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जयपुर नगर निगम के कर्मचारी करते हैं 3.25 करोड़ की अवैध वसूली!


जयपुर में 3 करोड़ 25 लाख रुपये की अवैध वसूली हर महीने हो रही है, 65 हजार बिना वेरिफिकेशन के ठेले शहर की गलियों में जमे हैं, मुख्यमंत्री की सुरक्षा खतरे में है, और जिस कॉन्स्टेबल ने कानून का पालन किया उसे ही निलंबित कर दिया गया, तो आखिर यह शहर चला कौन रहा है, सरकार या ठेले वाले?

जयपुर की महल रोड पर एक लड़की का हाथ जला, एक कॉन्स्टेबल लाइन हाजिर हो गया, और नगर निगम ने कहा है कि उस हाथ जलने वाली लड़की को जयपुर की किसी प्राइम लोकेशन पर डेयरी बूथ आवंटित किया जाएगा। इस मामले में विपक्ष ने राजनीति की, अखबारों ने खबर छापी, लेकिन जो सवाल किसी ने नहीं पूछा वो यह है कि जिस जगह यह ठेला लगा था, वो जगह खुद नॉन वेडिंग जोन है, यानी वहाँ ठेला लगाना ही गैरकानूनी था, और उस एक गैरकानूनी ठेले के पीछे जयपुर में 65 हजार ऐसे अवैध ठेले और हैं, जिनसे नगर निगम के कर्मचारी हर महीने 3 करोड़ 25 लाख रुपये की अवैध वसूली कर रहे हैं, शहर का ट्रैफिक जाम कर रहे हैं, बिना किसी वेरिफिकेशन के बाहरी लोगों को जयपुर की गलियों में बसा रहे हैं, और सीएम की सुरक्षा तक को खतरे में डाल रहे हैं।

आज जो मामला हम उठाने जा रहे हैं वो एक जली हुई लड़की की कहानी से शुरू होता है, लेकिन खत्म होता है जयपुर नगर निगम, और ट्रैफिक पुलिस के उस गठजोड़ पर जो इस शहर को भीतर से खोखला कर रहा है।

जयपुर की महल रोड पर रेशु गुप्ता नाम की एक लड़की मोमोज का ठेला लगाकर अपने परिवार का गुजारा करती है। कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा उसी रोड से गुजर रहे थे। सीएम की सुरक्षा के लिए पुलिस रोड खाली करवा रही थी। एक पुलिसकर्मी ने ठेला हटवाने की कोशिश की, लड़की जल्दी नहीं हट पाई, धक्का लगा, बर्तन में भरा गरम पानी उसके बाएं हाथ पर गिरा और हाथ जल गया। पॉलिटिकल दबाव बना तो कॉन्स्टेबल निलंबित कर दिया गया। विपक्ष ने अखबारों से खबर पढ़ी और राजनीति शुरू कर दी। लड़की ने भी विक्टिम कार्ड खेला, और बात यहीं खत्म हो गई।

लेकिन असली कहानी यहीं से शुरु होती और यहीं पर वीवीआईपी सुरक्षा से लेकर जयपुर की सुरक्षा को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल यह कि क्या रेशु गुप्ता के पास महल रोड पर ठेला लगाने की कोई वैध अनुमति थी? क्या नगर निगम या जेडीए ने उसे वह जगह आवंटित कर रखी थी? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या महल रोड ठेले लगाने के लिए वेडिंग जोन है? जवाब यह है कि महल रोड नॉन वेडिंग जोन है, यानी वहाँ किसी भी ठेले, रेहड़ी, थड़ी का लगाना नगर निगम के अपने नियमों के तहत पूरी तरह गैरकानूनी है। तो जब ठेला ही गैरकानूनी था, तो जिस कॉन्स्टेबल ने कानून के दायरे में काम करते हुए उस ठेले को हटाने की कोशिश की, उसे निलंबित करना कहाँ का न्याय है? यह सरकार की कमजोरी है, दबाव में लिया गया फैसला है और उस कॉन्स्टेबल के साथ घोर अन्याय है।

अब आते हैं असली मुद्दे पर जो इस पूरे मामले की जड़ है। नगर निगम जयपुर के अनुसार शहर में 31 सड़कों पर वेडिंग जोन हैं, जहाँ ठेले लगाए जा सकते हैं और वहाँ हर ठेले से 1000 रुपये प्रति माह की पर्ची काटी जाती है। इन वेडिंग जोन में अधिकतम 9600 ठेले, रेहड़ी खड़े हो सकते हैं। यानी निगम को हर महीने इनसे 96 लाख रुपये की वैध आमदनी होनी चाहिए। यह व्यवस्था ठीक है, कानूनी है, पारदर्शी है। लेकिन इससे आगे जो होता है, वो जयपुर की सबसे बड़ी गंदगी है।

जयपुर में वैध रूप से 9600 ठेले लगाए जा सकते हैं, लेकिन इस समय जयपुर की सड़कों पर 65,000 से अधिक अवैध ठेले, रेहड़ी और थड़ियाँ चल रही हैं। यानी जितने ठेले होने चाहिए, उससे साढ़े छह गुना अधिक शहर में लगाए जा रहे हैं। और इन 65 हजार अवैध ठेलों की जानकारी नगर निगम को है, जेडीए को है, ट्रैफिक पुलिस को है, फिर भी यह सब चल रहा है। आखिर क्यों? क्योंकि इनसे निगम के कर्मचारी और अधिकारी खुद हर महीने 500 रुपये प्रति ठेले के हिसाब से वसूली करते हैं। 65,000 ठेले गुणा 500 रुपये, यानी हर महीने 3 करोड़ 25 लाख रुपये की अवैध वसूली। यह पैसा निगम के खाते में नहीं जाता, यह पैसा उन कर्मचारियों और अधिकारियों की जेब में जाता है जो इस व्यवस्था को जिंदा रखते हैं। तुलना करें तो निगम को वैध रूप से 96 लाख मिलते हैं और उसके कर्मचारी अवैध रूप से 3 करोड़ 25 लाख वसूलते हैं, यानी सरकारी खजाने से साढ़े तीन गुना अधिक पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।

