जयपुर रिंग रोड पर आधी रात का तांडव: 3000 रुपये के लिए लुटेरे आरटीओ ने जाम कर दी पूरी रिंग रोड


रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। जयपुर की रिंग रोड पर एक बुज़ुर्ग ट्रक ड्राइवर राजकुमार अपना ट्रक लेकर जा रहे थे। नेवटा बांध के पास एक आरटीओ अधिकारी ने बीच सड़क में कार सामने खड़ी कर उन्हें रोक लिया। कागज़ात देखे। 3000 रुपये लिए। मारपीट करी और फिर कार लेकर रॉन्ग साइड से भाग गया। न कोई रसीद, न कोई कार्रवाई, बस हवा की रफ्तार से कार भगाकर सड़क पर गुम। 

पिटाई के दर्द से कराहते हुए राजकुमार ने एक काम किया। उन्होंने ट्रक को सड़क के बीच में खड़ा कर दिया। एक आरटीओ अधिकारी की दादागिरी से 13 अप्रैल की रात जयपुर की सबसे व्यस्त रिंग रोड पर 7 किलोमीटर जाम लग गया और सड़क पूरी तरह से दो घंटे के लिए ठप हो गई। यह खबर सिर्फ एक जाम की नहीं है। यह कहानी उस सड़क माफिया की है जो पुलिस की वर्दी पहनकर जनता को खुला लूट रहा है।

13 अप्रैल 2026 की रात करीब साढ़े ग्यारह बजे जयपुर के नेवटा बांध के पास रिंग रोड पर एक ट्रक को रोका गया। आरटीओ अधिकारी ने बुज़ुर्ग ट्रक ड्राइवर राजकुमार से कागज़ात लिए, मारपीट करी और 3000 रुपये लेकर फरार हो गया। न रसीद दी, न कोई लिखित नोटिस दिया। बूढ़े ट्रक वाले से मारपीट की, पैसे उड़ाए और गायब हो गया। राजकुमार ने ट्रक को सड़क के बीच खड़ा कर दिया। आधे घंटे में पीछे से आने वाले ट्रक रुक गए। दोनों तरफ से जाम लग गया। अजमेर रोड से सीतारामपुरा तक जाम फैल गया। बाहरी राज्यों के ट्रक, चौपहिया वाहन, सब फंस गए। यह जाम 8 साल में पहली बार इतना बड़ा हुआ था।

मैं खुद उस जाम में फंसा था। गाड़ी से उतरकर मौके पर पहुंचा। ट्रक चालकों से पूरी कहानी सुनी। फिर ट्रांसपोर्ट मंत्री प्रेमचंद बैरवा को फोन किया, लेकिन नहीं उठाया। उनके PA देवेंद्र को फोन किया तो उन्होंने RTO वन राजेंद्र सिंह शेखावत से बात करने को कहा। मैंने शेखावत को 20 से ज़्यादा बार फोन किया, लेकिन हर बार नंबर बिज़ी दिखाया। दूसरे पुलिस अधिकारियों से मिन्नतें कीं, किंतु कुछ नहीं हुआ। ये सब करते हुए रात के 12:30 बज गए।

फिर एक थ्री स्टार गुर भूपेंद्र सिंह मौके पर आए। ट्रक वालों से गुज़ारिश की कि जाम खोलो। ट्रक वालों ने एक ही बात कही, "जब तक वो बदतमीज़ आरटीओ अधिकारी मौके पर आकर माफी नहीं मांगेगा, जाम नहीं खुलेगा।" ट्रक वाले सड़क पर धरने पर बैठ गए। जाम लंबा होता देख गुर भुपेंद्र द्वारा आला अधिकारियों से जाप्ता मांगा गया। आधे घंटे बाद चार पांच गाड़ियों और एक बस में पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे। आते ही उन्होंने ट्रक वालों पर लाठियां चलानी शुरू कर दी। डरे हुए ट्रक वाले अपनी गाड़ियां लेकर भाग गए। पीड़ित राजकुमार को उनके कागज़ात और 3000 रुपये वापस करके मामला "खत्म" किया गया। रात के 1:30 बज चुके थे। यानी करीब दो घंटे जयपुर की सबसे व्यस्त रिंग रोड पर अंधेरे में हज़ारों लोग फंसे रहे।

यह तो 13 अप्रैल की रात का घटनाक्रम था, अब असली सवाल पर आते हैं। ट्रक चालकों ने बताया कि जयपुर में एंट्री के नाम पर पहले 5000 रुपये लिए जाते थे। अब यह रकम बढ़कर 10000 रुपये हो चुकी है। रिंग रोड पर ट्रैफिक पुलिस तैनात न करने का नियम है, फिर भी आधी रात को वसूली होती है। तो सवाल यह है कि यह 10000 रुपये जाते कहाँ हैं? आरटीओ अधिकारी की जेब में? उसके सीनियर की जेब में? या ऊपर ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर तक पहुंचता है?

