UGC रोलबैक क्यों चाहता है सवर्ण समाज?


17 जनवरी 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय से एक ऐसी खबर आती है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। विवि के 26 वर्षीय पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने अपने होस्टल कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।  रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय में PhD शोधार्थी था और अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन का सक्रिय सदस्य था। मौत के बाद पता चला कि जुलाई 2015 में विश्वविद्यालय ने उसे मिलने वाला 25 हजार रुपये का  मासिक स्टिपेंड रोक दिया था, जिसके बाद वो आर्थिक तंगी में आ गया। उसे और चार अन्य दलित छात्रों को होस्टल से भी निकाल दिया गया था। 

जिसका मुख्य कारण जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया गया। वेमुला और उनके समर्थकों कहा कि दलित होने के कारण प्रताड़ित किया गया। उसका स्टिपेंड बंद होने से कर्ज में डूब गया था। साथ ही विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव बनाने का आरोप लगाया गया। वेमुला ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि "मुझे अपनी आत्मा और शरीर के बीच बढ़ता अंतर महसूस हो रहा है... मैं एक राक्षस बन गया हूँ। मैं विज्ञान, तारों, प्रकृति से प्यार करता था, लेकिन फिर मैंने लोगों से प्यार करना सीखा, यह जाने बिना कि लोग प्रकृति से कब के अलग हो चुके हैं।" रोहित ने सीधे किसी को दोषी नहीं ठहराया, लेकिन "system" के प्रति निराशा जताई। 

2017 की केंद्रीय जांच आयोग रिपोर्ट में कहा गया कि आत्महत्या "व्यक्तिगत निराशा" के कारण हुई, न कि विश्वविद्यालय या मंत्रियों के दबाव से। इसके बाद 2024 की तेलंगाना पुलिस ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में दावा किया कि वेमुला दलित नहीं थे और उनकी SC सर्टिफिकेट की वैधता पर सवाल है। रोपाणवाल कमेटी की 2017 में आई रिपोर्ट ने कहा कि जातिगत भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न मुख्य कारण थे। वेमुला की मौत ने पूरे भारत में छात्र आंदोलन छेड़ दिया और "जातिगत भेदभाव" और "संस्थागत उत्पीड़न" पर बहस शुरू हुई। उनकी मौत दलित अधिकारों के प्रतीक बन गई। लेकिन आज 8 साल बाद भी न्यायिक प्रक्रिया अधूरी है, और वेमुला की मां राधिका वेमुला न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं। वामदलों, कांग्रेस और तमाम विपक्षी दलों ने इसको आरएसएस की विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते हुए सीबीआई जांच की मांग की।  

इसके करीब तीन साल बाद 22 मई 2019 को मुंबई के BYL नायर अस्पताल में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्रा 26 वर्षीय डॉ. पायल तडवी ने  के अपने होस्टल कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पायल तडवी भील (तडवी सब-कास्ट) जनजातीय समुदाय से आती थीं। उन्हें 3 सीनियर डॉ. हेमा अहुजा, भक्ति मेहरे और अंकिता खंडेलवाल द्वारा लगातार जातिगत उत्पीड़न, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था। चार्जशीट के अनुसार ये तीनों सीनियर्स डॉ. पायल को जातिगत ताने मारती थीं, उनके NEET स्कोर के बारे में पूछती थीं, उन्हें महत्वपूर्ण कामों से दूर रखती थीं, और मरीजों व सहकर्मियों के सामने अपमानित करती थीं। पायल ने अपनी आत्महत्या से पहले सुसाइड नोट में इन तीनों का नाम लिया था। मुंबई पुलिस ने तीनों को आत्महत्या के लिए उकसाने, सबूत नष्ट करने, और SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तार किया। 2025 में कोर्ट ने अस्पताल के पूर्व HOD डॉ. यी लिंग को भी आरोपी बनाया, क्योंकि उन्होंने शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की और उत्पीड़न को प्रोत्साहित किया। लेकिन आज 7 साल बाद भी केस चल रहा है और आरोपियों पर चार्ज फ्रेम होने की प्रक्रिया जारी है।