अब इसका नतीजा क्या होता है? जयपुर की सड़कों पर ट्रैफिक जाम इसीलिए होता है। महल रोड हो या टोंक रोड, सीकर रोड हो या सांगानेरी गेट, हर जगह ठेले, रेहड़ियाँ सड़क के दोनों किनारे इस कदर जमे हैं कि वाहनों के लिए जगह ही नहीं बचती। सुबह के वक्त स्कूल जाने वाले बच्चे, दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, अस्पताल जाने वाले मरीज, सब जाम में फंसते हैं। लेकिन नगर निगम, जेडीए और ट्रैफिक पुलिस तीनों आँखें मूँदे बैठे हैं क्योंकि इनकी इस व्यवस्था में हिस्सेदारी है।

अब सबसे संवेदनशील पहलू पर आते हैं जो सीधे जयपुर की सुरक्षा से जुड़ा है। इन 65 हजार अवैध ठेलों में से कितने लोग यूपी, बिहार, बंगाल, झारखंड और दूसरे राज्यों से आकर बिना किसी पुलिस वेरिफिकेशन के जयपुर में ठेला लगा रहे हैं, यह किसी को नहीं पता। न निगम को, न जेडीए को, न पुलिस को। क्योंकि जब ठेला ही अवैध है, तो उस ठेले वाले का वेरिफिकेशन कहाँ से होगा? वसूली लेने वाले को बस 500 रुपये चाहिए, वो यह नहीं पूछता कि तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, तुम्हारा आधार कार्ड क्या है, तुम्हारे खिलाफ कोई आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है। और यही वो खतरनाक खामी है जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं। कितने ही मामलों में देखा गया है कि बाहर से आए ठेले वाले शहर की गलियों की पूरी भूगोल जान लेते हैं, यहाँ का नेटवर्क बना लेते हैं, और फिर चोरी, लूट, नशे की तस्करी और आतंकवाद जैसे अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं।

और अब आते हैं उस पहलू पर जो सबसे गंभीर है, मुख्यमंत्री की सुरक्षा। जिस महल रोड पर यह घटना हुई, वहाँ से मुख्यमंत्री गुजर रहे थे। उसी सड़क पर 65 हजार अवैध ठेलों जैसी प्रवृत्ति का एक ठेला खड़ा था। सोचिए अगर उस ठेले के पीछे कोई गलत इरादा होता? अगर उस भीड़ में कोई गलत इंसान होता? आपको याद होगा कि पिछले साल भी इसी महल रोड पर सीएम की सुरक्षा के दौरान एक पुलिसकर्मी की दुखद मृत्यु हो गई थी। इसके बावजूद जयपुर की इन अतिसंवेदनशील सड़कों पर अवैध ठेले जमे हुए हैं, बिना वेरिफिकेशन के बाहरी लोग तैनात हैं, और निगम के अधिकारी 500 रुपये लेकर उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं है, यह सुरक्षा में सेंध है।

तो अब सवाल यह है कि इसका समाधान क्या है? पहला, नगर निगम तुरंत जयपुर के सभी ठेले, रेहड़ी संचालकों का डिजिटल पंजीकरण करे, जिसमें आधार, पुलिस वेरिफिकेशन और मूल निवास प्रमाण अनिवार्य हो। दूसरा, वेडिंग जोन से बाहर किसी भी ठेले को खड़े रहने की अनुमति न दी जाए और इसे लागू करने की जिम्मेदारी नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस की संयुक्त रूप से तय हो। तीसरा, अवैध वसूली करने वाले नगर निगम के कर्मचारियों और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई हो। चौथा, नॉन वेडिंग जोन की सड़कों पर विशेषकर उन सड़कों पर जहाँ से वीआईपी मूवमेंट होता है, नियमित रूप से अतिक्रमण हटाने का अभियान चले।

लेकिन यह तब होगा, जब सरकार की इच्छाशक्ति होगी। अभी तो हालत यह है कि एक कॉन्स्टेबल ने कानून का पालन करते हुए नॉन वेडिंग जोन में अवैध ठेला हटाने की कोशिश की और उसे निलंबित कर दिया गया। इससे एक संदेश जाता है, अवैध काम करो, अवैध जगह ठेला लगाओ, अगर कोई हटाने आए तो शोर मचाओ, विपक्ष राजनीति करेगा और सरकार दबाव में कानून लागू करने वाले को ही सजा देगी। यह मानसिकता जयपुर को बर्बाद कर रही है। जयपुर स्मार्ट सिटी है, पर्यटन का केंद्र है, राजस्थान की राजधानी है। इस शहर की सड़कें साफ, सुरक्षित और जाम मुक्त होनी चाहिए। यह माँग अतिरिक्त नहीं है, यह हर जयपुरवासी का अधिकार है, जो एक को मिलना ही चाहिए। 

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