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JJM घोटाला: सुप्रीम कोर्ट से महेश जोशी और मुकेश पाठक को जमानत, कहा- बिना ट्रायल लंबी कैद सजा में नहीं बदल सकती


नई दिल्ली। राजस्थान के जल जीवन मिशन टेंडर घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूर्व मंत्री महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को जमानत दे दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट का 13 अगस्त 2026 का वह फैसला रद्द कर दिया, जिसमें दोनों की जमानत अर्जी खारिज हुई थी। आदेश साफ है: आरोप गंभीर हैं, लेकिन ट्रायल शुरू हुए बिना किसी को अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।

क्या है मामला

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने 18 जनवरी 2024 को प्रारंभिक जांच दर्ज की थी, जिसके बाद 30 अक्टूबर 2024 को एफआईआर संख्या 245/2024 दर्ज हुई। अभियोजन का आरोप है कि 2021 से 2023 के बीच दो प्रोपराइटरशिप फर्मों, मैसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और मैसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी, ने सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के अफसरों और निजी लोगों के साथ मिलकर 237 टेंडरों में हिस्सा लिया। आरोप है कि इसके लिए आईआरसीओएन इंटरनेशनल लिमिटेड के नाम से जाली कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र और स्वीकृति पत्र लगाए गए। इनके दम पर दोनों फर्में सबसे कम बोली वाली (एल-1) बनीं और 104 टेंडरों में कार्यादेश हासिल किए, जिनकी कुल कीमत 979.45 करोड़ रुपये बताई गई है।

कोर्ट ने जमानत देने के चार आधार गिनाए।

— दोनों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। पाठक के खिलाफ 12 अप्रैल 2026 को चार्जशीट और जोशी के खिलाफ 29 जून 2026 को पूरक चार्जशीट दाखिल हुई। मामला दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर टिका है, जो पहले ही जांच एजेंसी के कब्जे में हैं। कोर्ट ने माना कि अब हिरासत में पूछताछ या बरामदगी की जरूरत नहीं और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका काफी हद तक खत्म है।

— करीब 72 साल के जोशी 7 मई 2026 से हिरासत में थे, यानी 5 महीने से ज्यादा। इससे पहले इसी मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में वे 7 महीने से ज्यादा जेल में रहे और सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिसंबर 2025 को उन्हें जमानत दी थी। कोर्ट ने कहा कि रिहाई के बाद उन्होंने आजादी का दुरुपयोग किया या गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की, ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है। पाठक 18 फरवरी 2026 से, यानी करीब 8 महीने से, हिरासत में थे। जाली आईआरसीओएन प्रमाणपत्रों की जांच करने वाले सीबीआई मामले में उन्हें 27 जनवरी 2026 को विशेष न्यायाधीश से जमानत मिल चुकी थी। वे मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी जमानत पर हैं।

— मामले में 22 आरोपी, 3 चार्जशीट, 124 गवाह और 20,000 से ज्यादा पन्नों में फैले 192 दस्तावेज हैं। आरोप अब तक तय नहीं हुए हैं और ट्रायल शुरू नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि शुरू होने पर भी जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है, और बिना ट्रायल लंबी कैद संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले निजी स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार के खिलाफ सजा बन जाती है।

— तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य अभियंता अरुण श्रीवास्तव को हाईकोर्ट से 1 जून 2026 को जमानत मिली। आरएसएसएमबी और पीएचईडी की फाइनेंस कमेटी के तत्कालीन सचिव शुभांशु दीक्षित और बिचौलिया बताए गए संजय बडाया को सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को जमानत दी।

कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने कहा कि जल जीवन मिशन जैसी जनकल्याण योजना में बड़े पैमाने की वित्तीय गड़बड़ी और संस्थागत मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं और राज्य का जमानत का विरोध करना उचित है। लेकिन आरोप कितने भी गंभीर हों, वे जमानत से जुड़े बाकी सभी पहलुओं को ढक नहीं सकते और अनिश्चितकालीन हिरासत का आधार नहीं बन सकते।

रिहाई की शर्तें

- पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करना और बिना अनुमति देश न छोड़ना।

- जांच अधिकारी के सामने बुलाए जाने पर पेश होना और सहयोग करना, क्योंकि कुछ अन्य आरोपियों की जांच बाकी है।

- गवाहों को प्रलोभन, धमकी या वादा न देना और सबूतों से छेड़छाड़ न करना।

- ट्रायल कोर्ट की हर तारीख पर हाजिर रहना।

शर्त तोड़ने पर ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द कर सकती है। किसी और मामले में जरूरत न होने पर ही दोनों रिहा होंगे।

यह दोषमुक्ति नहीं है

कोर्ट ने साफ किया कि आदेश सिर्फ जमानत तक सीमित है। मामले के गुण-दोष, आरोपियों की भूमिका और सबूतों की साख पर कोई राय नहीं दी गई है, यह ट्रायल कोर्ट तय करेगा। अलग-अलग एफआईआर की वैधता, दोहरे खतरे (डबल जियोपार्डी), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के उल्लंघन और जोशी की गिरफ्तारी की वैधता जैसे सवाल खुले रखे गए हैं।

सुनवाई में जोशी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल पेश हुए। पाठक की ओर से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड कौशल शर्मा, श्रीयश उदय ललित और अभिमन्यु सिंह संधू ने पैरवी की। राज्य की तरफ से एएसजी एस वी राजू और एएजी पद्मेश मिश्रा ने जमानत का कड़ा विरोध किया।

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