एक मरीज़ कैंसर अस्पताल पहुंचता है, जेब में सरकार का कार्ड है, जिसमें 25 लाख का बीमा है। लेकिन इलाज मांगने पर अस्पताल का दरवाज़ा बंद हो जाता है। अस्पताल कहता है “सरकार ने पैसे नहीं दिए, हम इलाज नहीं करेंगे।” और हताश होकर मरीज़ वापस लौट जाता है। यह कोई कल्पना नहीं है, यह जयपुर के बड़े अस्पताल की सच्चाई है, जिसकी एक विधायक को खुद पत्र लिखकर मुख्यमंत्री से शिकायत करनी पड़ी। तो सवाल यह है कि राजस्थान की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना खुद बीमार है या जिम्मेदारों द्वारा जानबूझकर बीमार कर दी गई है?
राजस्थान में सरकारी स्वास्थ्य बीमा की कहानी शुरू होती है 13 दिसंबर 2015 से, जब तब की सीएम वसुंधरा राजे ने जयपुर से भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना का शुभारंभ किया था। उस योजना में सामान्य बीमारी में 30 हजार रुपए और गंभीर बीमारी में 3 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान था और इसमें 1715 बीमारियों को शामिल किया गया था। यह बीजेपी सरकार की योजना थी भामाशाह कार्ड पर आधारित, केवल बीपीएल परिवारों के लिए।
2018 में जब कांग्रेस सत्ता में आई, तो अशोक गहलोत ने इसे आगे बढ़ाया और इसे आयुष्मान भारत महात्मा गांधी राजस्थान स्वास्थ्य बीमा योजना के साथ जोड़ा। फिर आया असली धमाका 1 मई 2021 को, जब गहलोत शासन द्वारा मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना की शुरुआत की गई, जो पूरे राज्य में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज की दिशा में एक बड़ा कदम था। यह राजस्थान को देश का पहला ऐसा राज्य बनाने की कोशिश थी, जहां हर परिवार को स्वास्थ्य बीमा का कवर मिले।
शुरुआत में प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपए तक का कैशलेस इलाज मिलता था। फिर 2022-23 में यह 10 लाख हुआ और 2023-24 में इसे बढ़ाकर 25 लाख करने की घोषणा की गई। साथ ही 10 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा भी जोड़ा गया और ब्लैक फंगस, कैंसर, पैरालाइसिस, हार्ट सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी गंभीर बीमारियों को भी कवर किया गया।
2023 के अंत में बीजेपी सत्ता में आई। 19 फरवरी 2024 को राजस्थान स्टेट हेल्थ इंश्योरेंस एजेंसी ने आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर 'मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना रखा।' यानी गहलोत का “चिरंजीवी” बोर्ड उतरा, बीजेपी का “आयुष्मान आरोग्य” का बोर्ड लगा। योजना वही, केवल नाम बदल गया।
यह नाम बदलने का कारनाम कोई पहली बार नहीं किया गया था। जब 2018 में कांग्रेस आई थी तो उसने भामाशाह का नाम बदला। जब 2023 में बीजेपी आई तो चिरंजीवी का नाम बदला। राजनीति में हर सरकार चाहती है कि जनकल्याण का क्रेडिट उसी को मिले। तो सवाल यह उठता है कि इन नामों से मरीज़ों को क्या मिला? पार्टियों के हित के लिए एक नया कार्ड बनवाने की झंझट जनता के सिर पर रख दिया गया।
अब खबर आ रही है कि इस योजना को आयुष्मान भारत से पूरी तरह विलय करने की तैयारी है। राजस्थान की चिरंजीवी योजना का आयुष्मान भारत में विलय करके एक नई स्कीम बनाने की योजना है जो 1.42 करोड़ से अधिक परिवारों को कवर करेगी। यानी एक बार फिर नाम बदला जाएगा।
आज यह योजना 1798 से ज़्यादा मेडिकल प्रक्रियाओं और पैकेज को कवर करती है।
