CM की कुर्सी के लिए कांग्रेस में सियासी खेल शुरू


आज बात करते हैं राजस्थान की कांग्रेस के उस अंदरूनी खेल की, जो ऊपर से शांत दिखाई देता है, लेकिन भीतर से उबल रहा है। एक तरफ हैं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जो 75 साल की उम्र में भी हर रोज़ मीडिया में हर मुद्दे पर बयान देते हैं, सोशल मीडिया पर रील्स बनाते हैं। गहलोत की PR कंपनी का पूरा ज़ोर उनको फिर से सियासी ब्रांड बनाने पर है।

दूसरी तरफ हैं सचिन पायलट, जो राजस्थान की राजनीति से लगभग गायब हैं, मीडिया से दूरी बनाकर दिल्ली में गांधी परिवार के करीबी बनने का प्रयास कर रहे हैं, और इन दोनों के बीच उभर रही है एक तीसरी ताक़त, जिसे गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली कहते हैं।

गहलोत कल की तैयारी के लिए आज शोर मचा रहे हैं। राजस्थान कांग्रेस में अशोक गहलोत राजनीति के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं। 98, 8 और 18, गहलोत तीन बार मुख्यमंत्री रहे हैं। जनता की नाराजगी के कारण हर बार गहलोत की सत्ता गई और हर बार किसी नेता के दम पर वापस आए। उनकी सबसे बड़ी ताक़त है कांग्रेस का संगठन, जातीय समीकरण, मीडिया मैनेजमेंट और गांधी परिवार की नजदीकियां। 

तीसरी बार सत्ता बेदखल होने के बाद गहलोत ने मुंबई की एक बड़ी PR कंपनी से करार किया। उनको पता है कि 25 सितंबर 2022 के बाद गांधी परिवार उनका हाथ छोड़ चुका है, उनपर पहले जैसा भरोसा भी नहीं करता है। तो उन्होंने इसका तोड़ निकाला और सोशल मीडिया का सहारा लिया। कंपनी हायर करने के बाद तेजी से अपने काम पर लग गए। और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर उनकी ग्रोथ तेज़ हो गई।

 आजकल अशोक गहलोत का एकसूत्री कार्यक्रम है, रील्स, reels और reels। कोई राजस्थान का मुद्दा हो, केंद्र सरकार का हो, महिला आरक्षण हो, पश्चिम बंगाल में चुनाव हो, गहलोत हर सबजेक्ट पर हाज़िर हैं। जयपुर में ही सरकारी बंगले में बैठे हैं और मन करता तभी मनपसंद मीडिया को बुलाकर बयान देते रहते हैं।

जानकारों का मानना है कि राजस्थान में गहलोत के बाद दूसरे सबसे प्रभावी नेता सचिन पायलट ने 2023 के चुनाव के बाद से राजस्थान की राजनीति से दूरी बना रखी है, जबकि गहलोत की सक्रियता बढ़ती जा रही है। गहलोत की strategy बिलकुल साफ है कि 2028 से पहले अपना जनाधार इतना मज़बूत कर लो कि जब चुनाव आए, तो गांधी परिवार के पास दूसरा विकल्प ही न रहे। इसलिए वो राजस्थान का फील्ड नहीं छोड़ रहे। तमाम विधायकों से मेलजोल बना रहे हैं। जातीय समीकरण साध रहे हैं और हर मुद्दे पर बोलकर यह साबित कर रहे हैं कि "मैं कल भी प्रासंगिक था, आज भी हूं और कल भी प्रासंगिक रहूंगा।"

शतरंज की सियासी बिसात पर दो खिलाड़ी दिखाई दे रहे हैं। एक खिलाड़ी हर रोज़ दुनिया को दिखाकर जोर से अपनी चालें चल रहा है, लेकिन दूसरा कहीं दिखाई नहीं दे रहा, और यही इस खेल का टिव्स्ट है। शतरंज की इस बिसात का नाम राजस्थान कांग्रेस है और दोनों ​खिलाड़ियों के निशाने पर है 2028 में CM की कुर्सी।

इधर, 2020 से बागी का तमगा लिए पायलट की रणनीति अब खामोशी का खेल बन चुकी है। सचिन पायलट की strategy अशोक गहलोत से बिल्कुल उलट है। पायलट वर्तमान में कांग्रेस राष्ट्रीय महासचिव और छत्तीसगढ़ प्रभारी हैं। जानकारों का मानना है कि समय से पहले प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने से फायदा कम और नुकसान ज़्यादा है। 

