एक इंसान की जिंदगी की कीमत हमारे सरकारी सिस्टम की नजर में कितनी है? 5 लाख? 10 लाख? या फिर सिर्फ आठ हजार रुपये महीना? राजस्थान की राजधानी जयपुर में सवाई मानसिंह अस्पताल से आई एक दिल दहला देने वाली खबर ने न केवल सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि हमारे समकालीन समाज और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के उस क्रूर और संवेदनहीन चेहरे को भी पूरी तरह बेनकाब कर दिया है जो अक्सर सरकारी फाइलों और एसी कमरों के पीछे छिपा रहता है।
कॉन्ट्रैक्ट पर कार्यरत 25 साल के दीपक खरवाल ने 8 हजार रुपये की नौकरी से हटाए जाने की निराशा में डूबकर आत्महत्या कर ली। दीपक की यह खुदकुशी केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि देश में मैकॉले एजुकेशन पढ़े-लिखे करोड़ों युवाओं की मजबूरी, संविदा संस्कृति के जरिए हो रहे आर्थिक शोषण और सरकार की नीतिगत संवेदनहीनता की एक 'सांस्थानिक हत्या' है। दीपक महज 8,000 रुपये प्रति माह के मामूली मानदेय पर संविदा की नौकरी करता था।
आज के इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में, जहां बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी एक पहाड़ जीतने जैसा है, वहां एक पढ़ा-लिखा युवा इस न्यूनतम राशि पर भी अपनी पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहा था। लेकिन हमारे बेरहम तंत्र को उसका यह योगदान भी रास नहीं आया और उसे अचानक नौकरी से हटा दिया गया। रोजगार छिनने की लाचारी और भविष्य के काले अंधकार ने उस युवा को इस कदर तोड़ा कि उसने घुट-घुट कर जीने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।
लेकिन इस त्रासद घटना के बाद जो कुछ हुआ, वह राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक रवैये की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप उठेगी। दीपक की मौत के बाद आरएलपी के नेता हनुमान बेनीवाल के धरने-प्रदर्शन के बाद आखिरकार प्रशासन की नींद टूटी। देर रात प्रशासन ने आनन-फानन में मामले को शांत करने के लिए पीड़ित परिवार को एक 'राहत' देने का ऐलान किया, और वो घोषणा क्या थी?
प्रशासन ने कहा कि अब दीपक की पत्नी को उसी संविदा पर, उसी 8,000 रुपये प्रति माह के मानदेय पर अस्पताल में नौकरी दी जाएगी। अब आप ही सोचिए, यह पीड़ित परिवार को दी गई राहत है या उस मृतक युवा की लाश पर खड़ा होकर किया गया एक क्रूर और अमानवीय मज़ाक? जिस 8,000 रुपये की नौकरी को छीनकर दीपक को मौत के मुंह में धकेला गया, वही नौकरी अब उसकी मौत का 'मुआवजा' बनकर उसकी विधवा पत्नी के सामने परोस दी गई है।
यदि सरकार के पास 8,000 रुपये की वही संविदा नौकरी देने की गुंजाइश मौजूद थी, तो दीपक को जीवित रहते वक्त उस नौकरी से हटाया ही क्यों गया? क्या इस अंधी व्यवस्था को किसी बेकसूर की जान लेने के बाद ही अपनी गलतियों का अहसास होता है?
यह पूरी घटना देश में तेजी से पैर पसार रही 'संविदा संस्कृति' के खोखलेपन और उसके भीतर छिपे दर्द को पूरी तरह उजागर करती है। आज सरकारें पक्की और स्थायी नौकरियां देने से लगातार हाथ खींच रही हैं। इसके पीछे अक्सर वित्तीय प्रबंधन और बजट घाटे को कम करने का बेतुका तर्क दिया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यह पूरा मॉडल मैकॉले शिक्षा पद्धति से निकले देश के पढ़े-लिखे युवाओं के शोषण की एक आधुनिक पगडंडी बन चुका है।
संविदा पर काम करने वाले इन युवाओं को न तो कोई सामाजिक सुरक्षा मिलती है, न पीएफ का सहारा मिलता है, न कोई स्वास्थ्य बीमा होता है और न ही नौकरी की कोई गारंटी होती है। इन्हें हर सुबह काम पर जाते समय इस बात का डर सताता रहता है कि कब कोई बड़ा अधिकारी या ठेकेदार एक झटके में इन्हें बाहर का रास्ता दिखा देगा।
एक तरफ सरकारें न्यूनतम मजदूरी के बड़े-बड़े ढिंढोरे पीटती हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद सरकारी विभागों और प्रतिष्ठित अस्पतालों में युवाओं को 8,000 रुपये जैसी नाममात्र की दिहाड़ी पर खपाया जा रहा है। क्या यह किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपने नागरिकों को संविधान के तहत एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दे?