इसमें कैंसर, किडनी ट्रांसप्लांट, एंजियोग्राफी जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज शामिल है। भर्ती होने से पांच दिन पहले का खर्च और छुट्टी के बाद 15 दिनों तक का खर्च भी इसमें कवर होता है। जो परिवार पात्र नहीं हैं वे भी साल में मात्र 850 रुपए का प्रीमियम देकर इस योजना में शामिल हो सकते हैं। एक साल से कम उम्र के बच्चे भी इस योजना में कवर किए जाते हैं, भले ही उनका नाम अभी परिवार कार्ड में न जोड़ा गया हो। ये सब सुनने में बढ़िया लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत आपको हैरान कर देगी।
प्राइवेट अस्पताल ऑपरेटर्स ने बजट पूर्व बैठक में चिरंजीवी योजना को सदी की सबसे अव्यवहारिक और विफल योजना करार दिया। इनका कहना है कि इस योजना के तहत प्राइवेट अस्पतालों को मिलने वाली राशि बेहद कम है, जिससे उनके लिए संचालन करना मुश्किल हो रहा है। असल में सरकार ने सभी 1798 बीमारियों का कवर करने के साथ ही उनका एक कोड बना रखा है, जिसमें उस बीमारी के ट्रीटमेंट का खर्चा लिखा गया है। प्राइवेट अस्पतालों को उसी के अंदर ट्रीटमेंट करना होता है। उससे उपर खर्चा होने पर मरीज को वहन करना होता है। इसके चक्कर में एक ही अस्पताल में, एक ही बीमारी के भर्ती मरीजों के साथ दोहरा ट्रीट किया जाता है। प्राइवेट अस्पतालों का कहना है कि ऐसा करना उनकी मजबूरी है।
जो मरीज पैसे देकर ट्रीटमेंट करवा रहा है, उसको जरूरी सभी तरह की जांचें और उपचार दिया जाता है, लेकिन जो चिंरजीवी में है, उसको सरकारी कोड के अनुसार मिलने वाले पैसे में ही ट्रीट किया जाता है। जब जयपुर के महावीर कैंसर अस्पताल ने मरीज़ों का इलाज करने से मना कर दिया, तब विधायक मनोज न्यांगली ने जब सीएम को पत्र लिखा तो अस्पताल प्रबंधन ने साफ कहा कि सरकार ने बकाया भुगतान नहीं किया है, इसलिए स्वास्थ्य योजना में मुफ्त इलाज नहीं होगा। सामने आया है कि चिंरजीवी योजना के तहत निजी अस्पतालों को सरकार की तरफ से मिलने वाला पैसा समय पर मिलता ही नहीं है, जिसके कारण इस स्कीम में ट्रीटमेंट करने से हॉस्पीटल आनाकानी करते हैं।
कहते है कि सरकार अस्पतालों को जो पैकेज रेट देती है, वह बाज़ार दर से बहुत कम है। एक हार्ट बायपास सर्जरी की वास्तविक लागत सरकारी अस्पतालों में एक से 2.50 लाख होती है, और प्राइवेट हॉस्पीटल इसके 3 से 7 लाख रुपये से वसूलते हैं। इसी बीमारी में सरकारी पैकेज 1.14 लाख से 1.31 लाख रुपये तक है। यानी रेटों में तीन से चार गुणा तक अंतर होता है, इसीलिए प्राइवेट अस्पताल इस योजना में इलाज से कतराते हैं। हर मरीज के लिए अस्पतालों को सरकार से अप्रुवल लेनी होती है, जिसमें सिस्टम काफी धीमा है।
हद तो तब होती है, जब एक मरीज का ट्रीटमेंट हो जाने के बाद 75 घंटे पर भी उसे छुट्टी नहीं दी जाती और मरीज—परिजन दो—तीन दिन तक सरकारी आदेश का इंतजार करते रहते हैं, वो भी इस डिजीटल युग में, जहां मिनटों में काम होता है।
निजी अस्पतालोंं से यह भी पता चला है कि इस योजना में 8 प्रतिशत का भ्रष्टाचार है, जो भी अस्पताल 8 फीसदी देता है, उसका टाइट टू टाइम पैमेंट हो जाता है। यह सबसे चौंकाने वाला खुलासा है। सूत्रों के अनुसार कई प्राइवेट अस्पताल अपना बकाया भुगतान रिलीज़ करवाने के लिए सरकारी तंत्र में बैठे जिम्मेदारों को 8 प्रतिशत कमीशन दे रहे हैं। जो अस्पताल रिश्वत देते हैं, उनको टाइम पर पैमेंट रिलीज हो जाता है, जो कमीशन देने में असमर्थ होते हैं, उनका करोड़ों रुपया कई महीनों से बकाया चल रहा है। यानी जो 100 रुपए सरकार ने अस्पताल के लिए मंज़ूर किए हैं, उसमें से 8 रुपए रिश्वत में जा रहे हैं। गरीब के इलाज का पैसा बिचौलियों की जेब में जा रहा है तो ट्रीटमेंट मिलेगा कैसे?
