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पायलट ने पकड़ा था सत्ता का सबसे बड़ा 'तांत्रिक


साल 1991 के जमाने में दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक कहावत गूंज रही थी, 'देश को नरसिम्हा राव चला रहे हैं, और राव को चंद्रस्वामी।' एक वही जमाना था, जब कांग्रेस गांधी परिवार से मुक्त था, और उसी चंद्रास्वामी को प्रधानमंत्री की मर्जी के खिलाफ जाकर सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट ने पकड़ा था....

तब सत्ता कांग्रेस की थी, लेकिन शीर्ष पर काबिज था एक ऐसा तांत्रिक, जिसकी उंगलियों के इशारे पर हिंदुस्तान की हुकूमत करवट बदलती थी। जिसके आश्रम में देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री, अंतरराष्ट्रीय हथियारों के सौदागर और कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक पल मिलने को लाइन लगाकर खड़े होते थे। आज हम सत्ता, तंत्र, अकूत दौलत और अंतरराष्ट्रीय साजिशों के उसी कॉकटेल को खंगालेंगे, जिसने एक साधारण लड़के को भारत का सबसे विवादित और शक्तिशाली 'गॉडमैन' बना दिया था। 

इस महाकथा की शुरुआत होती है 29 अक्टूबर 1948 को राजस्थान के भीलवाड़ा से, जहां एक साधारण जैन परिवार में धर्मचंद जैन के घर में 'नेमीचंद जैन' नाम के लड़के का जन्म हुआ। धर्मचंद्र जैन साहूकार थे, जो कारोबार के सिलसिले में 1960 के दशक में हैदराबाद शिफ्ट हो गये थे। जैन धर्म के शांत माहौल में पले-बढ़े नेमीचंद का मन उनके पिता के व्यापार में नहीं, बल्कि तंत्र-मंत्र की गुप्त दुनिया में अटका था। 

इसलिए किशोरावस्था में ही घर छोड़कर असम के कामाख्या पीठ और नेपाल के घने जंगलों की ओर निकल पड़े। जहां माँ काली की कठिन साधना और ज्योतिष विद्या पर पकड़ बनाकर करीब 8-10 साल बाद जब वो लौटे, तो वो नेमीचंद जैन नहीं थे... वो बन चुके थे महान तांत्रिक 'चंद्रास्वामी'।

चंद्रास्वामी के पास सिर्फ तंत्र की शक्ति नहीं थी, उनके पास इंसानी दिमाग को पढ़ने और नेटवर्किंग की गजब कला भी थी। 1970 के दशक में उन्होंने दिल्ली का रुख किया और कांग्रेस के बड़े नेता पी.वी. नरसिम्हा राव के बेहद करीब आ गए, लेकिन चंद्रास्वामी की महत्वाकांक्षाएं सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थीं, उनका दायरा वैश्विक हो चुका था।

उसी दौरान 1975 की एक घटना ने उन्हें रातों-रात इंटरनेशनल स्टार बना दिया। लंदन में उन्होंने ब्रिटेन की तत्कालीन विपक्षी नेता मार्गरेट थैचर से मुलाकात की। चंद्रास्वामी ने उन्हें एक तांत्रिक ताबीज़ दिया और भविष्यवाणी करी कि वो अगले 4 साल में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनेंगी और 11 साल राज करेंगी। ठीक 4 साल बाद, 1979 में थैचर पीएम बनीं और उनका कार्यकाल लगभग 11 साल ही रहा। 

इस एक सटीक भविष्यवाणी ने पूरी दुनिया में चंद्रास्वामी का डंका बजा दिया। इसके बाद उनके दरबार में दुनिया के सबसे अमीर शख्सियत ब्रुनेई के सुल्तान, अंतरराष्ट्रीय हथियारों के सौदागर अदनान खशोगी, और हॉलीवुड की हस्तियों का तांता लग गया।

80 और 90 का दशक चंद्रास्वामी के रसूख का चरम था। दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में फैले उनके 'विश्व धर्मायतन आश्रम' में शाम ढलते ही वीआईपी गाड़ियों की कतारें लग जाती थीं। नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनते ही चंद्रास्वामी की ताकत असीमित हो गई। 

फाइलों के क्लियरेंस से लेकर कैबिनेट मंत्रियों के विभागों के फैसले तक, इसी आश्रम की रजामंदी से होते थे, लेकिन जहाँ असीमित ताकत और पैसा होता है, वहां विवाद भी परछाई की तरह पीछे आते हैं। चंद्रास्वामी का नाम भारत के सबसे सनसनीखेज घोटालों में आने लगा। 

