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संत रामपाल: जूनियर इंजीनियर, सामाजिक संत के 11 साल की कहानी


9 अप्रैल 2026 को हरियाणा के हिसार की सेंट्रल जेल नंबर दो का वो दरवाज़ा खुला, जो 11 साल 4 महीने और 24 दिन से बंद था। एक 75 साल का बुज़ुर्ग बाहर निकला। सफेद कुर्ता, सात गाड़ियों का काफिला, सभी के शीशों पर पर्दे। बाहर हज़ारों अनुयायी थे। सोनीपत में लड्डू बँट रहे थे और पूरे देश में एक सवाल उठ रहा था, यह आदमी कौन है? क्या यह एक पीड़ित संत है, या एक दोषी अपराधी जिसे कानून की खामियों ने बाहर निकाल दिया? आज हम इस सवाल का जवाब ढूँढेंगे तमाम तथ्यों से, सबूतों से और उस पूरी कहानी से जो 1999 से शुरू होकर 2026 तक आती है।

8 सितंबर 1951 का दिन, हरियाणा के सोनीपत ज़िले की गोहाना तहसील का धनाना गाँव, जहाँ रामपाल दास का जन्म हुआ। पढ़ाई पूरी की और हरियाणा सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की नौकरी मिल गई। यह एक सामान्य ज़िंदगी थी, जिसमें सरकारी नौकरी, तनख्वाह, घर-परिवार सबकुछ था। लेकिन नौकरी के दौरान ही उनकी मुलाकात 107 साल के कबीरपंथी संत स्वामी रामदेवानंद महाराज से हुई। रामपाल उनके शिष्य बन गए। 

1997 से उन्होंने घर-घर, गाँव-गाँव जाकर कबीर के ज्ञान का प्रचार शुरू किया। और 1999 में बंदी छोड़ ट्रस्ट की मदद से रोहतक के करौंथा गाँव में सतलोक आश्रम की नींव रखी। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की तादाद बढ़ने लगी। कबीर की वाणी, वेद-शास्त्रों का प्रमाण और एक सीधी-सादी भक्ति, यह था उनका आमजन को अपनी तरफ खींचने का सबसे बड़ा आकर्षण। समय बीता और करौंथा आश्रम में लाखों लोग जुड़ते चले गए।

अब यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है। जो संत इतने बड़े जनाधार के साथ उठता है, वो हमेशा दो नज़रों से देखा जाता है। एक उसके करोड़ों भक्तों की नज़र से और दूसरा स्थापित धार्मिक और राजनीतिक ढाँचे की नज़र से। और इन्हीं दो नज़रों की टकराहट में जन्मी वो कहानी जो आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं।

2006 में रामपाल दास ने स्वामी दयानंद सरस्वती की एक पुस्तक पर टिप्पणी की, जो आर्यसमाज के समर्थकों को यह बेहद नागवार गुज़री। दोनों पक्षों के बीच भयंकर हिंसक झड़प हुई। इस दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई। जिसमें रामपाल दास पर हत्या का पहला मुकदमा दर्ज हुआ। रामपाल दास के अनुयायियों का कहना है कि यह हमला आर्यसमाजियों ने किया था, और मरने वाला भी हमलावर पक्ष का था, फिर भी आरोप संत रामपाल पर लगाया गया। पुलिस और प्रशासन का रुख शुरू से ही उनके विरुद्ध रहा। इस बात की पूरी तरह पुष्टि नहीं होती, लेकिन यह भी सच है कि उस मुकदमे में कोई अंतिम सज़ा नहीं हुई, तो बातें सच दिखाई देती हैं।

फिर शुरू हुई अदालत की अनदेखी। रोहतक बार एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में अदालत अवमानना की याचिका दायर की। रामपाल दास बार-बार समन के बावजूद कोर्ट में पेश नहीं हुए। 10 नवंबर 2014 और 17 नवंबर 2014 को गैर-ज़मानती वारंट जारी हुए। 17 नवंबर को भी गिरफ्तारी नहीं हुई तो हाईकोर्ट ने पुलिस को 20 नवंबर तक का समय दिया। यहाँ एक सवाल उठता है और यह सवाल उनके समर्थक भी पूछते हैं और उनके आलोचक भी। कोर्ट से बार-बार भागना, समन को नज़रअंदाज़ करना, यह किसी निर्दोष इंसान का आचरण है या किसी ऐसे व्यक्ति का जो जानता था कि उसके खिलाफ मामला मज़बूत बन चुका है? यह सवाल अभी अनुत्तरित है।

