सरकार ने पौने सत्तरह सौ करोड़ रुपया आपकी जेब से निकाला और एक नदी में फेंक दिया गया। इस बात को आज 8 साल हो चुके हैं, लेकिन उस 1676 करोड़ रुपये को वापस निकालने के सारे रास्त बंद हो गए हैं।
जयपुर में एक नदी थी जीवंत, बहती हुई, पूरे शहर की जीवनरेखा। और आज उसी नदी पर 1,676 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन उसके किनारे रहने वाले लोग दुर्गंध से बेहाल हैं, एनजीटी जुर्माना ठोक चुका है, और नदी एक बार फिर उसी गंदे नाले में तब्दील हो गई है जहाँ से उसे बचाने का दावा किया गया था, तो आखिर क्या हुआ इस शहर की नदी के साथ? यह कहानी है द्रव्यवती नदी की, जिसे जयपुरवासी दशकों तक अमानीशाह नाले के नाम से जानते रहे, और जिसे पुनर्जीवित करने के नाम पर जो हुआ, वह राजस्थान की सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलताओं की एक कहानी बन गई।
बात शुरू होती है सन् 1727 से, जब महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर शहर की नींव रखी। यह शहर किसी वीरान मैदान में नहीं बसा था। इसके पास एक नदी थी, नाहरगढ़ की पहाड़ियों से जन्म लेने वाली द्रव्यवती नदी, जो करीब 47 किलोमीटर तक बहती हुई ढूंढ नदी में जाकर मिलती थी। यह मौसमी नदी थी, बरसात में उफनती थी, और सूखे में धरती के भीतर जल संचित करती थी। किसान इससे खेत सींचते थे, पशुपालक अपने जानवरों को पानी पिलाते थे, धोबी कपड़े धोते थे, कुम्हार मिट्टी लेते थे। नदी केवल पानी नहीं देती थी, रोजगार देती थी, जीवन देती थी। महाराजा सवाई रामसिंह के कार्यकाल में तो इस नदी के पुनरुद्धार के लिए चार लाख रुपये की योजना बनाई गई थी, हालाँकि उस वर्ष सूखे और टिड्डी दल के प्रकोप के कारण वह योजना पूरी न हो सकी। फिर भी पुराने जयपुर में इस नदी का स्थान बेहद महत्वपूर्ण था, और शहर की पूरी जल-प्रबंधन व्यवस्था इसके इर्द-गिर्द बनाई गई थी।
लेकिन 20वीं सदी के साथ आया शहरीकरण का अंधड़, और उस अंधड़ में द्रव्यवती नदी का नामोनिशान मिटने लगा। शहर के विस्तार के साथ नदी के किनारे अतिक्रमण होने लगे। कारखानों, कॉलोनियों और नालों का गंदा पानी सीधे नदी में डाला जाने लगा। इतिहास में जाएं तो 1712 के आसपास मुगल सुबेदार अमानीशाह ने नदी के किनारे पर अपना पड़ाव डाला था। बाद में उसकी यहीं मौत हो गई और लोगों ने नदी के किनारे पर ही एक स्थान पर अमानीशाह की मजार बना दी। धीरे-धीरे लोगों ने नदी को भूल दिया, और उस मजार के नाम पर उसे "अमानीशाह नाला" कहने लगे। यह नाम बदलना केवल शब्दों का खेल नहीं था, यह उस नदी की मृत्यु की सार्वजनिक स्वीकृति थी। पिछले 100 वर्षों में अनेक स्थानों का प्रदूषित पानी, कचरा, अपशिष्ट, अतिक्रमण और मलबे ने इस नदी को इतना रौंद डाला कि एक समय जयपुर की जीवनरेखा कहलाने वाली यह नदी गंदे नाले का पर्याय बन गई। जो लोग नदी के किनारे रहते थे, वे अपना पता बताने में भी शर्माते थे।
फिर आया 2014 का वर्ष और वसुंधरा राजे ने राजस्थान की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। उनकी नजर इस गंदे नाले पर पड़ी और उन्होंने सपना देखा गुजरात के अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी द्वारा बनाए गए साबरमती रिवर फ्रंट जैसा। साबरमती में भी नदी प्रदूषित थी, लेकिन मोदी सरकार ने पहले सीवर रोके, एसटीपी प्लांट लगाए, और फिर दोनों किनारों पर वॉकवे, पार्क और लैंडस्केप विकसित किए। आज वह साबरमती रिवर फ्रंट गुजरात का सबसे चमकदार पर्यटन स्थल है। राजे ने यही मॉडल जयपुर में उतारने का निर्णय लिया। 18 मार्च 2016 को जयपुर विकास प्राधिकरण ने टाटा प्रोजेक्ट लिमिटेड और शंघाई अरबन कंस्ट्रक्शन ग्रुप के संयुक्त संघ को 1,676 करोड़ 93 लाख रुपये की इस परियोजना का ठेका दिया, जिसे अक्टूबर 2018 तक पूरा किया जाना था। योजना में 47 किलोमीटर लंबी नदी का कायाकल्प करना था, 170 एमएलडी क्षमता के पाँच एसटीपी प्लांट जो सीवर के गंदे पानी को साफ करके नदी में डालें, हर 300 मीटर पर चेक डैम ताकि नदी में पानी बना रहे, वॉकिंग ट्रेक, साइकिल ट्रेक, बॉटेनिकल गार्डन, थीम पार्क और भविष्य में नौकायन की सुविधा। यह भारत के किसी शुष्क क्षेत्र में नदी के कायाकल्प का पहला प्रयास था।
