उस रात लखनऊ की सड़कों पर एक अजीब सी राजनीतिक बेचैनी थी। भाजपा को उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई बहुमत मिल चुका था, मगर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं था। मनोज सिन्हा और केशव प्रसाद मौर्य जैसों का नाम चल रहा था, लेकिन जिस नाम की चर्चा तक नहीं थी, वही अगले 24 घंटों में इतिहास बदलने वाला था। यह कहानी है उस उलटफेर की, जिसने गोरखपुर के एक मठ के महंत को उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचा दिया।
साल 2017 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के लिए चुनाव का ऐलान हुआ। 11 फरवरी से 8 मार्च तक, 7 चरणों में मतदान हुआ, जिसमें करीब 61 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने वोट डाले। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहद अहम था। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य था, और यहां की सत्ता का मतलब था, दिल्ली की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाना। पार्टी ने पूरा जोर लगाया, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद दर्जनों रैलियां कीं, लेकिन एक बात साफ थी, भाजपा ने इस चुनाव में किसी एक चेहरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था। योगी आदित्यनाथ, जो गोरखपुर से लगातार 5 बार सांसद रह चुके थे, वे चुनाव प्रचार में एक प्रभावशाली और लोकप्रिय चेहरा जरूर थे, मगर पार्टी की आधिकारिक रणनीति में उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं था।
11 मार्च को नतीजे आए, और नतीजों ने सबको चौंका दिया। भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 403 सीटों में से 312 सीटें मिलीं, यह एक ऐतिहासिक जीत थी। सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी गठबंधन सिमटकर 54 सीटों पर रह गया, और बहुजन समाज पार्टी को महज 19 सीटें मिलीं। अब सवाल यह था कि इतनी बड़ी जीत के बाद मुख्यमंत्री कौन बनेगा? दिल्ली में पार्टी नेतृत्व के भीतर मंथन शुरू हुआ। कई नाम सामने आए और गए, लेकिन कोई तय नहीं हो पा रहा था। इसी उलझन के बीच एक दिलचस्प बात हुई, नतीजों वाले दिनों के आसपास योगी आदित्यनाथ को विदेश यात्रा पर जाना था, लेकिन आखिरी समय पर प्रधानमंत्री कार्यालय से उनका पासपोर्ट लौटाया गया और उन्हें उन दिनों देश में ही रुकने को संकेत दिया गया। उस वक्त शायद खुद योगी आदित्यनाथ को भी अंदाजा नहीं था कि यह इशारा कितना बड़ा मोड़ लाने वाला है।
फिर आया 17 मार्च 2017 का दिन का वो दिन, जब दिल्ली में भाजपा आलाकमान अचानक सक्रिय हो गया। उस वक्त योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के अपने मठ में, अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त थे। भाजपा द्वारा उन्हें तुरंत दिल्ली बुलाया गया। उनके लिए विशेष विमान भेजा गया, और जब वे दिल्ली पहुंचे, तो पार्टी नेतृत्व ने उनके सामने प्रस्ताव रखा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का। यह वह पल था, जब राजनीतिक पंडितों की हर भविष्यवाणी गलत साबित हो गई। कहा जाता है कि इस फैसले के पीछे एक बड़ी वजह यह भी रही कि योगी आदित्यनाथ के हजारों समर्थक चुनाव नतीजों के बाद से ही लखनऊ की ओर उमड़ने लगे थे, हर तरफ से एक ही मांग उठ रही थी, कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ ही बैठें। पार्टी नेतृत्व ने जनभावना और संगठन की ताकत, दोनों को भांपते हुए यह फैसला लिया।
18 मार्च को भाजपा विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें खुद अमित शाह ने योगी के नाम का प्रस्ताव रखा और इसी बैठक में योगी आदित्यनाथ को विधायक दल का नेता चुना गया। अगले ही दिन, 19 मार्च 2017 को, लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में एक भव्य समारोह आयोजित हुआ। हजारों की तादाद में लोग जुटे, राजनीतिक हस्तियां मौजूद रहीं, और उसी मंच पर योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, और 22 कैबिनेट मंत्रियों तथा 22 राज्यमंत्रियों ने भी इसी समारोह में शपथ ग्रहण की। यह पहली बार था, जब कोई मठाधीश, कोई साधु, देश के सबसे बड़े राज्य की कमान संभाल रहा था।
ऐसा नहीं है कि योगी आदित्यनाथ को ये सब आसानी से मिल गया था। योगी का यह सफर आसान नहीं था। उनका मूल नाम अजय सिंह बिष्ट था, जिनका जन्म 5 जून 1972 को हुआ था। अल्पायु में ही उन्होंने घर छोड़ दिया था और महज 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने सांसारिक जीवन त्यागकर नाथ संप्रदाय के प्रमुख मठ गोरखनाथ मंदिर की गद्दी संभाली, और अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा ली। यहीं से गोरखपुर की राजनीति में उनकी दमदार एंट्री हुई, और आगे चलकर वे 5 बार सांसद बने। फिर भी, 2017 से पहले तक कोई यह सोचने को तैयार नहीं था कि यही व्यक्ति उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राज्य की बागडोर संभालेगा।
इस घटना से करीब 10 साल पहले 12 मार्च 2007 को अंदाज़ में बेहद आक्रामक और फायरब्रांड छवि वाला एक साधु नेता, जो अपने तीखे बयानों के लिए जाना जाता था, वो संसद के भीतर अचानक फूट फूटकर रो पड़ता है। पूरा सदन खामोश हो जाता है, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी खुद उनसे पूछते हैं कि आखिर माजरा क्या है। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ की असली जिंदगी का वह पल था, जिसने बरसों बाद एक और बड़ी कहानी की नींव रखी।
