35 लाख करोड़ का सपना, फ्रांस के राजदूत की चिट्ठी और RIICO के अफसरों की बंदरबांट

आज एक ऐसे पत्र की बात करते हैं जो राजस्थान सरकार की पोल खोल देता है। यह पत्र किसी विपक्षी नेता ने नहीं लिखा, किसी पत्रकार ने नहीं लिखा। यह पत्र भारत में फ्रांस के राजदूत थियरी माथौ ने 20 मार्च 2026 को सीधे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को लिखा है। और इस पत्र में जो लिखा है वो राजस्थान की उस पूरी कहानी की कलई खोल देता है, जिसे "Rising Rajasthan" कहा जाता है।

पहले यह समझते हैं कि पत्र क्या कहता है। फ्रांस की कंपनी सोफ्लेट माल्ट इंडिया, जो माल्ट उद्योग की दुनिया की अग्रणी कंपनी है, वो राजस्थान में निवेश करना चाहती थी। Rising Rajasthan Global Investment Summit 2024 में 35 लाख करोड़ के MOU हुए थे, जो राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा निवेश है। इसी समिट में सोफ्लेट माल्ट इंडिया ने भी राजस्थान में निवेश का MOU किया। मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई, सकारात्मक बातें हुईं, सहमति बनी। कंपनी राजस्थान में ज़मीन लेकर उद्योग लगाना चाहती थी, लेकिन और यही वो "लेकिन" है जो सब कुछ बदल देता है। RIICO, यानी राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम ने उस कंपनी को ज़मीन नहीं दी और जो ज़मीन देने की बात की तो उसकी कीमत "substantially higher" यानी बहुत ज़्यादा बताई, जो पहले की बातचीत से मेल नहीं खाती है। साथ ही ज़मीन आवंटन की timeline December 2026 तक खिंच दी, यानी करीब एक साल और इंतज़ार करो। फ्रांस के राजदूत माथौ ने साफ लिखा कि "These conditions place the project at serious risk." यानी इन हालात में प्रोजेक्ट खतरे में है।

अब ज़रा सोचो, एक विदेशी कंपनी, मुख्यमंत्री से मुलाकात, MOU पर दस्तखत, सब कुछ तय और फिर भी उसे ज़मीन नहीं मिली। यह कैसे हुआ? कोई फाइल कहाँ अटकी? किसने रोकी? और क्यों रोकी? जवाब उस सिस्टम में छुपा है जो Rising Rajasthan की चमक के पीछे काम करता है। RIICO वो संस्था है, जिसकी ज़िम्मेदारी निवेशकों को ज़मीन देना है, उनकी मदद करना है, वही RIICO आज निवेशकों की सबसे बड़ी रुकावट बन गई है। सरकार ने राजनिवेश प्लेटफॉर्म बनाया, single window system बनाया, RIPS 2024 की घोषणा की और कहा कि निवेश प्रक्रिया को digitise करके simplify किया गया है, लेकिन अगर single window system होता तो फ्रांस के राजदूत को मुख्यमंत्री को पत्र क्यों लिखना पड़ता? अगर फाइल अटक रही है, ज़मीन नहीं मिल रही, कीमत बदल रही है तो single window system किस काम का है?

कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सीधा सवाल पूछा कि "आखिर कौन हैं जो फाइल रोककर बैठा है? किसके इशारे पर निवेश अटकाया जा रहा है? क्या निवेशकों को जानबूझकर उलझाकर माल कूटने की सेटिंग के लिए मजबूर किया जा रहा है?" और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा कि "Rising Rajasthan असल में Joke of Rajasthan बन गया है।" यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, यह फ्रांस के राजदूत के पत्र से पुष्ट हो चुकी सच्चाई है। रीको का सारा काम उद्योग मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ के हाथ में है, यानी जमीन किसे देनी है, किसे नहीं देनी है, कहां देनी है,​ कितनी देनी है, कब देनी है, कितनी दरों पर देनी है, यह काम उद्योग​ विभाग के मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ तय करते हैं। अब आप समझ ही गये होंगे कि फ्रांस वाली कंपनी किस रीलबाज मंत्री के सामने मजबूर होकर सीएम को अरदास करने को मजबूर हुई है।

