युवाओं और गांवों के चुनाव क्यों नहीं करावा रही सरकार?


आज की शुरुआत एक ऐसे सवाल से करते हैं जो राजस्थान का हर युवा, हर गाँव का आदमी और हर शहर का नागरिक पूछ रहा है। सवाल यह है कि इस राजस्थान की भाजपा सरकार ने राजनीति में आने के सारे रास्ते बंद क्यों कर दिए? पहले कॉलेज—विवि की राजनीति बंद की। अब गाँव की सरकार बंद है। आखिर यह सरकार किससे डरती है, युवाओं से या आम जनता से?

आगे बढ़ने से पहले एक बात समझो। भारत में राजनीति की सीढ़ी नीचे से ऊपर चढ़ती है। छात्रसंघ से शुरू होती है, पंचायत से मज़बूत होती है, विधानसभा तक पहुँचती है और संसद पर जाकर खत्म होती है। आज की तारीख में राजस्थान में यह सीढ़ी के दो सबसे नीचे के पायदान छात्रसंघ और पंचायत, दोनों टूटे पड़े हैं और यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि सरकार की सोची समझी रणनीति लग रही है।

पहले छात्रसंघ की बात करते हैं। 12 अगस्त 2023 को भाजपा की राजस्थान सरकार ने एक प्रशासनिक आदेश जारी करके राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव पर रोक लगा दी। रोक का कारण बताया परीक्षाएं, शैक्षणिक कैलेंडर, लिंगदोह समिति की सिफ़ारिशें। सरकार हाईकोर्ट गई, अर्जी में कुलपतियों की चिट्ठियाँ लगाईं, और कहा कि फिलहाल चुनाव संभव नहीं। दोस्तों, यही सरकार लोकसभा चुनाव करा सकती है, विधानसभा उपचुनाव करा सकती है, लेकिन कॉलेज का छात्रसंघ चुनाव नहीं करा सकती? छात्र नेताओं ने सीधा आरोप लगाया कि "भाजपा सरकार नहीं चाहती कि युवा आगे बढ़े और राजनीति में अपना भविष्य बनाए।" राजस्थान भर में सैकड़ों युवा सड़कों पर उतरे, राजस्थान विवि में आंदोलन हुए और छात्र जेल भी गए, श्रीगंगानगर में पुलिस से झड़प हुई, अलवर में मत्स्य विश्वविद्यालय का गेट जाम हुआ। लेकिन सरकार के कान पर जूँ नहीं रेंगी। "छात्रसंघ चुनाव ही राजनीति की पहली सीढ़ी है और इसे बंद करना मतलब युवाओं का भविष्य बंद करना है।"

अब पंचायत चुनाव की कहानी पर आते हैं। यहाँ आँकड़े सुनो और खुद हिसाब लगाओ। राजस्थान में 11,000 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं और 309 नगरीय निकाय हैं। 4 करोड़ 2 लाख से अधिक मतदाता अपने जनप्रतिनिधि चुनने का इंतज़ार कर रहे हैं। 55 नगरपालिकाओं का कार्यकाल नवंबर 2024 में ही खत्म हो गया था, करीब डेढ़ साल पहले, लेकिन चुनाव नहीं हुए। सरकार ने वहाँ सरकारी अफ़सर बिठा दिए। मतलब जिसे जनता ने नहीं चुना, वो शासन कर रहा है। यह लोकतंत्र है या सरकार की तानाशाही?

14 नवंबर 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट ने 439 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और निकाय दोनों के चुनाव हर हाल में होने चाहिए। 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन पूरा करो। और साफ कह दिया कि परिसीमन को चुनाव टालने का बहाना नहीं बनाया जा सकता। सरकार ने क्या किया? हाईकोर्ट के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी 15 अप्रैल की डेडलाइन बरकरार रखी। सरकार ने वहाँ भी वादा किया चुनाव होंगे, हम करा देंगे।" और फिर 113 नगरीय निकायों में चुनाव टालने के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा दी। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में वादा किया कि "चुनाव कराएंगे।" दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में ही अर्जी लगाई कि "चुनाव टाल दो।" दोस्तों, सरकार का यह दोहरा रवैया क्या है?