बात शुरू होती है साल 2005 से, जब पूर्वांचल के मऊ जिले में रामलीला के आयोजन के दौरान भीषण साम्प्रदायिक तनाव फैल गया। उस दौर में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद थे, और गोरक्षपीठ के महंत भी। जब वे मऊ के इलाकों का दौरा करने पहुंचे, तो उनके काफिले पर हमला हो गया। हालात इतने बिगड़े कि उनके सुरक्षाकर्मियों को गोली चलानी पड़ी, जिसमें एक युवक की जान चली गई। इसके बाद आसपास के इलाकों में हिंसा और भड़क उठी, और प्रशासन ने योगी आदित्यनाथ समेत उनके सैकड़ों समर्थकों के खिलाफ मामले दर्ज कर दिए। उस वक्त उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, और 2007 में योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार कर करीब 11 दिनों तक जेल में रखा गया।
जब वे जेल से बाहर आए, तो उन्होंने 12 मार्च 2007 को लोकसभा अध्यक्ष से विशेष अनुमति लेकर सदन में अपनी बात रखने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि किस तरह उनके समर्थकों को झूठे मामलों में फंसाया गया, किस तरह पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ी, और किस तरह गोरखपुर व आसपास के इलाकों में शांति भंग करने के आरोप में लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। यह सब बताते बताते योगी आदित्यनाथ की आवाज भारी हो गई, और वे संसद के भीतर सबके सामने फूट—फूटकर रोने लगे। उस समय के लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने खुद उनसे इस भावुकता की वजह पूछी थी। जिस नेता की छवि सख्त और उग्र मानी जाती थी, उसका यह भावुक रूप कैमरे में कैद होकर बरसों बाद भी सुर्खियां बनता रहा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली कहानी शुरू होती है 2017 में जब योगी आदित्यनाथ खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। सीएम बनते ही उन्होंने प्रदेश में माफिया राज के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया। पूर्वांचल में दशकों तक दबदबा रखने वाले माफिया मुख्तार अंसारी पर पुराने मामलों में दोबारा शिकंजा कसा गया। सरकार ने अदालतों में पुराने फैसलों को चुनौती दी, गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई तेज हुई, और महज डेढ़ साल के भीतर मुख्तार अंसारी को 8 अलग—अलग मामलों में सजा सुनाई गई, जिनमें 2 बार उम्रकैद भी शामिल थी। उस पर कुल 65 मामले दर्ज थे। अंततः 28 मार्च 2024 को बांदा जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद मुख्तार अंसारी की मौत हो गई। परिजनों ने उसे जेल में धीमा जहर दिए जाने का आरोप लगाया, हालांकि प्रशासनिक जांच में उसकी मौत की वजह हार्ट अटैक बताई गई।
अंसारी के अलावा प्रयागराज और पूर्वांचल का सबसे बड़ा माफिया डॉन अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ सालों तक आतंक का पर्याय बने रहे। योगी राज में अतीक के अरबों रुपये के साम्राज्य को ध्वस्त किया गया। फरवरी 2023 में उमेश पाल हत्याकांड के बाद, अतीक के बेटे असद अहमद को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया। इसके बाद 15 अप्रैल 2023 को पुलिस कस्टडी में मेडिकल जांच के दौरान 3 हमलावरों ने अतीक और अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी थी। कानपुर के बिकरू गांव में जुलाई 2020 में 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या करने वाला गैंगस्टर विकास दुबे फरार हो गया था। मध्य प्रदेश से गिरफ्तारी के बाद यूपी लाते समय 10 जुलाई 2020 को एसटीएफ के साथ हुई एनकाउंटर में वह मारा गया। अंबेडकरनगर का रहने वाला और अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन का करीबी शूटर खान मुबारक भी योगी सरकार की रडार पर था। जेल में बंद रहने के दौरान जून 2023 में बीमारी के चलते उसकी मौत हो गई। योगी सरकार द्वारा तैयार की गई 60 से अधिक कुख्यात माफियाओं की सूची के आधार पर अब तक ताबड़तोड़ कार्रवाई हुई है। पुलिस रिकॉर्ड्स के अनुसार, 2017 से अब तक राज्य में हजारों पुलिस मुठभेड़ें हुई हैं, जिनमें 200 से अधिक इनामी अपराधी मारे जा चुके हैं और हजारों अपराधी पैर में गोली लगने के बाद सलाखों के पीछे पहुंचे हैं। अपराधियों की लगभग 20 से 25 अरब रुपये से अधिक की अवैध संपत्ति को जब्त या जमींदोज किया जा चुका है।
जो व्यक्ति कभी सत्ता की मार से टूटकर संसद में रोया था, वही जब खुद सत्ता की कुर्सी पर बैठा, तो उसने उत्तर प्रदेश की अपराध राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल दी। यही राजनीति है, समय बदलता है, और सत्ता का पहिया कभी किसी का इंतजार नहीं करता।
आज, इतने बरस बाद, यह कहानी और भी दिलचस्प लगती है, क्योंकि जो शख्स कभी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कहीं शामिल नहीं था, वह उत्तर प्रदेश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्रियों में शुमार हो चुका है। 2022 में दोबारा बहुमत मिलने पर योगी आदित्यनाथ लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, और आज तक की गद्दी संभाले हुए हैं। यह कहानी हमें बताती है कि राजनीति में कभी भी कुछ भी तय नहीं होता, एक अचानक लिया गया फैसला, एक विशेष विमान की उड़ान, और जनसमर्थन की एक लहर, इतिहास की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। अब वही योगी अगले साल फ़रवरी में फिर से चुनावी मैदान में उतरेंगे और उत्तर प्रदेश की जनता से अपने 10 साल के सुशासन के दम पर फिर से जनमत जुटाने की कोशिश करेंगे।

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