हिसार के बरवाला स्थित सतलोक आश्रम में 18 नवंबर 2014 को हरियाणा पुलिस वारंट लेकर गिरफ्तारी करने आई। लेकिन पुलिस की एफआईआर के अनुसार जो दृश्य वहाँ मिला, वह किसी आम धार्मिक स्थल का नहीं था, पुलिस ने लिखा कि रामपाल दास ने 600 से 700 महिलाओं और बच्चों को मुख्य द्वार के बाहर बैठा दिया था, जबकि 1500 से 2000 युवा लाठी, पेट्रोल बम और बंदूकें लेकर आश्रम की छतों पर तैनात थे। पुलिस ने लाउडस्पीकर पर घोषणा की तो जवाब में “गिरफ्तारी के लिए हमारी लाशों के ऊपर से गुज़रना पड़ेगा” की धमकी मिली, जो पेट्रोल और डीज़ल के कनस्तर लेकर लोग बैठे थे।

यह जो तस्वीर है, इसे देखकर कोई भी सामान्य नागरिक पूछेगा, एक धार्मिक गुरु के आश्रम में यह युद्ध जैसी तैयारी क्यों? महिलाओं और बच्चों को ढाल की तरह सामने क्यों रखा गया? क्या यह एक शांतिप्रिय संत का आचरण था? दूसरी तरफ, रामपाल दास के समर्थकों का तर्क है कि उनके श्रद्धालुओं ने स्वेच्छा से रक्षा करी, कि पुलिस की कार्रवाई अनुपातहीन थी और कि रामपाल दास खुद हिंसा में शामिल नहीं थे। एक और बात जो रामपाल दास की तरफ से पुलिस ने नजरअंदाज की, इस घटनाक्रम में संगत के भी करीब 150 लोग बुरी तरह से जख्मी हुए, जो बरसों तक इलाज कराते रहे। इसे पुलिस नकारती रहती है।

18 दिन की इस घेराबंदी में 5 महिलाओं और 1 बच्चे की मौत हुई। 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी, पत्रकार और आम नागरिक भी शामिल थे। मरने वालों में एक महिला मध्यप्रदेश की थी। अस्पताल ने कहा कि महिला की मौत हार्ट अटैक से हुई थी। दूसरी तरफ पुलिस का कहना था कि भगदड़ और हिंसा से मौतें हुईं। मौतों की असल वजह आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और यही वो धुंध है, जिसमें इस पूरे मामले की सच्चाई छिपी है। इसके दौरान 19 नवंबर 2014 को रामपाल दास गिरफ्तार हुए।

गिरफ्तारी के बाद एफआईआर की बाढ़ आ गई। एफआईआर 426 में सरकारी कार्य में बाधा। एफआईआर 427 में लोगों को बंधक बनाना। एफआईआर 428 में देशद्रोह। एफआईआर 429 में हत्या। एफआईआर 430 में हत्या का दूसरा मामला। रामपाल दास के साथ 900 से ज़्यादा लोगों को अभियुक्त बनाया गया। पुलिस ने 400 से ज़्यादा गवाह तैयार किए। अक्टूबर 2018 में हिसार सेशन कोर्ट ने एफआईआर 429 और 430 में हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई।

यहाँ कानून का पक्ष बेहद साफ है। अदालत की बार-बार अवमानना, भगोड़े की तरह छिपना, आश्रम में हथियारबंद भीड़ जुटाना, पुलिस को रोकना, ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जो किसी भी न्यायिक दृष्टिकोण से स्वीकार्य नहीं है। कोई भी संत हो या आम नागरिक, कानून से ऊपर कोई नहीं। अगर रामपाल दास वाकई निर्दोष थे, तो उन्हें अदालत में जाकर खुद को साबित करना चाहिए था, न कि अनुयायियों को ढाल बनाकर कानून को चुनौती देनी चाहिए थी।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2017 में एफआईआर 426 और 427, यानी राजकार्य में बाधा और बंधक बनाने के मामलों में अदालत ने रामपाल दास को बरी कर दिया। यह उनकी छोटी जीत थी, लेकिन संकेत था कि अभियोजन पक्ष के पास हर आरोप साबित करने के लिए ठोस सबूत नहीं थे।

28 अगस्त 2025 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एफआईआर 430 में उम्रकैद की सज़ा निलंबित कर दी। और फिर 3 सितंबर 2025 को जस्टिस गुरविंदर सिंह गिल और जस्टिस दीपिंदर सिंह नालवा की खंडपीठ ने एफआईआर 429 में भी उम्रकैद की सज़ा रोक लगाकर ज़मानत दे दी, लेकिन जेल से रिहा नहीं हुए। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष के सबूत गंभीर रूप से विवादास्पद हैं। गवाह मुकर गए हैं। मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास हैं और यह तय करना भी मुश्किल है कि मौतें हत्या थीं या नहीं। 

