राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव की घड़ी आ गई है, लेकिन एक बार फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है, क्रिकेट के नाम पर राजनीति और नेतापुत्रों का राज। 29 सितंबर को होने वाले इस चुनाव में 98 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर या तो नेता हैं या उनके बेटे। सवाल यह है, क्या क्रिकेट चलाने के लिए क्रिकेट का ज्ञान जरूरी नहीं है?
कौन-कौन से नेतापुत्र हैं दौड़ में?
2026 के RCA चुनाव में सात बड़े नेतापुत्रों के नाम सामने आए हैं, जो सीधे-सीधे राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल कर रहे हैं:
- पराक्रम सिंह राठौड़ (पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ के पुत्र)
- धनंजय सिंह खींवसर (चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के पुत्र)
- मोहित यादव (विधायक जसवंत यादव के पुत्र)
- आशीष तिवारी (सांसद घनश्याम तिवारी के पुत्र)
- पवन दिलावर (मंत्री मदन दिलावर के पुत्र)
- प्रेम प्रताप मालवीय (महेन्द्रजीत मालवीय के पुत्र)
- विक्रम देवासी (मंत्री ओटाराम देवासी के पुत्र)
इनके अलावा अर्जुन बेनीवाल (विधायक संजीव बेनीवाल के पुत्र) और अरिष्ट सिंहवी (पूर्व मंत्री चंद्रराज सिंहवी के पोते) भी पहले से RCA में सक्रिय हैं।
क्रिकेटर क्यों नहीं हैं?
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है, RCA के चुनाव में क्रिकेटर कहां हैं? जवाब सरल है, क्योंकि सिस्टम ही ऐसा है कि आम क्रिकेटर के पास न तो पैसे हैं, न राजनीतिक पहुंच, और न ही जिला संघों पर पकड़। नेतापुत्रों के पास ये तीनों चीजें हैं। वे जिला क्रिकेट संघों के सचिवों और पदाधिकारियों को अपने पाले में कर लेते हैं, क्योंकि उनके पिता मंत्री, विधायक या सांसद हैं जो उनके जिले में विकास के काम करवा सकते हैं।
मकसद क्या है?
नेतापुत्रों का मकसद क्रिकेट विकास नहीं, बल्कि तीन चीजें हैं:
- राजनीतिक पहुंच: RCA के जरिए वे स्थानीय स्तर पर अपना नेटवर्क बनाते हैं। 38 वोटर (ज्यादातर जिला संघों के सचिव) उनके संपर्क में आते हैं, जो भविष्य में वोट बैंक का काम करते हैं।
- पैसा और पावर: RCA का सालाना बजट करोड़ों में होता है। BCCI से मिलने वाले फंड्स, मैचों की आय, ग्राउंड किराया, एकेडमी फीस, सब मिलाकर RCA के पास हर साल 50-100 करोड़ रुपये का बजट होता है। अध्यक्ष और पदाधिकारी इस बजट के इस्तेमाल पर नियंत्रण रखते हैं।
- करप्शन के मौके: टेंडर, कंस्ट्रक्शन, इवेंट मैनेजमेंट, स्पांसरशिप, इन सभी में मोटी कमीशन की गुंजाइश होती है। कई पदाधिकारी तो सिर्फ इसी लिए चुनाव लड़ते हैं।
पहले कौन-कौन बन चुके हैं?
- वैभव गहलोत (अशोक गहलोत के पुत्र): 2019 से 2024 तक RCA अध्यक्ष रहे, जब तक उनके पिता CM थे।
- राजेंद्र राठौड़ के पुत्र पराक्रम सिंह: पहले चूरू क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने, अब RCA अध्यक्ष की रेस में।
- घनश्याम तिवारी के पुत्र आशीष तिवारी: RCA कार्यकारिणी में सदस्य।
- गजेंद्र खींवसर के पुत्र धनंजय खींवसर: RCA एड-हॉक कमेटी में सदस्य रहे, अब अध्यक्ष पद के दावेदार।
RCA का सालाना बजट और लाभ
RCA का वार्षिक बजट अनुमानित 50-100 करोड़ रुपये है, जो इन स्रोतों से आता है:
- BCCI से ग्रांट
- घरेलू मैचों की आय (रणजी, विजय हजारे, सैयद मुश्ताक अली)
- SMS स्टेडियम, जयपुर में IPL और अंतरराष्ट्रीय मैचों की आय
- एकेडमी और कोचिंग सेंटर की फीस
- स्पॉन्सरशिप और विज्ञापन
पदाधिकारी इन फंड्स के आवंटन पर नियंत्रण रखते हैं, किस ग्राउंड में कितना पैसा लगेगा, कौन सा टेंडर किसे मिलेगा, कौन सी एकेडमी को ग्रांट मिलेगी। यहीं से "लाभ" कमाने के रास्ते खुलते हैं।
आखिर कब बदलेगा सिस्टम?
सवाल यह है कि क्या कभी ऐसा समय आएगा जब RCA का अध्यक्ष कोई पूर्व क्रिकेटर बने? कोई ऐसा जो क्रिकेट की बारीकियों को समझता हो, न कि सिर्फ राजनीति? जवाब तब तक नहीं मिलेगा, जब तक जिला संघों के वोटर (सचिव और पदाधिकारी) राजनीतिक दबाव से आजाद नहीं हो जाते।
RCA का चुनाव सिर्फ क्रिकेट का नहीं, बल्कि राजस्थान की राजनीति का एक छोटा सा नमूना है, जहां योग्यता नहीं, पहुंच मायने रखती है। और जब तक यह सिस्टम नहीं बदलता, तब तक क्रिकेट के नाम पर राजनीति होती रहेगी, और क्रिकेटर सिर्फ तमाशबीन बनकर रह जाएंगे।

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