चाहे वो वीपी सिंह को बदनाम करने के लिए जाली बैंक दस्तावेजों से जुड़ा 'सेंट किट्स मामला' हो, एनआरआई बिजनेसमैन से $100,000 की धोखाधड़ी का 'लक्खूभाई पाठक केस' हो, या फिर FERA उल्लंघन के तहत करोड़ों रुपये के अवैध विदेशी लेन-देन के मामले, लेकिन सबसे बड़ा धमाका तब हुआ, जब 1991 के राजीव गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले 'जैन कमीशन' ने अपनी रिपोर्ट में चंद्रास्वामी पर उंगली उठाई। 

आरोप लगा कि LTTE के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और इस हत्याकांड की फंडिंग के तार कहीं न कहीं चंद्रास्वामी के वैश्विक संपर्कों से जुड़े थे, हालांकि यह कोर्ट में कभी साबित नहीं हो सका। 

कहते हैं कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो राजा को रंक बनते देर नहीं लगती। उनकी पहली बड़ी गिरफ्तारी 1996 में हुई। उस वक्त केंद्र में उन्हीं पीवी नरसिम्हा राव की सरकार थी, जो चंद्रास्वामी के खास थे। सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट गृह राज्यमंत्री थे, जो चंद्रास्वामी की अवैध गतिविधियों के सख्त खिलाफ थे। तब गृहमंत्री शंकरराव चव्हान थे, जिनके राजेश पायलट के साथ करीबी संबंध थे।

उनपर पहला मामला Foreign Exchange Regulation Act के उल्लंघन का था। आरोप था कि चंद्रास्वामी ने सेंट किट्स के व्यापारी आदनान खशोगी के ज़रिए अवैध रूप से विदेशी मुद्रा भारत में मँगवाई। यह रकम करोड़ों में थी और RBI की अनुमति के बिना लेन-देन किया गया था। राजेश पायलट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। उन्होंने CBI और Enforcement Directorate को सक्रिय किया। 

चंद्रास्वामी के नरसिम्हा राव सरकार से करीबी संबंध होने के बावजूद पायलट ने दबाव बनाए रखा। माना जाता है कि राजेश पायलट ने इस मामले को राजनीतिक हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया, क्योंकि चंद्रास्वामी का नाम कई बड़े नेताओं और विदेशी सौदों से जुड़ा था। उनको सीबीआई द्वारा पहली बार 2 मई 1996 की रात चेन्नई के एक होटल से गिरफ्तार किया गया था। 

इसी गिरफ्तारी का हवाला देकर सचिन पायलट ने 10 जून को करोली में परोक्ष रुप से पूर्व सीएम अशोक गहलोत को हिदायत दी थी। चंद्रास्वामी की गिरफ्तारी लंदन के एक व्यवसायी लखूभाई पाठक से 1 लाख डॉलर की ठगी के आरोप में हुई थी। यह प्रकरण लखूभाई पाठक धोखाधडी मामले के नाम से प्रसिद्ध हुआ। चंद्रास्वामी की गिरफ्तारी के ठीक 14 दिन बाद पीवी नरसिम्हाराव की सरकार गिर गई।

इसके बाद चंद्रास्वामी के बुरे दिन शुरू हो गए। कोर्ट-कचहरी, ईडी के छापे, सीबीआई की पूछताछ और तिहाड़ जेल की सलाखें उनकी नियति बन गईं। उन्होंने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ी और अंततः अधिकांश मामलों में बरी भी हो गए। 

जिस तांत्रिक के सामने कभी दुनिया के सबसे रईस सुल्तान झुकते थे, कानून के शिकंजे ने उन्हें उनके ही आश्रम में कैद कर दिया। आखिरकार 23 मई 2017 को दिल्ली के एक अस्पताल में 68 वर्ष की उम्र में गुमनामी के बीच चंद्रास्वामी का निधन हो गया। उनके दुनिया से जाने के साथ ही सत्ता, सरकारी तंत्र, और साजिशों के कई ऐसे रहस्य हमेशा के लिए दफन हो गए, जिनका जवाब इतिहास हमेशा ढूंढता रहेगा। 

चंद्रास्वामी एक चमत्कारी संत थे या एक बेहद शातिर खिलाड़ी? आज भी इसका फैसला इतिहास की बंद फाइलों में दर्ज है।

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