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धरनों से लौटेगी क्या हनुमान बेनीवाल की खोई सियासी ताकत?

राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक अजीब मोड़ पर खड़ी है। 20 महीने हो गए, भाजपा सरकार सत्ता में है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि जनता में नाराज़गी साफ दिखाई देने लगी है। बेरोज़गारी आसमान छू रही है, पेपर लीक के मामले युवाओं का भविष्य निगल रहे हैं, अपराधी बेलगाम हैं, किसान नकली खाद-बीज से परेशान हैं, महंगाई की रफ्तार बढ़ती जा रही है और प्रशासन के फैसलों में सुस्ती और लापरवाही साफ नज़र आती है, लेकिन जब जनता को एक मजबूत विपक्ष की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब कांग्रेस, जो खुद को प्रमुख विपक्ष दल कहती है, वो सड़कों से गायब है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने तीन बार सीएम बनकर 15 साल तक प्रदेश पर राज किया, आज विपक्ष में रहकर भी भाजपा की कमजोरियों के सहारे चौथी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रहे हैं। सचिन पायलट, जो कभी बेरोज़गार युवाओं के लिए यात्राएं निकालते थे, युवाओं के छालों की कसमें खाते थे, आज चुप्पी साधे बैठे हैं। कृषिमंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा जैसे नेताओं को भाजपा ने चुप करा लिया है, बाकी किसी में सड़क पर उतरने का साहस नहीं बचा, लेकिन इस वीरान सियासी मैदान में हनुमान बेनीवाल नाम लगातार गूंज रहा है। वही बेनीवाल, जिन्होंने 2013 से 2018 तक 5 जिलों में रैलियां करके, भीड़ जुटाकर, जनता के मुद्दे उठाकर अपनी पहचान बनाई थी। नतीजा, 2018 में 3 विधानसभा सीटें, 2019 में नागौर से लोकसभा में जीत। यह उनका बहुत सुनहरा समय था।

लेकिन राजनीति में एक बात पक्की है, अगर आप जनता से दूर हो गए, तो जमीन खिसकते देर नहीं लगती। सत्ता के सहारे बेनीवाल ने 2019 में लोकसभा तक का सफर तो पूरा कर लिया, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई। कांग्रेस को साथ लेकर 2024 में वे नागौर से फिर जीत गए, लेकिन 2025 के खींवसर उपचुनाव में उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल हार गईं। वह सीट, जिसे कभी उनका गढ़ कहा जाता था, वहीं से अपनी पत्नी को नहीं जितवा सके। मगर, ये वही बेनीवाल हैं जो हार मानना नहीं जानते। और इस तरह से वे फिर लौट आए हैं उसी जन आंदोलन वाले हथियार के साथ, जिसने उन्हें पहचान दिलाई थी।

जयपुर के शहीद स्मारक पर सब इंस्पेक्टर भर्ती पेपर लीक मामले में रालोपा का धरना 4 महीने से चल रहा है। खुद बेनीवाल 90 दिन तक रोज धरने में बैठे रहे। सरकार ने कोर्ट में साफ कह दिया, भर्ती रद्द नहीं होगी। लेकिन बेनीवाल ने धरना खत्म नहीं किया। उनका कहना है जब तक युवाओं के साथ न्याय नहीं होगा, वे पीछे नहीं हटेंगे। जोधपुर की जोजरी नदी में अवैध फेक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले पानी ने कई गांवों का जीना मुहाल कर दिया है। इसके खिलाफ भी बेनीवाल ने मोर्चा खोल दिया है। यह सिर्फ जोधपुर का नहीं, पूरे पश्चिमी राजस्थान का मुद्दा है। पानी पहले ही कम, और ऊपर से छपाई की फैक्ट्रियों द्वारा जहरीला किया जा रहा है! यहां भी रालोपा का धरना जारी है, तो साथ ही नागौर में अवैध खनन के खिलाफ आंदोलन की तैयारी है।