इन दोनों घटनाओं ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया। क्या देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा मजबूत सिस्टम है, जो जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों को समय पर सुने और पीड़ित छात्रों को सुरक्षा दे सके? रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं, राधिका वेमुला और अबेदा सलीम तड़वी ने वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में मांग की गई कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालयों में समानता और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने पर जोर दिया गया। सर्वोच्च अदालत के उसी आदेश के बाद UGC ने पुराने नियमों की समीक्षा शुरू की। इससे पहले हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूसंश में Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2012 लागू थे। इसमें Equal Opportunity Centre बनाने, Anti-Discrimination Officer नियुक्त करने और शिकायतों की निगरानी करने जैसी व्यवस्थाएं थीं।

लेकिन आलोचकों का कहना था कि ये नियम बहुत सामान्य थे और इनमें प्रभावी कार्रवाई की मजबूत व्यवस्था नहीं थी। इसके बाद UGC ने नया ढांचा तैयार किया और 13 जनवरी 2026 को UGC का नया फैसला सामने आया, जिसमें यूजीसी ने गजट नोटिफिकेशन जारी करते हुए UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 जारी कर दिया। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों में भेदभाव रोकना, शिकायतों के लिए मजबूत व्यवस्था बनाना, Equity Committee और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना। इसके जरिए UGC का तर्क था कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर और सुरक्षित वातावरण जरूरी है। यूजीसी ने इन नियमों में एससी, एसटी और ओबीसी के छात्रों के लिए सुरक्षा कवच दिया गया था, लेकिन अधिसूचना जारी होते ही विवाद शुरू हो गया। सवर्ण समाज का कहना है कि यूजीसी ने सामान्य वर्ग के छात्रों पर संभावित अत्याचारों पर कोई बात नहीं कही है। उनका सबसे बड़ा आरोप था कि नियमों में “जाति आधारित भेदभाव” की परिभाषा ऐसी है, जिसमें SC, ST और OBC के खिलाफ भेदभाव को विशेष रूप से शामिल किया गया, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए समान सुरक्षा स्पष्ट नहीं दिखाई देती। अगर किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता है तो उसका क्या होगा? झूठी शिकायतों से बचाव की व्यवस्था कहां है? शिकायत समितियों में सभी वर्गों का संतुलित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? ये सवाल आंदोलन और राजनीतिक विवाद का कारण बने। 

यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं। 29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC Equity Regulations, 2026 पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि नियमों के कुछ प्रावधानों में गंभीर संवैधानिक सवाल हैं। कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि प्रावधान अस्पष्ट रहे तो इसके व्यापक प्रभाव हो सकते हैं और समाज में विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों रोक लगाते हुए केंद्र सरकार से कहा कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार करे। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि UGC के 2026 नियमों की दोबारा समीक्षा की जा रही है। यानी सरकार ने न तो पूरी तरह नियमों को वापस लिया और न ही उसी रूप में लागू करने पर जोर दिया।

सरकार चाहती है कि कैंपस में भेदभाव रोकना जरूरी है, लेकिन नियम ऐसे हों, जिनमें सभी वर्गों के अधिकारों और निष्पक्षता का संतुलन बना रहे। रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौत से शुरू हुई बहस आज एक बड़े संवैधानिक सवाल में बदल गई है। सवाल यह उठता है कि क्या समानता की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा देंगे? एक पक्ष कहता है कि कमजोर वर्गों को विशेष सुरक्षा के बिना वास्तविक समानता संभव नहीं है। दूसरा पक्ष कहता है कि कानून ऐसा होना, चाहिए जिसमें किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव की शिकायत का समान अधिकार हो और दुरुपयोग की संभावना कम से कम हो। इसे लेकर सवर्ण समाज ने मोदी सरकार से नाराजगी जताते हुए इसे वापस लेने की मांग पर आंदोलन छेड रखे हैं, जिसके कारण सोशल मीडिया पर सवर्ण समाज के लोगों द्वारा भाजपा के खिलाफ वोट देने की अपील की जा रही है। केंद्र सरकार ने कहा है कि नियमों पर कोर्ट ने रोक लगा रखी है और इसपर मंथन किया जा रहा है, जबकि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि प्रस्ताव है, न तो अब तक कानून बना है और न ही बनेगा। अब नजर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के अगले कदम पर है, क्योंकि यह केवल एक UGC नियम का विवाद नहीं है, सवाल उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता, सामाजिक न्याय और निष्पक्षता के संतुलन का है। आपको क्या लगता है, इस विवाद का समाधान कैसे किया जा सकता है?

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