ट्रक वालों से अवैध वसूली हो रही है, यह पहली बार नहीं है। अशोक गहलोत सरकार के शुरुआती दिनों में तत्कालीन ट्रांसपोर्ट मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास पर गंभीर आरोप लगे थे। जिसके कारण वो सरकार गिराने का प्रयास करने वाले तत्कालीन डिप्टी सीएम सचिन पायलट के साथ मानेसर नहीं जा सके। वो वसूली तब 5000 रुपये होती थी। आज भाजपा सरकार में हर ट्रक से यह अवैध वसूली 10000 रुपये हो चुकी है। यानी सरकार बदली, पार्टी बदली, मंत्री बदले, और वसूली दोगुनी हो गई। बाकी कुछ नहीं बदला, न कार्यवाही न सुविधाएं और न ही सरकार के प्रति जनता में विश्वास बढ़ा।

अब कुछ तीखे सवाल सरकार से, मंत्री से और डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा से। मंत्री महोदय, उस आरटीओ अधिकारी पर आज तक क्या कार्रवाई हुई, जिसने आधी रात रिंग रोड जाम की, ट्रक वाले से मारपीट करी, 3000 रुपये लेकर भागा और कानून व्यवस्था का मखौल उड़ाया? हमने हर स्तर पर जानने की कोशिश की, कहीं से जवाब नहीं मिला। यातायात विभाग उस अधिकारी के बारे में जानकारी तक नहीं दे रहा। इसका मतलब साफ है, उस भ्रष्ट आरटीओ अधिकारी को हर स्तर पर बचाया जा रहा है।

दूसरा सवाल यह है कि जयपुर में एंट्री के नाम पर 10000 रुपये की वसूली किसके इशारे पर होती है? क्या आरटीओ अधिकारी खुद यह फैसला करता है? या यह एक सुनियोजित व्यवस्था है, जिसमें ऊपर से नीचे तक हर कड़ी को हिस्सा मिलता है? ट्रांसपोर्ट मंत्री, यानी डिप्टी CM प्रेमचंद बैरवा के विभाग में क्या यह सब उनकी जानकारी के बिना होता है? और अगर जानकारी नहीं थी तो रात को फोन क्यों नहीं उठाया?

तीसरा सवाल ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर की कानून व्यवस्था को लेकर है। रिंग रोड पर ट्रैफिक पुलिस तैनात न करने का नियम है, फिर आरटीओ अधिकारी वहाँ अवैध वसूली क्यों करते हैं, किसके इशारे पर करते हैं? किसने उसे आधी रात ट्रकों को रोकने का अधिकार दिया? क्या यह सब कानूनी था? और सबसे बड़ा सवाल सरकार से, जब राजधानी जयपुर में यह हाल है, जहाँ पत्रकार हैं, कैमरे हैं, मंत्री हैं, अधिकारी हैं तो राजस्थान के उन ज़िलों में पुलिस की तानाशाही का क्या हाल होगा, जहाँ मंत्री और सरकार कभी पहुँचती ही नहीं?

ट्रक चालक इस देश की रीढ़ हैं। वो दिन-रात सड़क पर रहते हैं, जान जोखिम में डालकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक ज़रूरी सामान पहुँचाते हैं। उनकी वजह से बाज़ार चलते हैं, अस्पतालों में दवाएं पहुँचती हैं, खेतों का अनाज शहरों तक आता है। और बदले में उन्हें क्या मिलता है? रात को रोको, पैसे लो, मारपीट करो, और भाग जाओ। और फिर भी अवैध वसूली का अगर विरोध करो तो लाठी खाओ। यह सिर्फ 3000 रुपये का मामला नहीं है। यह उस पूरे सड़क माफिया का मामला है जो वर्दी और सरकारी गाड़ी की आड़ में ट्रक ड्राइवरों को रोज़ लूटता है। यह उस व्यवस्था का मामला है, जिसमें पीड़ित को न्याय नहीं मिलता, बल्कि न्याय मांगने पर लाठी मिलती है। और खुलेआम अवैध वसूली कर रहे भ्रष्ट अधिकारी को सज़ा नहीं मिलती, उसे विभागीय संरक्षण मिलता है।

ट्रांसपोर्ट मंत्री प्रेमचंद बैरवा जी, आपके विभाग के अधिकारी आधी रात को रिंग रोड पर वसूली करते हैं। 10000 रुपये एंट्री फीस लेते हैं। गुंड़ों की तरह ट्रक वालों को पीटते हैं और जब पकड़े जाते हैं तो आपका फोन नहीं उठता। जनता आपसे एक ही सवाल पूछती है, आप तो यह बताइए कि आखिर ये पैसा जाता कहाँ है? क्या आपको भी मिलता है? सरकार करवा रही है या आपकी नाक के नीचे बैठकर आरटीओ अधिकारी कानून का मखौल उड़ा रहे हैं।

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