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बांध बन गया रेगिस्तान

           

जयपुर की प्यास बुझाने वाली 'जीवन रेखा', एक ऐसा ऐतिहासिक गौरव जिसे अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर जगह मिली। लेकिन आज उसी झील की किस्मत में सिर्फ सूखी मिट्टी और अतीत की यादें बची हैं। आखिर कैसे जयपुर की शान कहा जाने वाला ये बांध, राजनीति, लालच और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया? सियासी भारत पर आज जानते हैं रामगढ़ बांध की 'असामयिक मृत्यु' की पूरी इनसाइड स्टोरी।

150 साल पहले, वर्ष 1876 की बात है, जयपुर के दूरदर्शी महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने बार—बार आने वाले बाढ़ को रोकने और जयपुर में जलापूर्ति के लिए रामगढ़ नाम से एक कृत्रिम झील की नींव रखी। यह सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जयपुर के लाखों लोगों के लिए राहत का प्रतीक थी। आजादी से पहले 1903 में इस बांध का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया था। तब रामगढ़ बांध से जयपुर की सम्पूर्ण आबादी को पानी पिलाया जाता था। साथ ही 30 से 40 गांवों की हजारों एकड जमीन को सिंचाई का पानी मिलता था। समय के साथ वक्त बदला, और साल 1982 में जब दिल्ली में एशियाई खेल हुए, तो इसकी लहरों ने दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित किया। यहाँ अंतरराष्ट्रीय नौकायन प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ। मानसून के बाद यह जयपुर का सबसे पसंदीदा पिकनिक स्पॉट बन जाता था, लेकिन किसे पता था कि यह रौनक चंद सालों की मेहमान है।

90 के शुरुआती दशक तक सबकुछ ठीक था, करीब 30 साल पहले तक रामगढ़ बांध जयपुर की लाइफ लाइन हुआ करता था, लेकिन उसके बाद जयपुर की बसावट तेजी से बदलने लगी। 1995 के बाद जयपुर के रईसों, अधिकारियों और नेताओं में फार्म हाउस बनाने की नई शैली विकसित हुई, जिसका खामियाजा रामगढ़ बांध को भुगतना पड़ा। अमीरों ने उस क्षेत्र में अपने फार्म हाउस बनाए, जहां से रामगढ़ में पानी के स्रोत थे। बांध के कैचमेंट एरिया में धीरे—धीरे अतिक्रमण बढ़ने लगे और साल 1999 के बाद इस झील में पानी की आवक पूरी तरह से बंद हो गई, और साल 2000 आते-आते यह विशाल झील पूरी तरह सूख गई। अगले दो—तीन साल में जयपुर की एक कृतिम झील रेगिस्तान में तब्दील हो गई। कहने का मतलब यह है कि 1999 से 2003 तक की कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के समय रामगढ़ बांध ने दम तोड़ दिया, जिसकी नींव कभी भाजपा की भैरोसिंह शेखावत सरकार के दौर में रखी गई थी। नेताओं के आरोप—प्रत्यारोप की राजनीति अपनी जगह चलती रही, लेकिन पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद होते चले गए। जिन अशोक गहलोत को संवेदनशील कहा जाता है, उन्हीं के शासनकाल में रामगढ़ बांध मर गया, किंतु रामगढ़ को लेकर मुख्यमंत्री की संवेदनाएं कभी जागी ही नहीं।

यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह जानबूझकर की गई एक प्रशासनिक हत्या थी! स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार और अफ़सरों की मिलीभगत ने इस झील को मौत के मुंह में धकेला। बाणगंगा और रोड़ा जैसी सहायक नदियों पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण हुए। जांच में सामने आया कि जिन आईएएस, आईपीएस अधिकारियों और रसूखदार नेताओं पर कानून लागू करने की जिम्मेदारी थी, उन्हीं ने रामगढ़ बांध के कैचमेंट एरिया में अपने आलीशान फार्महाउस खड़े कर लिए! साल 2011 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए इन अतिक्रमणों को हटाने का ऐतिहासिक आदेश दिया, लेकिन अफ़सोस, रसूखदारों के इन किलों पर आज तक कोई ठोस हथौड़ा नहीं चला।

झील भले ही सूख चुकी हो, लेकिन इस ज़मीन की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है। 1982 में घोषित 'रामगढ़ वन्यजीव अभयारण्य' आज भी चीतल, नीलगाय और कई दुर्लभ जीवों का आशियाना है। पास ही स्थित जमुवा माता का मंदिर और इतिहास को समेटे पुराने किले के खंडहर गवाही देते हैं कि यह इलाका जयपुर की आत्मा है। अगर इसे नहीं बचाया गया, तो यह पूरा इकोसिस्टम तबाह हो जाएगा। वर्षों के लंबे इंतज़ार के बाद, अब एक महत्वाकांक्षी योजना के ज़रिए रामगढ़ को पुनर्जीवित करने की तैयारी है। योजना है बीसलपुर बांध के उस पानी को यहाँ लाने की, जो हर कुछ सालों में ओवरफ्लो होकर व्यर्थ बह जाता है। इंजीनियर्स का दावा है कि मौजूदा पाइपलाइनों और पंप हाउसों को आपस में जोड़कर, लगभग 25 किलोमीटर तक 'रिवर्स पंपिंग' के ज़रिए पानी रामगढ़ पहुँचाया जा सकता है।