11 अप्रैल 2016 को काम शुरू हुआ। 26 महीनों की मेहनत के बाद 3 अक्टूबर 2018 को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जब आचार संहिता लगने वाली थी, वसुंधरा राजे ने 16 किलोमीटर के हिस्से का लोकार्पण किया। यह उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था, और उन्होंने भावुक होकर कहा, "जब मुझे यहाँ गंदे नाले से गुजरना पड़ता था, तभी मैंने इसे फिर से द्रव्यवती नदी बनाने का संकल्प लिया था। आज वह संकल्प पूरा हुआ।" लेकिन पूरे 47 किलोमीटर में से केवल 16 किलोमीटर ही बन पाया था और बाकी 31 किलोमीटर अधूरा था।
नवंबर 2018 में चुनाव हुए, वसुंधरा राजे सत्ता से बाहर हो गईं, और अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई। और यहीं से शुरू हुआ द्रव्यवती की असली त्रासदी का अगला अध्याय। नई सरकार ने टाटा प्रोजेक्ट्स को भुगतान रोक दिया। कंपनी का दावा था कि 2 अक्टूबर 2018 से वह नदी का संचालन और रखरखाव कर रही है, इसलिए उसे उसका मेहनताना चाहिए। जेडीए का रुख था कि मई 2022 के संपूरक समझौते से पहले का भुगतान नहीं बनता। विवाद इतना बढ़ा कि मामला वाणिज्यिक न्यायालय और राजस्थान उच्च न्यायालय तक पहुँच गया। टाटा प्रोजेक्ट्स ने 423 करोड़ रुपये के दावे के लिए मध्यस्थ के समक्ष अर्जी लगाई। भुगतान न मिलने से तंग आकर टाटा ने रखरखाव से हाथ खींच लिए और नदी फिर नाले में बदलने लगी।
अभी भी महज 10 प्रतिशत काम अधूरा है। गोनेर पुलिया से पदमपुरा पुलिया तक करीब दो किलोमीटर का हिस्सा, सीकर रोड पर मजार डैम के पास का हिस्सा अधूरा पड़ा है। 1,300 करोड़ से अधिक खर्च हो चुके हैं, लेकिन उस 10 फीसदी अधूरेपन की वजह से पूरी नदी की व्यवस्था चौपट है। पाँच एसटीपी प्लांट लगे हैं, फिर भी अनट्रीटेड सीवर का पानी लगातार नदी में गिर रहा है। एनजीटी ने इस पर जेडीए को कड़ी फटकार लगाई और जुर्माना ठोका। तीन-तीन महीने तक एसटीपी प्लांट बंद पड़े रहे हैं, नदी में स्थिर जल सड़ रहा है, काई और कचरा जमा हो रहा है, मच्छर पल रहे हैं और नदी के किनारे रहने वाले लाखों लोग बीमारियों के बीच जी रहे हैं।
अब सवाल यह है कि बीजेपी की वर्तमान सरकार, जिसकी खुद की पार्टी की यह परियोजना है, इसे पूरा क्यों नहीं कर रही? उच्च न्यायालय ने जेडीए और टाटा दोनों को आदेश दिए हैं कि रखरखाव जारी रखें और वार्षिक रिपोर्ट पेश करें, लेकिन अदालती आदेश और जमीनी हकीकत के बीच की खाई कभी बंद नहीं होती, जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति न हो। यह परियोजना पिछली सरकार की है, इसलिए वर्तमान सरकार को इसे श्रेय नहीं मिलेगा, यह सोच ही 8 साल से इस नदी को मार रही है।
अब आते हैं उस सवाल पर जो नदी के पेट तक पहुँचता है। नदी के तल को पक्का कर दिया गया, इसे पक्का करने से क्या नुकसान हुआ? रिवर फ्रंट बनाते समय नदी के तल और किनारों पर कंक्रीट डाल दी गई। यह देखने में सुंदर लगता है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ इसे घातक बताते हैं। नदी का प्राकृतिक तल मिट्टी, रेत और एक्वाफर से मिलकर बनता है, ये परतें बरसात का पानी सोखकर भूजल रिचार्ज करती हैं। जब कंक्रीट बिछा दी जाती है, तो बरसात का पानी धरती में नहीं उतरता, बल्कि सीधे बह जाता है। इससे एक तरफ भूजल रिचार्ज बंद हो जाता है, जिससे जयपुर का पहले से गिरता भूजल-स्तर और नीचे खिसकता है, और दूसरी तरफ नदी की चौड़ाई कम हो जाने और प्राकृतिक अवशोषण क्षमता नष्ट हो जाने से बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। कंक्रीट की नदी में पानी तेजी से बहता है, रुकता नहीं और वह रफ्तार बाढ़ आने पर शहर के निचले इलाकों में तबाही मचाती है।
यह है द्रव्यवती की दोहरी त्रासदी। न तो वह नदी बन सकी, न ही पुराना नाला रहा। 1,676 करोड़ खर्च हुए, पर पानी अभी भी गंदा है। सपना था लंदन के टेम्स रिवर फ्रंट जैसा, हकीकत है कि जिधर हवा चलती है उधर के लोग साँस नहीं ले सकते। जयपुर की यह नदी आज एक जिंदा सवाल है हमारे नेताओं से, हमारे अधिकारियों से, और हम सब जयपुर वासियों से, कि क्या हम अपनी नदी को जिंदा देखना चाहते हैं, या बस उसके ऊपर बने चमकदार वॉकवे पर सेल्फी लेकर संतुष्ट हो जाते हैं? कमेंट करके अपनी राय जरुर दीजिए।

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