आज देश का युवा डिग्रियां हाथ में लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है। बीए, एमए, यहां तक कि पीएचडी और उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवा भी चपरासी, सफाईकर्मी या 8,000 रुपये की संविदा नौकरी के लिए लंबी-लंबी लाइनों में खड़े हैं। यह हमारे युवाओं की काबिलियत की कमी नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर सरकारी रोजगार नीतियों के दिवालियापन का सबसे बड़ा सबूत है।
सरकारें नियमित और पक्की भर्तियां निकालने में सालों-साल लगा देती हैं। यदि भारी दबाव में भर्तियां निकलती भी हैं, तो वे कभी पेपर लीक का शिकार हो जाती हैं, कभी अदालती मुकदमों में लटक जाती हैं, तो कभी प्रशासनिक लापरवाहियों की भेंट चढ़ जाती हैं। ऐसे में उम्र के उस पड़ाव पर खड़ा युवा जहां वह ओवरएज होने की कगार पर होता है, थक-हारकर इन संविदा नौकरियों के जाल में आत्मसमर्पण कर देता है।
वह सोचता है कि बेरोजगार बैठने से बेहतर है कि कुछ तो हाथ में रहे, शायद कभी कोई सरकार मेहरबान होगी और उन्हें स्थायी कर दिया जाएगा। लेकिन सरकारें इन युवाओं की इसी मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें 'सस्ते बंधुआ मजदूर' की तरह इस्तेमाल करती हैं और काम निकल जाने पर टिशू पेपर की तरह फेंक देती हैं।
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक और कड़वा पहलू यह है कि हमारी व्यवस्था बिना दबाव और बिना हंगामे के कभी काम नहीं करती। जब तक कोई दीपक अपनी जान नहीं दे देता, जब तक कोई राजनेता या जन-आंदोलन सड़कों पर चक्का जाम नहीं कर देता, और जब तक सरकार को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती नहीं दिखाई देती, तब तक फाइलों में बंद रहने वाली सरकारी संवेदनशीलता कभी बाहर नहीं आती।
दीपक जब तक जिंदा था, अपनी नौकरी वापस पाने के लिए उसने अफसरों के सामने लाचारी की दुहाई दी, तब किसी अफसर या मंत्री का दिल नहीं पसीजा। लेकिन जैसे ही उसकी लाश सड़क पर आई और उस पर राजनीति का मंच सजा, तंत्र ने तुरंत 'सहानुभूति का कार्ड' खेल दिया। क्या यह इस बात का सीधा प्रमाण नहीं है कि हमारी व्यवस्था पूरी तरह से 'रिएक्टिव' वाली हो चुकी है, 'प्रोएक्टिव' वाली नहीं? न्याय और राहत पाने के लिए हमारे देश में हर बार किसी न किसी आंदोलन या किसी गरीब की लाश की जरूरत क्यों पड़ती है?
दीपक खरवाल का बलिदान राजस्थान सरकार और देश के तमाम नीति-नियंताओं के लिए एक अंतिम चेतावनी होनी चाहिए। संविदा पर कर्मचारियों को रखना और उन्हें न्यूनतम वेतन से भी कम देना मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है। अगर सरकारें पक्की नौकरियां देने में पूरी तरह असमर्थ हैं, तो कम से कम संविदा कर्मियों के लिए एक ऐसी पारदर्शी नीति तो बनाई ही जानी चाहिए, जिसमें नौकरी की एक निश्चित अवधि की सुरक्षा हो, ताकि किसी को भी मनमाने ढंग से नौकरी से न निकाला जा सके।
उनका मानदेय कम से कम इतना तो हो, जिससे एक परिवार सम्मान के साथ दो वक्त की रोटी खा सके। दीपक की पत्नी को मिली 8,000 रुपये की यह नौकरी कभी भी उस सूने हो चुके घर की खुशियां और उस बच्चे के पिता को वापस नहीं ला सकती। यह नौकरी सरकार के किसी अहसान का नहीं, बल्कि उसकी नाकामी का एक स्थायी दस्तावेज बनकर उस परिवार के साथ हमेशा रहेगी।
जनता के दरबार में पसीना बहाने का दावा करने वाले नेताओं और एसी कमरों में बैठकर नीतियां बनाने वाले नौकरशाहों को यह साफ-साफ समझना होगा कि युवाओं के सब्र का बांध अब पूरी तरह टूट रहा है। अगर समय रहते इस 'संविदा के शोषण' को बंद नहीं किया गया और युवाओं को रोजगार की सुरक्षा नहीं दी गई, तो हताशा का यह लावा समाज के भीतर किसी बड़े विद्रोह के रूप में फूटेगा।
दीपक की आत्मा आज इस गूंगे-बहरे तंत्र से चीख-चीखकर सवाल पूछ रही है कि 'क्या मेरी जिंदगी की कीमत सिर्फ 8,000 रुपये की एक अस्थायी नौकरी थी?' सरकार को इस सवाल का जवाब खोखले बयानों से नहीं, बल्कि अपनी नीतियों को बदलकर देना होगा। इस दर्दनाक हादसे और संविदा प्रथा पर आपकी क्या राय है।
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