बीसलपुर बांध औसतन 4 साल में केवल 1 बार ओवरफ्लो होता है। 25 किमी रिवर्स पंपिंग में भारी बिजली की खपत और बड़ा बिल। पानी शुद्ध करने पर प्रति किलोलीटर लगभग 12 रुपये का खर्च। "लेकिन क्या यह राह इतनी आसान है? सच यह है कि तकनीकी रूप से संभव होने के बावजूद यह परियोजना कई चुनौतियों से घिरी है। बीसलपुर बांध हर साल ओवरफ्लो नहीं होता, औसतन 4 साल में सिर्फ एक बार ओवरफ्लो होता है! ऐसे में पानी की उपलब्धता हमेशा अनिश्चित रहेगी। एक साल पहले राजस्थान के कृषिमंत्री किरोड़ीलाल मीणा ने कृतिम बरसात करने के लिए लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन एक बूंद पानी नहीं मिला।

बताया जा रहा है कि टोंक जिले के ईसरदा बांध से जयपुर के ऐतिहासिक रामगढ़ बांध को पुनर्जीवित करने की महत्वाकांक्षी योजना "रामजल सेतु लिंक परियोजना" के नाम से पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना यानी ईआरसीपी के तहत चल रही है, जिसमें चंबल बेसिन का अधिशेष पानी पहले ईसरदा बांध में एकत्र होगा और फिर वहाँ से लगभग 120 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के जरिये रामगढ़ तक पहुँचाया जाएगा। पहले ईसरदा का पानी कानोता बांध के रास्ते लाने की योजना थी, लेकिन कानोता में आस-पास से गंदे पानी की आवक सामने आने के बाद योजना में संशोधन किया गया और अब पानी बस्सी-चाकसू मार्ग से होते हुए सीधे रामगढ़ पहुँचेगा। रास्ते में रघुनाथपुरा में 18 एकड़ भूमि पर एक मिलियन क्यूबिक मीटर क्षमता का मध्यवर्ती जलाशय बनेगा जहाँ से एक लिंक कानोता बांध के लिए भी दिया जाएगा। इस पूरे मार्ग पर लगभग 35 से 40 किलोमीटर नहर और 76 से 85 किलोमीटर पाइपलाइन बिछाई जाएगी जिसका व्यास 2600 मिलीमीटर यानी लगभग 8.5 से 10 फीट होगा, जो अपने आप में एक विशाल इंजिनियरिंग उपलब्धि होगी। 

पानी को ऊँचाई पर चढ़ाने के लिए ईसरदा, डील, ढूंढ और अमानीशाह के निकट दो से चार बड़े पंपिंग स्टेशन बनाने का प्रस्ताव है। रामगढ़ बांध में 55 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी पहुँचाने का लक्ष्य है जो बांध को दोबारा जीवंत करने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है। केवल ईसरदा-रामगढ़ फीडर लिंक की अनुमानित लागत 1,915 करोड़ रुपये है जबकि समग्र रामजल सेतु परियोजना की डीपीआर-लागत 89,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गई है जो 2015 में महज 37,000 करोड़ थी। अक्टूबर 2025 में हैदराबाद की जीवीपीआर इंजीनियर्स लिमिटेड को टेंडर मिला, किन्तु फरवरी 2026 तक निर्माण शुरू होने का लक्ष्य चूक गया और अभी भी अंतिम अलाइमेंट सर्वे जारी है। 

कंपनी को 48 महीने में कार्य पूरा करना है, इसलिए 2028 के अंत तक रामगढ़ में पानी पहुँचने की उम्मीद है, हालाँकि विशेषज्ञ 2028 से 2030 के बीच की समय-सीमा को अधिक यथार्थवादी मानते हैं। इस राह में भूमि अधिग्रहण, पाइपलाइन अलाइमेंट का अनिर्णय, पानी उठाने में भारी विद्युत-व्यय और कैचमेंट क्षेत्र में रसूखदारों के अवैध अतिक्रमण जैसी प्रशासनिक व तकनीकी अड़चनें मुँह बाए खड़ी हैं। यदि ये बाधाएँ दूर होती हैं तो जमवारामगढ़, आंधी, आमेर, जालसू और गोविंदगढ़ ब्लॉकों की लगभग 22 लाख आबादी का जल संकट स्थायी रूप से समाप्त हो सकता है।

रामगढ़ झील का पुनरुद्धार केवल एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है। यह जयपुर की विरासत, उसकी संस्कृति और उसके पर्यावरण को बचाने की आखिरी जंग है। जमवारामगढ़ के ग्रामीणों और जयपुर की जनता की उम्मीदें अब इसी परियोजना पर टिकी हैं। क्या बीसलपुर का पानी इस सूखी और सताए गए झील की प्यास बुझा पाएगा? क्या सरकारें अपने ही तंत्र के पैदा किए गए अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई कर पाएंगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन आज भी जयपुर की आँखें अपनी इस ऐतिहासिक झील में फिर से पानी की लहरें देखने का इंतज़ार कर रही हैं।


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