मोदी मैजिक, संघ—संगठन का काम और जनता ने गहलोत के धोखे का जवाब दिया



—जनता ने सचिन पायलट का हिसाब चुकता किया

राजस्थान में पीएम मोदी की गारंटी, भाजपा संगठन की अथक मेहनत और संघ के जमीनी जुड़ाव ने अशोक गहलोत के उस धोखे का जवाब दे दिया, जो उन्होंने पांच साल तक सचिन पायलट के साथ किया, बल्कि राज्य की जनता के साथ किया। पांच साल पहले भी जनता ने अशोक गहलोत को बहुमत नहीं दिया था, लेकिन गहलोत ने अपनी निजी संबंधों से गांधी परिवार से मिलकर युवा नेता पायलट के साथ पांच साल अन्याय किया, उसी अन्याय का राजस्थान की जनता ने बदला ले लिया। सत्ता के लिए प्रदेश को 17 तरह से लुटाकर आर्थिक कंगाली में धकेलने के बाद भी कांग्रेस 68 सीटों तक ही पहुुंच पाई। सबके अपने हिसाब हैं, लेकिन हकीकत में किन कारणों से गहलोत की सत्ता गई और किन कारणों से भाजपा सत्ता में लौटी, इसकी पड़ताल जरूरी है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तसगढ़ में भाजपा ने प्रचंड़ जीत हासिल कर कांग्रेस को तीन राज्यों तक समेट दिया। देश में कांग्रेस की अब हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में सरकारें बची हैं। राजस्थान में गहलोत ने 10 गारंटी के लिए प्रदेश के पूरे तंत्र को 2 महीने तक काम नहीं करने दिया। जो काम बिना किसी तामझाम के किया जा सकता था, उसके लिए पूरी सरकारी मशीनरी को झौंक दिया गया, परिणाम यह हुआ कि जनता के सारे प्रशासनिक काम अटक गये। कोई भी काम नहीं होने के कारण जनता में रोष भर गया। जहां कैंप लगाकर गारंटी दी जा रही थी, तो जनता अपने रोजाना के कामों के लिए ही तरस रही थी। ना बिजली फ्री मिली, ना पेंशन का लाभ मिला और ना ही खाने के पैकेट मिले, बल्कि कैंप लगाकर सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों को उनमें झौंक दिया गया और सरकारी कार्यालय खाली हो गए। डिजाइन बॉक्स ने ​गुलाबी रंग के डिजाइन तो खूब बनाए, जो गहलोत को खूब लुभाए, लेकिन वो जनता के मन को नहीं भाए। कांग्रेस सरकार और अरोडा ने डिजाइन बनवाकर तंग दिमाग और जुबानी विकलांग नेता के लिए अरबों रुपये लुटाकर भी भयानक कुंठित, आत्ममुग्ध जादूगर का चेहरा और जुबान नहीं ​सुधार पाए। जिसको अपनी गली मोहल्ले के लोग पसंद नहीं करते, उसके चेहरे को खूब लीपा पौता गया, लेकिन वो सड़ा हुआ चेहरा किसी को नहीं भाया।

जिस सुंदर चेहरे, शानदार अंदाज, बेदाग और सभ्य युवा को आगे कर कर पांच साल पहले कांग्रेस ने जनता से शादी की थी, उसकी दुल्हन को जब पता चला कि दिखाया गया वर दूसरा था और फैरे किसी विकलांग से करा दिए गए हैं, यह सच जानकर दुल्हन योग्य वर के साथ भाग ही गई। कई बार सुना है कि दो भाईयों की सगाई की जाती है, एक अच्छे को दिखाया जाता है और शादी किसी अयोग्य से करवा दी जाती है, जब दुल्हन को पता चलता है तो वह भाग जाती है या तलाक देने को मजबूर हो जाती है। राजस्थान की जनता को कांग्रेस ने समक्ष, योग्य, सुंदर, सभ्य और शानदार दिमाग वाला वर दिखाकर सगाई कर दी गई, लेकिन फैरे एक ऐसे अयोग्य, कुदिमाग, असभ्य, विकलांग, मंदबुद्धि से करवा दिए गए, जिसको पहले ही चार—पांच दुल्हनें नकार चुकी थीं। 