इसके अलावा रामपाल दास की उम्र 74 साल, और वे बिना किसी अंतिम दोषसिद्धि के 10 साल 8 महीने से ज़्यादा जेल काट चुके थे। 13 सह-अभियुक्तों को पहले ही ज़मानत मिल चुकी थी।और इसके करीब 7 महीनों बाद 9 अप्रैल 2026 को आया वो अंतिम फैसला, एफआईआर 428, यानी देशद्रोह के मामले में भी ज़मानत मिली, और रामपाल दास को 11 साल, 4 महीनों बाद जेल से बाहर निकाला। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल अभी चल रहा है, मामला अभी खत्म नहीं हुआ, लेकिन अब इन्हें और अधिक समय जेल में नहीं रखा जा सकता। रामपाल दास के वकील अर्जुन श्योराण ने बताया कि जमानत की शर्त यह है कि वे कोई अवैध भीड़ नहीं जमा करेंगे। धर्म के प्रचार की पूरी छूट है।

अब आते हैं उस सवाल पर जो सबसे ज़रूरी है। क्या रामपाल दास निर्दोष हैं? क्या वे दोषी हैं?

सच यह है कि यह सवाल अभी अदालत में है। ज़मानत का मतलब बेगुनाही नहीं होता। ज़मानत का मतलब होता है कि सुनवाई पूरी होने तक स्वतंत्रता दी गई है। और यही वो बारीक रेखा है, जिसे हमें समझना होगा। रामपाल दास के पक्ष में यह है कि उनके खिलाफ 400 से ज़्यादा गवाह बनाए गए, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या अदालत में मुकर गई। हाईकोर्ट ने खुद माना कि मौतें हत्या थीं या नहीं, यह साबित नहीं हो सका। दो बड़े मामलों में वे पहले ही बरी हो चुके हैं। 11 साल से ज़्यादा अंतिम दोषसिद्धि के बिना जेल में रहना, यह भारतीय न्याय व्यवस्था की एक गहरी खामी को उजागर करता है। चाहे कितने ही गंभीर आरोप हों, लेकिन किसी को भी अनिश्चितकाल तक बिना फैसले के जेल में बंद रखना न्यायोचित नहीं है।

लेकिन कानून का पक्ष यह भी है कि अदालत की अवमानना एक निर्विवाद तथ्य है। रामपाल दास ने बार-बार कोर्ट की अनदेखी की, यह उन्होंने खुद किया। आश्रम में जो हथियारबंद तैयारी थी, वो दस्तावेज़ों में दर्ज है। पुलिसकर्मी घायल हुए, यह भी तथ्य है। और छह लोगों की मौत हुई, यह भी सच है, चाहे वो किसी भी कारण से हुई हो, उस घेराबंदी की परिस्थितियाँ पैदा करने में रामपाल दास की भूमिका थी या नहीं, यह अभी न्यायालय तय करेगा। जो लोग कह रहे हैं कि रामपाल दास की जीत हुई, वे भी ग़लत हैं। और जो कह रहे हैं कि उन्हें फिर से जेल जाना चाहिए, वे भी फिलहाल आगे की बात कर रहे हैं। सच यह है कि देशद्रोह के मामले का ट्रायल अभी भी जारी है। हत्या के दोनों मामलों में सज़ा सिर्फ निलंबित हुई है, रद्द नहीं हुई है। अगर ट्रायल में दोष साबित हुआ तो रामपाल दास को फिर जेल जाना होगा।

लेकिन यह मामला सिर्फ रामपाल दास का नहीं है। यह मामला उस पूरे सवाल का है जो भारत की न्याय व्यवस्था के सामने है कि जब गवाह मुकर जाएँ, जब मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास हो, जब ट्रायल 11 साल में भी पूरा न हो तो इंसाफ कहाँ से आएगा? उस आरोपी के लिए जो शायद दोषी हो और उन 6 लोगों के लिए भी जो उस रात मरे, और जिनके परिवारों को अभी तक कोई अंतिम जवाब नहीं मिला। 11 साल 4 महीने 24 दिन जेल की सलाखें, एक जूनियर इंजीनियर, एक विवादित संत, एक अदालत, और उनके लाखों अनुयायी। यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई, यह स्टोरी सिर्फ एक नए अध्याय में दाखिल हुई है।​​​​​​​​​​​​​​​​ इस पूरे मामले में आपकी क्या राय है, क्या आप मेरी इन बातों से सहमत हैं, क्या आप रामपाल दास को दोषी मानते हैं, क्या आप इस 11 साल को पुलिस का एक तरफा रवैया मानते हैं, या अदालत की अवमानना की सजा समझते हैं? क्या इस पूरे मामले को बढ़ाने के पीछे आर्यसमाजी जिम्मेदार हैं, अथवा हरियाणा सरकार की भी इसमें कोई भूमिका है? कमेंट करके आप अपनी अपनी राय दीजिए।

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