ये सब तो अस्पतालों और सरकारी सिस्टम का हाल है। अब मरीजों की साइड देखिए। समाज के वंचित वर्ग के अधिकांश लोग गारंटी कार्ड बनवाने और उसे रिन्यू करने की प्रक्रिया से तंग आ चुके हैं। स्रोसेज की कमी के कारण डिजिटल प्रक्रिया ग्रामीण इलाकों में पहाड़ जैसी चुनौती बन जाती है। उपर से सरकार हर चार या पांच साल में नाम बदलकर नया कार्ड बनवाने का बोझ डाल देती है। अस्पताल प्रबंधन कहता है कि हम धर्मार्थ संस्थाएं नहीं हैं। डॉक्टर, नर्स, दवाइयां, इन सबका खर्च होता है। जब सरकार महीनों-महीनों तक पैसे नहीं देती, तो हम घाटे में कैसे चलाएं? उनकी बात में दम है।
कांग्रेस का पक्ष है कि यह योजना जनता के लिए क्रांतिकारी थी। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि चिरंजीवी योजना ने गरीब परिवारों को ज़मीन बेचकर इलाज कराने की नौबत से बचाया। और यह सच भी है कि लाखों परिवारों को इस योजना से सचमुच राहत मिली है।
इधर, बीजेपी का तर्क है कि योजना का रिस्ट्रक्चरिंग ज़रूरी है, पैकेज रेट को तर्कसंगत बनाना होगा और भुगतान प्रणाली को ठीक करना होगा, लेकिन करेगा कौन? मरीजों के हाथ में कुछ नहीं है, अस्पताल अपने पैसे पर ध्यान देते हैं, अधिकारियों को इन चीजों के लिए टाइम नहीं है या कहें कि करने में रुचि नहीं है। और सरकार राजनीति करे या ऐसे जमीनी काम करे। सवाल यह नहीं है कि योजना का नाम क्या है। सवाल यह है कि जब एक कैंसर का मरीज़ 25 लाख का कार्ड लेकर अस्पताल जाए और दरवाज़ा बंद मिले, तो वह कार्ड किस काम का है?
जब अस्पतालों का करोड़ों रुपए बकाया हो और वो 8 प्रतिशत रिश्वत देकर अपना पैसा छुड़ाएं तो भ्रष्टाचार कहां है? अस्पतालों में या सरकारी दफ्तर में? जब हर सरकार आते ही योजना का नाम बदले, लेकिन व्यवस्था न बदले तो फिर बदल क्या रहा है? राजस्थान की जनता को जवाब चाहिए। योजना जारी रखनी है तो उसे मरीजों की जरूरत के हिसाब से धरातल पर उतारना होगा, ना कि एसी कमरों में बैठे जिम्मेदारों के लिए रिश्वत सिस्टम डवलप करने के हिसाब से। सरकार को चाहिए कि अस्पतालों का बकाया समय पर दें, पैकेज रेट बाज़ार के अनुरूप करें, 8 प्रतिशत कमीशन खाने वाले जिम्मेदारों पर एफआईआर हो और हर गरीब को सचमुच इलाज मिले, न कि हर पांच साल में नाम बदलता सिर्फ एक प्लास्टिक कार्ड देकर राजनीति की जाए। अगर वीडियो आपको ज़रूरी लगा, तो शेयर करें, ताकि यह सवाल उस तक पहुंचे, जहां तब इसे पहुंचना जरूरी है।

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