पहले ही दिन से पायलट के साथ झूठी साजिश रची गई। वादा किया गया कि पांच महीने बाद लोकसभा की आधी से अधिक सीटें जीतने की गारंटी है, यदि नहीं जीते तो कुर्सी छोड़ देंगे। खुद राहुल गांधी ने वादा किया था कि सरकार काम नहीं करेगी तो दो मिनट में सीएम बदल देंगे, लेकिन पांच साल में भी नहीं बदल पाए। इतना कमजोर आलाकमान है कि पहले ही दिन सारे हथियार डाल चुका था। पायलट ने विश्वास किया, लेकिन लगातार पांच साल तक विश्वासघात किया गया। मंत्री पदों को भी गौण कर उनकी फाइलें सीएमआर चली गईं, काम मंत्रियों के हाथ में कोई काम नहीं रहा और पायलट के पूरे ग्रुप को सरकार से ​बगावत करने का जाल सीएमआर में बुना गया। लगा कि बगावत दिखाने पर आलाकमान उनके साथ होगा, लेकिन आलाकमान नाकारा निकला। सबकुछ जयपुर में तय हो रहा था। आलाकमान को हर दिन सरकार गिरने का झूठा डर दिखाया गया। विपक्ष द्वारा खरीदने की कहनियां सुनाई गईं और जिसने सरकार लाई थी, उसको आलाकमान की नजर में नाकारा, निकम्मा और गद्दार बनाया गया। इसके बाद आखिरी वर्ष आया और जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का नंबर आ गया, लगने लगा कि अब हटना ही होगा, तब आलाकमान को भी आलाकमान से वफादारी दिखाने के लिए पायलट ने पांच साल तक सबकुछ सहन किया, लेकिन आखिरकार जनता ने हिसाब चुकता कर दिया। 

अब सीएम पद के चुनाव को लेकर मंथन किया जा रहा है। बीजेपी बिलकुल वैसे ही पसोपेश में है, जैसे पांच साल पहले इन तीन राज्यों को जीतने के बाद कांग्रेस ने सात दिन मंथन किया था। कहा जा रहा है कि जिन नामों की चर्चा हो रही है, उनमें वसुंधरा राजे का नाम भी नहीं लिया जा रहा है। सीएम के ऐसे व्यक्ति को चुना जाएगा, जो बिलकुल लॉ प्रोफाइल होगा, जिसको लेकर कोई विवाद नहीं हो और जिससे जातियों को साधने का काम भी किया जा सकेगा। ऐसे नामों के बारे में बात की जाए तो भाजपा के पास राजस्थान से चुनाव लड चुके कई नाम हैं, लेकिन उनका कद इतना छोटा है कि उनको सीएम बनाकर सीनियर्स के उपर कैसे थौपा जाएगा, इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है। जिनका नाम बड़ा है, लेकिन विवाद नहीं है, ऐसे नेता दिखाई नहीं देते हैं। फिर भी जिन नामों पर चर्चा हो रही है, उनमें गजेंद्र सिंह शेखावत, दीया कुमारी, बाबा बालकनाथ, किरोड़ीलाल मीणा, अर्जुनराम मेघवाल, ओम बिडला जैसे बड़े नाम हैं, जबकि विधायकों में कई नाम हैं, जो विवादों से दूर हैं, लेकिन उनके नाम पर जातियों को साध पाना आसान नहीं है, जो आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से बेहद जरूरी है। 

जिहाजा दो नामों को लेकर भी बातें हो रही थीं, लेकिन दोनों के चुनाव हारने के बाद वो रेस से बाहर बताए जा रहे हैं। हालांकि, मोदी, शाह की सियासी स्टाइल ऐसी होती है, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं पाता है। उत्तराखंण्ड में पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गए थे, लेकिन फिर भी उनको सीएम बनाकर अपने वादे को पूरा किया गया था। राजेंद्र सिंह राठौड़ और डॉ. सतीश पूनियां के बारे में विचार नहीं किया जा रहा होगा, ऐसे संभव नहीं है। इन दोनों का राजनीतिक कद भी इतना बड़ा हो चुका है कि अचानक से भुला देना आसान नहीं है। ओम माथुर, सुनील बंसल, अविश्नी वैष्णव जैसे नामों की भी चर्चा हो रही है। जबकि असल बात यह है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा के अलावा किसी को भी पता नहीं है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का सीएम कौन होगा?

