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एलन मस्क भारत में क्या करना चाहते हैं?


क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई देश तेज़ी से ग्रोथ करने लगता है, तो उसके रास्ते में सिर्फ़ इकॉनोमिक बैरीकेट्स नहीं आते, बल्कि अचानक अलग-अलग मुद्दों पर प्रोटेस्ट, विवाद और लगातार अस्थिरता उसकी पॉलिटिकल एनर्जी को बाँट देती है। और जब किसी देश में इंसर्जेंसी होती है तो वहां पर कोई ग्लोबल कंपनी निवेश करती है? क्या कोई बिजनिसमैन अपना पैसा एक ऐसे देश में लगाएगा, जहां पर आतंकवाद, माओवाद, साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, लोग आपस में लड़ते हैं या गवर्मेंट के खिलाफ उतकर प्रोपर्टी को जलाकर राख कर देते हैं? और बड़ा सवाल यह है कि जब किसी देश में ये सब चीजें होती हैं, तो इसका फायदा किसे होता है? निश्चित रूप से उनको होता है तो कॉम्पीटीटर कंट्रीज हैं या ऐसे उद्योगपति हैं जो अपनी शर्तों पर उस देश में कारोबार करना चाहते हैं, लेकिन गवर्मेंट नहीं करने दे रही है।

दिल्ली में सबकुछ वैसा ही चल रहा है, जैसा नेपाल में हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद नाराज युवाओं ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया था। सरकार ने उसे दबाने का प्रयास किया, सभी विपक्षी संगठन सरकार के खिलाफ एक हो गए और संसद भवन, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भवन में घुस गए, वहां आगजनी की गई, बेश्कीमती सरकारी संपत्ति को लूटा गया। आखिरकार सेना और पुलिस ने भी सरकार का साथ छोड़ दिया और प्रधानमंत्री समेत बड़े नेताओं को देश छोड़कर भागना पड़ा, जिसके बाद नेपाल में कठपुतलती सरकार बनाई गई। बाद चुनाव हुए और रैपर को पीएम बनने का मौका मिला। इसी तरह का काम पहले बंग्लादेश और श्रीलंका में किया गया था। अब यही पैटर्न भारत में अपनाने की कोशिश की जा रही है। भाजपा की तरफ से आरोप लगाए जा रहे हैं कि 

भारत में भी आज वैसा ही हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ असमाजिक तत्वों द्वारा दिनभर सोशल मीडिया पर किसी की इमैज खराब करने, नैरेटिव बनाने और किसी के फेवर में डिजिटिन मिशन चलाने का काम किया जाता है, जो कॉकरोच की तरह काम करते हैं, इनके पास कोई काम नहीं है।

इसी बात को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का गठन किया गया, जो केवल डिजिटली है, इसका अभी तक भी फिजिकल रजिस्ट्रेशन नहीं किया गया है। हरियाणा के एक वकील ने 22 मई 2026 को CJP को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29A के तहत राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराने के लिए चुनाव आयोग में आवेदन दिया था, लेकिन आवेदन देना और पंजीकरण मिलना अलग बातें हैं। इसने पहले अप्रेल में जंतर मंतर पर उग्र आंदोलन किया, जिसे नाम तो अहिंसक आंदोलन दिया गया, जब​कि जमकर सार्वजनिक संपत्ति तोड़फोड़ करने काम किया गया।

 भारत में इन दिनों एलन मस्क अपने सैटेलाइट सर्विस स्टालिंक इंटरनेट को शुरू करना चाहते हैं, सीधी से बात है जब दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी अरबों रुपये लगाकर सैटेलाइट सर्विस शुरू किया है तो उससे कमाई तो करेगा ही, लेकिन वो भूल जाता है कि उसकी सर्विस जहां चाहिए ही नहीं वहां कैसे करने दिया जाएगा। और सबसे बड़ी बात यह है कि देश की इंटरनल सिक्युरिटी फेल होने की संभावना के बाद भी उसको अनुमति मिलनी चाहिए, और इसके लिए सरकार को ब्लेम करेगा, कारोबारियों को बदनाम करेगा? 

फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन और चिली में अलग-अलग मुद्दों पर आंदोलन उभरे। भारत में भी किसान आंदोलन, शाहीन बाग, सीएए के खिलाफ़ प्रदर्शन, और अब चुनाव आयोग के खिलाफ़ प्रदर्शन जैसे कई आंदोलन देखे गए। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह महज़ संयोग है, या इन सबके पीछे कोई साझा जियो पॉलिटिक्स का सूत्र छिपा है?

दिल्ली के जंतर—मंतर पर सीजेपी की ओर से नीट परीक्षा में कथित धांधली को लेकर प्रदर्शन किया गया, तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा हुआ। पर सवाल यह उठता है कि धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद परीक्षाओं को लेकर क्या बदला? क्या शिक्षा व्यवस्था बदल गई? क्या तमाम बेरोजगारों को सरकारी नौकरी मिल गई? क्या परीक्षा का पैटर्न बदल गया? क्या कोई संस्था बदली या नई संस्था सामने आई? इनमें से कुछ भी नहीं हुआ, केवल मंत्री का इस्तीफा हुआ और दूसरे मंत्री को चार्ज मिल गया, इसके सिवाय कुछ नहीं हुआ। विपक्ष इसको सरकार की नैतिक हार के तौर पर साबित करते रहे हैं, तो सरकार ने केवल मुद्दा खत्म किया है। अब कथित तौर पर वोटर लिस्ट में से 13 करोड़ लोगों के नाम काटने का आरोप लगाकर चुनाव आयोग के खिलाफ़ सिलसिलेवार प्रदर्शन हो रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने दो दिन तक दिल्ली में सड़क पर प्रदर्शन किया। सीजेपी एक नई डिजिटल पार्टी है, तो सवाल उठता है कि इसकी फंडिंग कहाँ से आ रही है? कौन इतना पैसा दे रहा है कि इसके नए नेता हवाई यात्राएँ कर रहे हैं, पाँच सितारा और सात सितारा होटलों में रुक रहे हैं, और तमाम संसाधनों के लिए जो भी खर्च हो रहा है, वह पैसा कौन दे रहा है? क्या इसके पीछे बुली करने वाले जॉर्ज सोरोस या एलोन मस्क, अमेरिका या चीन जैसी शक्तियाँ काम कर रही हैं? ये सवाल गंभीर हैं, और इन पर पारदर्शी जाँच होनी चाहिए।