सोचिए, आज राजस्थान में ऐसा कौन नेता है जो लगातार सड़कों पर है? भाजपा सत्ता में है, कांग्रेस चुप है, बाकी नेता कुर्सी के सपनों में खोए हैं। एक हनुमान बेनीवाल हैं, जो जयपुर से लेकर पश्चिमी राजस्थान तक जनता के मुद्दों पर डटे हैं, लेकिन सवाल बड़ा है, क्या जनता तीन साल बाद तीसरी शक्ति को मौका देगी? राजस्थान का इतिहास कहता है, यहां लोग बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस को सत्ता सौंपते आए हैं। चुनाव नजदीक आते ही सरकारी मशीनरी और पैसे का दम दोनों बड़े दल माहौल अपने पक्ष में कर लेते हैं। बेनीवाल जैसे नेता, जो पूरे पांच साल लड़ते हैं, लेकिन जनता का भरपूर साथ नहीं मिलने के कारण चुनाव आते-आते बस संघर्ष की कहानी बनकर रह जाते हैं।

भाजपा सरकार की नाकामियों की लिस्ट लंबी है। बेरोज़गारी, पेपर लीक, किसानों की अनदेखी, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा पर असफलता और प्रशासनिक सुस्ती। 20 महीनों में ऐसा कोई बड़ा काम नहीं दिखा, जिससे जनता कह सके हाँ, सत्ता बदलने से बदलाव आया है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी कोई उम्मीद नहीं जगा रही। अशोक गहलोत जनता के बीच नहीं जाते, बल्कि भाजपा की कमजोरियों पर भरोसा कर रहे हैं। सचिन पायलट, जो कभी युवाओं के लिए उम्मीद थे, अब शांत बैठे हैं। यही वह जगह है, जहां बेनीवाल को मौका दिख रहा है। वे जानते हैं, अगर उन्होंने अगले तीन साल जनता के बीच रहकर, मुद्दों पर डटे रहकर अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली तो 2028 में वे तीसरी ताकत बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए सिर्फ धरनों से काम नहीं चलेगा। उन्हें राज्यव्यापी रणनीति बनानी होगी, संगठन को मजबूत करना होगा, संसाधन जुटाने होंगे, और यह तय करना होगा कि वे सिर्फ नागौर या पश्चिमी राजस्थान तक सीमित रहेंगे, या पूरे राज्य में अपनी पार्टी का विस्तार करेंगे।

राजस्थान में तीसरी शक्ति बनने की कोशिशें पहले भी हुई हैं। नाथूराम मिर्धा से लेकर लोकेंद्र सिंह कालवी जैसे नेता, या बाद में कई क्षेत्रीय दल, लेकिन लंबा समय टिक नहीं पाए। बेनीवाल के सामने चुनौती है इस इतिहास को बदलने की। आज हालात उनके पक्ष में हैं। भाजपा से नाराज़गी, कांग्रेस से निराशा, और तीसरे बड़े दल का अभाव। यह वक्त उनके लिए अवसर भी है और परीक्षा भी। अगर वे इस समय जनता का भरोसा जीतने में कामयाब हो गए, तो वे सिर्फ नागौर के नेता नहीं, पूरे राजस्थान के खिलाड़ी बन सकते हैं। लेकिन राजनीति का खेल आसान नहीं। चुनाव के वक्त जनता नारे नहीं, नतीजे चाहती है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे सिर्फ विरोध करने वाले नेता नहीं, बल्कि सत्ता संभालने लायक विकल्प भी हैं। फिलहाल इतना तय है मौजूदा राजस्थान की राजनीति में, जहां बाकी नेता चुप हैं, वहां बेनीवाल की आवाज सबसे तेज़ है। और राजनीति में अक्सर वही नेता आगे निकलता है, जिसकी आवाज जनता तक सबसे पहले और सबसे साफ पहुंचती है।

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