस शासन के दौरान अशोक गहलोत सरकार की नाक में दम कर रखा था। पेपर लीक मामले में उन्होंने अकेले दम पर सरकार को चैन की सांस नहीं लेने दी थी, जिसके कारण वे मीडिया के सबसे बड़े चहेते बन गए थे। जब उन्हें सीएम नहीं बनाया गया, तो उनके समर्थकों ने बीजेपी कार्यालय पर जमकर हंगामा किया था और भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। इसी अंदरूनी गुस्से का नतीजा था कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी पूर्वी राजस्थान की लगभग सभी सीटें बुरी तरह हार गई। इसके बाद अपने वादे के मुताबिक किरोड़ीलाल ने 4 जुलाई 2024 को मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और करीब एक साल तक बिना मलाईदार पद के रहने के बाद, अमित शाह के इस आश्वासन पर कि उन्हें जल्द बड़ा पद या सीएम बनाया जा सकता है, उन्होंने दोबारा काम शुरू किया था। लेकिन आज न तो उन्हें वो सम्मान मिल रहा है और न ही उनके फैसलों को लागू किया जा रहा है।

अब किरोड़ीलाल मीणा ने फिर से आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। उन्होंने मीडिया के सामने साफ कहा है कि फरवरी 2026 को वे आरपीएससी के पूर्व सदस्य बाबूलाल कटारा से मिलने जेल गए थे, जिसके बाद कुछ कड़े कदम उठाए गए हैं। अब वे एसआई भर्ती, आरएएस भर्ती, पेपर लीक और बीज निगम के भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर मुख्यमंत्री से आखिरी बार बात करेंगे, और अगर सरकार ने कठोर कदम नहीं उठाए, तो वे खुद एक सख्त और बड़ा फैसला लेने जा रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि किरोड़ीलाल मीणा जब एक बार इस्तीफा दे चुके हैं, तो दोबारा इस्तीफा देने का नाटक तो वे करने से रहे। तो फिर वो कौन सा 'कड़ा फैसला' है जो वे लेने जा रहे हैं? सियासी जानकारों का मानना है कि अब उनके पास एक ही रास्ता बचा है, और वो है अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर एक बड़ा आंदोलन शुरू करना।

इतिहास गवाह है कि साल 2006 में भी जब वसुंधरा राजे की पहली सरकार थी, तब गुर्जर आरक्षण आंदोलन और अपनी उपेक्षा के चलते किरोड़ीलाल मीणा ने मंत्री पद लात मार दी थी और 9 साल तक बीजेपी से दूर रहे थे। आज साल 2026 में इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है। ऐसा लगता है कि राजस्थान के बड़े राजनीतिक सिस्टम द्वारा जानबूझकर डॉ. किरोड़ीलाल मीणा को ऐसे हालात में धकेला जा रहा है ताकि वे खुद बगावत करने को मजबूर हो जाएं। क्या बाबा का यह आंदोलन भाजपा सरकार की उलटी गिनती शुरू कर देगा, या फिर दिल्ली दरबार एक बार फिर उन्हें मनाने में कामयाब होगा? इस तीखे सियासी घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।


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