पिछले दिनों बेंगलुरु के यूट्यूबर ध्रुव राठी ने कहा था कि उन्हें जॉर्ज सोरोस या एलोन मस्क पैसा नहीं दे रहे, लेकिन सवाल यह है कि उन्हें ऐसी सफ़ाई क्यों देनी पड़ी? क्या इसका मतलब यह है कि उन पर ऐसे आरोप लगते हैं? क्या ध्रुव राठी को भारत के खिलाफ़, भारत की संस्थाओं के खिलाफ़, भारत सरकार के खिलाफ़, और सनातन धर्म के खिलाफ़ दुष्प्रचार करने के लिए कहीं से विदेशी फंडिंग मिलती है? क्यों वह जर्मनी में बैठकर भारत के खिलाफ़ दुष्प्रचार का काम करते हैं? ये सवाल उठाना ज़रूरी है, क्योंकि जब तक पूरी पारदर्शी जाँच नहीं होगी, जनता को सही और गलत में फ़र्क करना मुश्किल रहेगा।

अब देखिए एक और बड़ी तस्वीर। भारत सरकार के खिलाफ़ जो भी शक्तियाँ हैं, चाहे वे भारत में हों या विदेश में, क्या वे सब एक मंच पर आकर खड़ी हो रही हैं? क्या वे नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की तैयारी कर रही हैं? जैसा कि नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में देखा गया। क्या भारत की राष्ट्रीय संस्थाओं को कमज़ोर करने, सरकार को अस्थिर करने, और भारत को विकास के मार्ग से रोकने के लिए ये शक्तियाँ काम कर रही हैं? क्या किसान आंदोलन, सीएए विरोध, तीन तलाक़ का मुद्दा, चुनाव आयोग के खिलाफ़ प्रदर्शन, और सोशल मीडिया पर चलने वाला दुष्प्रचार, इन सबको जोड़कर देखने पर कोई बड़ा पैटर्न सामने आता है?

भारत के संदर्भ में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि भारत पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक रूप से तेज़ी से आगे बढ़ा है। भारत 2014 तक 10वें स्थान पर था और आज तीसरे स्थान की तरफ बढ़ रहा है। भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन जब भारत में दंगे होते हैं, जब अस्थिरता फैलती है, जब सरकार आंतरिक विवादों में उलझ जाती है, तो वैश्विक उद्योगपति निवेश में हिचकते हैं। नए कारखाने धीमे पड़ते हैं, रोज़गार के अवसर सीमित हो जाते हैं, देश की छवि खराब होती है, और विकास की रफ़्तार रुक सकती है। तो क्या कोई शक्ति चाहती है कि भारत की यह उठती हुई ताकत रुक जाए?

क्या अमेरिका और चीन जैसी शक्तियाँ चाहती हैं कि भारत हमेशा उन पर निर्भर रहे, खुद आत्मनिर्भर न बने, हथियारों से लेकर ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक चीज़ों तक उन पर आश्रित रहे? क्या उनकी रणनीति यह है कि भारत में नए उद्योग न लगें, ग्लोबल कंपनियाँ न आएँ, रोज़गार न मिले, भारत विकसित न हो, और शक्तिशाली न बने? क्या जॉर्ज सोरोस और एलोन मस्क जैसी वैश्विक हस्तियों के नेटवर्क, फंडिंग और प्रभाव का इस्तेमाल भारत में इंसर्जेंसी फैलाने, समाज को बाँटने, और स्थिरता को कमज़ोर करने के लिए किया जा रहा है? ये सवाल देश के हर नागरिक को पूछने चाहिए।

भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर FCRA कानून है। इसके तहत कुछ संस्थाओं पर विदेशी धन के दुरुपयोग, और विकास परियोजनाओं के खिलाफ़ प्रदर्शनों में उसके इस्तेमाल के आरोप लगे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये मामले केवल कुछ संस्थाओं तक सीमित हैं, या इसके पीछे एक व्यापक नेटवर्क है? क्या भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों पर अडिग रहने के फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है? क्या भारत को आंतरिक लड़ाइयों में उलझाकर उसे कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है?

भारत को अब दो काम करने होंगे। पहला, हर वैध विरोध का सम्मान करना, क्योंकि लोकतंत्र में आवाज़ उठाने का अधिकार है। और दूसरा, हिंसा, साजिश, अवैध फंडिंग, विदेशी प्रभाव, और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ़ काम करने वाले हर नेटवर्क की कड़ी जाँच करना। क्योंकि भारत की सुरक्षा और विकास दोनों के लिए ज़रूरी है कि देश आत्मनिर्भर बने, अपनी रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और उद्योग में खुद पर निर्भर हो, और किसी भी विदेशी शक्ति के सामने झुके बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चलाए। यही असली राष्ट्रीय मंथन है, और यही सवाल देश को आज गंभीरता से सोचना चाहिए।    

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