जातियों के हिसाब से बात की जाए तो एससी और एसटी को मिलाकर राजस्थान में 34 फीसदी आबादी बताई जाती है, जिसमें से किरोडीलाल मीणा और अर्जुनराम मेघवाल का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। ठीक इसी तरह से प्रदेश की सबसे बड़ी आबादी वाली जाति जाट है, जिसकी विधायकों की जीत के हिसाब से भी गणना की जाए तो करीब 19—20 फीसदी आबादी होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस किसान कौम से आज​तक कोई सीएम बनाया भी नहीं ​गया है, जिसकी मांग कई दशक से अनवरत जारी है। यह कौम राजस्थान के अलावा, हरियाणा, पंजाब में बहुतयात में है, जबकि पश्चिमी यूपी में बाहूल है, दिल्ली के बाहरी इलाके इसी जाति से भरे हुए हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड और मध्य प्रदेश के साथ ही जम्मू में भी कुछ जगह पर जाट आबादी का बहूल है। यदि आगामी लोकसभा चुनाव में फायदा लेने, किसान आंदोलन के प्रभाव का मिटाने और महिला पहलवानों के मुद्दे को कुंद करने के बारे में विचार किया जाएगा तो जाट समाज से किसी को सीएम बनाया जा सकता है। फिलहाल भाजपा में जाट समाज के नेता के लिहाज से राजस्थान में डॉ. सतीश पूनियां से बड़ा चेहरा कोई नहीं है, लेकिन चुनाव हारने के कारण निर्णय करना थोड़ा कठिन हो सकता है। 

दूसरी बड़ी जाति ​ब्राह्मण है, जिसको भी भाजपा में सीएम की उम्मीद है, हालांकि, संगठन की दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा में ब्राह्मणों का वर्चस्व है। इस समाज से ​अश्निनी वैष्णव, सीपी जोशी जैसे नाम हैं। तीसरी आबादी राजपूत हैं, जिनके ही अब तक राजस्थान में भाजपा के सीएम बने हैं। तीन बार भैरोसिंह शेखावत और दो बार वसुंधरा राजे सीएम बन चुकी हैं। भाजपा को अब तक पांच बार ही सत्ता मिली है, जिसमें एक बार जनता दल के नाम से मिली थी। शुद्ध रूप से भाजपा को चार बार सत्ता मिली है और चारों ही बार राजपूत को सीएम बनाया गया है। इस समाज से बड़े नामों में गजेंद्र सिंह शेखावत, दीया कुमारी का नाम लिया जा रहा है। इसके साथ ही कुछ लोग पोकरण से मंत्री को मात देने वाले प्रतापपुरी महाराज का नाम भी ले रहे हैं, जो राजूपत समाज से आते हैं। पूर्वी राजस्थान के सबसे बड़े नेता और मीणा समाज को लंबे से नेतृत्व देने वाले किरोड़ीलाल मीणा का नाम भी लिया जा रहा है, जिनको राज्यसभा से विधानसभा भेजा गया है। 

नाम तो बहुत लिए जा रहे हैं, लेकिन असल बात यह है कि तीन टॉप लीडर्स के अलावा कोई नहीं जानता कि किसका नंबर आएगा। इनके निर्णय हमेशा आश्चर्यचकित ही करते हैं। राष्ट्रपति से लेकर गुजरात, हरियाणा के सीएम और महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम से लेकर एस जयशंकर को केंद्र में मंत्री बनाने का निर्णय किसी ने सोचा भी नहीं होगा। ठीक इसी तरह से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सीएम बनने वाले हैं। इतना तय है कि इस बार तीनों ही राज्यों में भाजपा नए चेहरों को सीएम बनाएगी। 

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