पायलट अच्छी तरह जानते हैं कि 2018 में उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या थी। 2020 में उन्होंने गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत की, अपने साथियों संग मानेसर गए, लेकिन गांधी परिवार ने उनका साथ नहीं दिया। 2023 में फिर से CM फेस बनने की कोशिश की, लेकिन गांधी परिवार ने गहलोत को ही CM फेस बनाए रखा और अंतत: कांग्रेस चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गई।

पायलट ने उसमें एक सबक सीखा कि कितनी भी मेहनत कर लो, लेकिन दिल्ली के बिना राजस्थान में कुछ नहीं मिलना है। इसलिए अब वो राजस्थान से ज़्यादा दिल्ली में हैं। गांधी परिवार को दिखा रहे हैं कि वो team player हैं, न कि 2020 वाले विद्रोही। कुछ राजनीतिक समीकक्षों का मानना है कि पायलट के राजस्थान में सक्रिय होने से गोविंद सिंह डोटासरा को ताक़त मिलेगी और वो ऐसा नहीं होने देना चाहते। 

यानी पायलट इंतज़ार कर रहे हैं उस पल का, जब गांधी परिवार खुद उन्हें राजस्थान जाकर मोर्चा संभालने को कहेगा। और तबी उनकी ताक़त तय होगी, ऊपर से आए निर्देश से, न कि ज़मीनी संघर्ष से कुछ हासिल होना है। वे 2014 से 2018 तक जमीनी संघर्ष करके देख चुके हैं, इससे कुछ भी नहीं मिलता है, अधिकार मांगने से उलटा बागी और बना दिया जाता है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस पायलट को राजस्थान भेजने की योजना बना रही है और 2028 के CM फेस को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है।

इन दोनों के अलावा कांग्रेस में एक तीसरा मोर्चा भी खड़ा हो चुका है, जिसमें गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली हैं। राजस्थान में कांग्रेस की धुरी पहले गहलोत और पायलट के बीच घूमती थी, लेकिन अब तीसरी धुरी गोविंद सिंह डोटासरा बन चुके हैं, जो वर्तमान में राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। डोटासरा किसान वर्ग से बड़ा चेहरा हैं। लक्ष्मणगढ़ से लगातार चार बार विधायक चुने जा चुके हैं। गहलोत सरकार में शिक्षा मंत्री रहे और अब विपक्ष में रहते हुए सरकार पर सबसे तीखे हमले करने वालों में डोटासरा सबसे आगे हैं।

दूसरी तरफ टीकाराम जूली नेता प्रतिपक्ष हैं। अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। विधानसभा में केल्कुलेटेड तरीके से लड़ाकू विपक्षी नेता की छवि बना रहे हैं। अगर महिला आरक्षण लागू होता है तो SC-ST के समीकरण और बदलेंगे। उस बदले समीकरण में जूली की प्रासंगिकता बढ़ सकती है, लेकिन डोटासरा और जूली की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उनकी गांधी परिवार की सीधा संवाद नहीं है। 

तो 2028 का चुनाव अभी ढाई साल दूर है, लेकिन राजनीति में ढाई साल में पूरा परिदृश्य बदल जाता है। अभी की तस्वीर यह है कि गहलोत पूरे जोर से मैदान में हैं। पायलट खामोशी से दिल्ली में बैठे हैं। डोटासरा धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं और जूली विधानसभा के जरिए अपनी प्रजेंस बना रहे हैं।

लेकिन राजस्थान कांग्रेस का असली दुखड़ा यह है कि 2023 में यही नेता एक-दूसरे को कमज़ोर करते रहे और सत्ता भाजपा ले गई। अगर 2028 में भी यही खेल चला, तो फिर गहलोत, पायलट, डोटासरा, जूली में से कोई भी सीएम नहीं बन पाएगा। गहलोत की PR कंपनी उनकी रील्स बना सकती है, लेकिन गांधी परिवार का भरोसा नहीं बना सकती। 

पायलट की दिल्ली में खामोशी उन्हें गांधी परिवार का करीबी बना सकती है, लेकिन राजस्थान में ज़मीन नहीं बना सकती, और डोटासरा संगठन चला सकते हैं, लेकिन जब CM चुनने की बारी आएगी तो गांधी परिवार फिर एक बार किसी परिचित नाम पर ही भरोसा करेगा। 

तो राजस्थान कांग्रेस की यह कहानी अभी भी अधूरी है और यह तब पूरी होगी, जब 2028 में गहलोत, पायलट, डोटासरा या जूली में से कोई एक अपनी-अपनी खामियों से ऊपर उठकर राजस्थान की जनता का भरोसा जीत पाएगा। फिलहाल शतरंज की सियासी बिसात बिछी है, मोहरे तैयार हैं, लेकिन शह-मात कब होगी, यह 2028 में दिखाई देगा।


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