अब यह पहला मामला नहीं है। राजस्थान में निवेश समिट का इतिहास देखो, हर सरकार आती है, बड़े-बड़े MOU होते हैं, बड़े-बड़े दावे होते हैं और ज़मीन पर कुछ नहीं होता। खुद मुख्यमंत्री ने 11 दिसंबर 2025 को progress report card देने का वादा किया था, वो report card कहाँ है? वो progress कहाँ है? समिट में मुकेश अंबानी, अनिल अग्रवाल, आनंद महिंद्रा, करण अढानी, सबने राजस्थान में निवेश के वादे किए। अनिल अग्रवाल ने 1 लाख करोड़ का ऐलान किया। करण अढानी ने 7.5 लाख करोड़ का। कुल 35 लाख करोड़ के MOU हुए, जो राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा निवेश था। लेकिन एक फ्रांसीसी कंपनी जो ज़मीन के लिए आई, उसे RIICO के अफसरों ने भटकाया, उद्योग मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने अटकाया। तो सोचो, जो बड़े उद्योगपति हैं, जिनके पास पैसा है, पहुँच है, दबाव है वो तो किसी तरह काम निकाल लेते हैं, लेकिन जो मझोले या छोटे निवेशक हैं, जो विदेशी कंपनियाँ हैं, जिनका भारत में कोई नेटवर्क नहीं, वो कहाँ जाएंगे?

अब इसका असली खेल समझो। राजस्थान में सरकारी ज़मीन RIICO की, ज़मीन एक बेशकीमती संपत्ति है। और जब कोई निवेशक आता है, MOU करता है, ज़मीन माँगता है तो वो सिस्टम के हाथ में होता है। और इसका सिस्टम किसके हाथ में होता है, उद्योग मंत्री के हाथ में, और उद्योग मंत्री कौन हैं, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, जो खुद को सबसे एक्टिव, सबसे ईमानदार, सबसे बड़े विकास पुरुष के रूप में रीलबाजी करते हैं। तो इनका सिस्टम यह है कि फाइल अटकाओ, कीमत बढ़ाओ, timeline खिंचाओ और फिर देखो कि निवेशक कितना "सहयोग" करता है। शायद यही वो सेटिंग है, जिसका जिक्र कांग्रेस अध्यक्ष डोटासरा ने किया। यही वो कमीशनखोरी है जो Rising Rajasthan के चमकदार मंच के पीछे चल रही है। और यही वजह है कि राजस्थान में बार-बार निवेश समिट होती है, लेकिन फिर भी निवेश नहीं आता है।

एक सवाल और जो सबसे ज़रूरी है। राजस्थान का आम युवा इन समिटों को टीवी पर देखता है। बड़े उद्योगपतियों को मुख्यमंत्री के साथ बैठे देखता है। लाखों करोड़ के MOU के आँकड़े सुनता है। और सोचता है कि शायद अब नौकरी मिलेगी। शायद अब उद्योग आएगा। शायद अब गाँव के पास कोई factory खुलेगी। लेकिन जब RIICO के मंत्री और अफसर फाइल रोककर बैठे हों, ज़मीन की कीमत दोगुनी कर दें, और विदेशी निवेशक को भटकाएं तो वो युवा का सपना भी उसी फाइल में दब जाता है।

दोस्तों, 20 मार्च 2026 को लिखा गया फ्रांस के राजदूत का यह पत्र सिर्फ एक कंपनी की शिकायत नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम की पोल खोलता है जो Rising Rajasthan के नाम पर वाहवाही लूट रहा है और निवेशकों को भटकाकर राजस्थान की ज़मीन की बंदरबांट कर रहा है। सरकार ने कहा था कि "MOU को full force से implement किया जाएगा।" तो हे सरकार, उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और RIICO के उन अफसरों का क्या, जो full force से निवेश रोक रहे हैं? उनके खिलाफ कब action होगा? और राजस्थान का वो युवा जो रोज़गार का इंतज़ार कर रहा है, उसे कब जवाब मिलेगा?

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