अगर आपको पता हो कि कोई काम होगा नहीं, तो क्या फिर भी आप वो काम करेंगे? और अगर करेंगे, तो क्यों करेंगे? यही सवाल आज पूरे देश में गूंज रहा है, क्योंकि 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में कुछ ऐसा हुआ जो 11 साल के मोदी शासन में पहली बार हुआ।
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान का 131वां संशोधन विधेयक यानी महिला आरक्षण से जुड़ा बिल गिर गया। पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। बिल पास कराने के लिए कम से कम 352 वोट चाहिए थे। बिल 54 वोट से गिर गया। और इसके साथ ही संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने ऐलान किया कि इससे जुड़े बाकी दो बिल, परिसीमन विधेयक 2026 और संघ राज्य विधि संशोधन विधेयक 2026, अब आगे नहीं बढ़ाए जा सकते। यानी एक झटके में तीन बिल गए। और 24 साल बाद पहली बार संसद में कोई संविधान संशोधन बिल गिरा।
अब समझते हैं कि यह बिल था क्या। इस बिल का मकसद था 2029 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना। साथ ही लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करना और पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन करना।
लेकिन याद कीजिए 2023 में 128वां संशोधन, यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पहले ही पास हो चुका था। 2023 में लोकसभा में 454 वोट पक्ष में पड़े थे, विरोध में केवल 2 वोट पड़े थे। राज्यसभा में भी 215 वोट से पास हुआ था, तो अब 2026 में फिर नया बिल क्यों? क्योंकि 2023 वाले कानून में शर्त थी कि पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन, तभी आरक्षण लागू होगा। अब सरकार उस शर्त को हटाकर 2011 की जनगणना के आधार पर ही काम करना चाहती थी।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल उठता है कि सरकार को पता था कि दो तिहाई बहुमत नहीं है। NDA के पास लोकसभा में करीब 293 सीटें हैं। संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत यानी 352 वोट चाहिए थे। इतने अनुभवी नेताओं की सरकार, जिसने 11 साल में एक भी बिल संसद में नहीं गिराया, वो यह हिसाब नहीं जानती? यह हिसाब तो हर राजनीति विज्ञान का छात्र जानता है।
तो फिर यह बिल क्यों लाया गया? दो संभावनाएं हैं। पहली: अगर बिल पास हो जाता, तो 2029 के चुनाव से पहले महिलाओं को आरक्षण मिल जाता और पूरा श्रेय मोदी सरकार को जाता। दूसरी: अगर बिल गिर जाता, तो विपक्ष को महिला विरोधी का तमगा लगाकर 2029 का चुनाव लड़ा जा सके। अमित शाह ने बिल गिरने के तुरंत बाद कहा, "देश की महिलाएं जवाब देंगी।" यानी जीत भी BJP की, हार भी BJP की नहीं, हार विपक्ष की। यही इस विधेयक में राजनीतिक कैलकुलेशन थी।
लेकिन विपक्ष का पक्ष भी सुनिए। विपक्ष ने कहा कि परिसीमन में लोकसभा सीटें 543 से 850 करने का प्रस्ताव था। इससे उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे उच्च जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बहुत बढ़ जातीं। जबकि केरल, तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्य जिन्होंने परिवार नियोजन सफलतापूर्वक किया, उनकी सीटें अनुपात में नहीं बढ़तीं। यह महज महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, यह लोकतांत्रिक ढांचे में बदलाव की कोशिश थी।
एक और बात, इस बिल में OBC महिलाओं के लिए अलग आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं था। जो देश की सबसे बड़ी महिला आबादी है OBC, उनके लिए कुछ नहीं। यानी आरक्षण मिलता ऊंची जातियों की महिलाओं को ज़्यादा, तो क्या यह सच में महिला सशक्तिकरण था या चुनिंदा महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण?
विपक्ष ने विरोध किया, तो क्या विपक्ष का विरोध सही था? यहाँ एक तथ्य और देखिए, 2023 में यही विपक्ष नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पक्ष में था। 454 में से अधिकांश वोट तो विपक्ष के भी थे, लेकिन 2026 में वही विपक्ष विरोध में आ गया। क्यों? क्योंकि इस बार परिसीमन का एंगल जुड़ गया था और विपक्ष के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों के हित में नहीं था। इसलिए विरोध में DMK, TRS और कांग्रेस सब एक हो गए थे।
तो कुल मिलाकर इस कवायद से हार किसकी हुई? मोदी सरकार को 11 साल में पहली संसदीय हार मिली, यह 100 टका सच है, लेकिन मोदी सरकार ने इसे जानबूझकर एक चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की, यह भी सच है। इंडिया ब्लॉक नामक विपक्ष ने महिलाओं के अधिकार से ऊपर अपनी राजनीति रखी, यह भी 100 फीसदी सच है और सबसे बड़ा सच यह है कि इस पूरे खेल में असली हार उस महिला की हुई है जो लोकसभा में, विधानसभा में जनता की आवाज़ बनकर गूंजना चाहती है, उसका इंतज़ार 3 दशक बाद आज भी जारी है।

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