क्योंकि सियासी भारत एकतरफा नहीं बोलता। इसलिए अब सरकार की मजबूरी भी समझो। सरकार के सामने असली पेंच है OBC आरक्षण। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि OBC आरक्षण के लिए Triple Test पूरा होना चाहिए। OBC आयोग की रिपोर्ट अभी तक सरकार को नहीं मिली और बिना OBC आरक्षण तय किए चुनाव हुए तो जाट, गुर्जर, माली, कुम्हार जैसे सभी OBC समुदाय नाराज़ होंगे। भाजपा सरकार की वोट बैंक की राजनीति इसी में फँसी है, लेकिन एक सवाल यह कि OBC रिपोर्ट दो साल में क्यों नहीं बनी? क्या यह जानबूझकर लटकाई गई, ताकि चुनाव टालने का बहाना मिलता रहे?

कांग्रेस यानी विपक्ष सीधे कह रहा है कि यह देरी सुनियोजित है। गहलोत के करीबी पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी। उनका कहना है कि "सरकार जानती है कि अभी चुनाव हुए तो नुकसान होगा, इसलिए बहाने ढूंढ रही है।" सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि प्राकृतिक आपदा जैसी गंभीर परिस्थितियों को छोड़कर स्थानीय निकाय चुनाव स्थगित नहीं किए जा सकते। तो राजस्थान में आपदा कौन सी है? OBC रिपोर्ट न बनना या सरकार की इच्छाशक्ति न होना?

अब फ़ायदा और नुकसान की बात करते हैं। जनता का नुकसान सबसे ज़्यादा है। जब निर्वाचित सरपंच नहीं है तो विकास कार्य रुके पड़े हैं। पैसा दिल्ली से आता है, लेकिन खर्च करने वाला जनप्रतिनिधि नहीं है। सरकारी अफ़सर बैठा है, जिसे गाँव की ज़रूरत से कोई मतलब नहीं। जो युवा लाखों रुपये लगाकर चुनाव की तैयारी कर चुके हैं, वे घर बैठे हैं। जो महिलाएं पहली बार राजनीति में आना चाहती थीं, उनका वक्त बर्बाद हो रहा है और सरकार को फायदा? जब प्रशासक बैठा है तो सरकार की मनमर्जी चलती है। कोई जनप्रतिनिधि नहीं जो सवाल पूछे। लेकिन यह फायदा उधार का है, जब चुनाव होंगे तो जनता का गुस्सा वोट में दिखेगा।

अब 15 अप्रैल 2026 कि वो डेडलाइन महज़ कुछ ही दिन दूर है। अभी तक चुनाव अधिसूचना जारी नहीं हुई। अगर 15 अप्रैल तक चुनाव नहीं हुए तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होगी और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मतलब मुख्यमंत्री और मंत्रियों तक को कोर्ट में जवाब देना होगा। तो दोस्तों, तस्वीर साफ़ है। पहले छात्रसंघ चुनाव बंद करके युवाओं की राजनीति की पहली सीढ़ी तोड़ी। अब पंचायत चुनाव टालकर दूसरी सीढ़ी तोड़ी जा रही है। ऊपर से विधानसभा और संसद की सीढ़ियाँ पहले से ही उन्हीं की हैं। मतलब राजनीति में आने का रास्ता बंद, नीचे से ऊपर तक। यह लोकतंत्र की हत्या है धीरे धीरे, चुपचाप और बहाने बनाकर।

राजस्थान के 4 करोड़ मतदाता पूछ रहे हैं, सरकार, गाँव की सरकार कब बनेगी? और राजस्थान का युवा पूछ रहा है, हमारी राजनीति की पहली सीढ़ी कब वापस मिलेगी? इन सवालों का जवाब 15 अप्रैल 2026 देगी या सुप्रीम कोर्ट का एक और नया आदेश आएगा?

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