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भजनलाल के कड़े रुख से अधिकारी सहमे: शिखर अग्रवाल के इस्तीफा देने की चर्चा


भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के कड़े रुख से सहमे हुए आरोपी आईएएस शिखर अग्रवाल के इस्तीफा देने की चर्चा शुरू हो गई है। शिखर अभी अमेरिका में हैं, और 10 नवंबर को भारत लौटेंगे, लेकिन उससे पहले ही उनके करीबी सूत्रों ने दावा किया है कि शिखर अग्रवाल वापस लौटकर इस्तीफा दे सकते हैं। इसको लेकर ब्यूरोक्रेसी में भजनलाल शर्मा के कड़े रुख की चर्चा है तो आम लोगों में उनके मजबूत इरादों की खूब वाहवाही हो रही है।

राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को एक ही निजी कंपनी से परिवार के नामों पर 40 विला-कॉटेज खरीदने और उन्हें उसी कंपनी को लीज पर देने के विवाद के बीच राज्य सरकार ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS), उद्योग एवं राज्य उपक्रम के पद से हटाकर APO, यानी Awaiting Posting Orders कर दिया है। यह कार्रवाई 1993 बैच के इस वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ आए गंभीर सवालों के बीच हुई है, हालाँकि अभी उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है।

मामले की शुरुआत मीडिया रिपोर्ट्स से हुई, जिनमें आरोप लगाया गया कि शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर, दो बेटे और ससुराल के सदस्यों ने लगभग ढाई साल की अवधि में गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से अलवर के अजबगढ़ में 20 विला और उदयपुर के बुझड़ा में 20 कॉटेज खरीदे। रिपोर्ट्स के अनुसार इन संपत्तियों पर कुल ₹6.16 करोड़ खर्च हुए और बाद में ये संपत्तियाँ उसी कंपनी को लीज पर दे दी गईं। इससे पहले जब राजस्थान सरकार का निवेश कार्यक्रम हुआ था, तब भी कई अधिकारियों पर विदेश में कालाधन जमा करने और इस निवेश मेले के बहाने उसे एक नंबर में करके राजस्थान में निवेश करने के आरोप लगे थे। हालांकि, सरकार ने आज तक उन मामलों की जांच नहीं की है।

क्या है पूरा आरोप?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उदयपुर के बुझड़ा में खरीदे गए 20 कॉटेज सालाना ₹4 लाख प्रति कॉटेज की दर से लीज पर दिए गए, जबकि अलवर के अजबगढ़ में खरीदे गए 20 विला सालाना ₹5 लाख प्रति विला की दर से लीज पर दिए गए। इस तरह कुल सालाना किराया ₹1.80 करोड़ बताया जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कंपनी से ये संपत्तियाँ खरीदी गईं, उसी कंपनी को उन्हें वापस किराए पर देने का फैसला क्यों लिया गया। आरोप यह है कि इस व्यवस्था से परिवार को एक निश्चित और बड़ी सालाना आय मिलती रही, जबकि कंपनी को अपने रिसॉर्ट संचालन के लिए वही संपत्तियाँ वापस मिल गईं।

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि खरीद अलग-अलग परिवारिक नामों से की गई, जिनमें शिखर अग्रवाल का अपना नाम, उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर का नाम और अन्य रिश्तेदारों के नाम शामिल बताए गए। इससे बेनामी संपत्ति, आय के स्रोत और संघर्ष की स्थिति से जुड़े सवाल उठे हैं।

खरीद कब और कहाँ हुई?

रिपोर्ट्स के अनुसार, उदयपुर जिले के बुझड़ा गाँव में 20 कॉटेज सितंबर 2023 में खरीदे गए, जबकि अलवर जिले के अजबगढ़ में 20 विला मार्च 2026 में खरीदे गए। दोनों जगहों पर संपत्तियाँ गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से खरीदी गईं, जो ‘अनंता’ ब्रांड के तहत रिसॉर्ट संचालित करती है।

अजबगढ़ का यह इलाका सरिस्का टाइगर रिजर्व के नजदीक है। इसी रिसॉर्ट से जुड़ा एक पुराना पर्यावरण संबंधी विवाद भी अब फिर चर्चा में आ गया है, जिसमें पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे थे और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की कार्यवाही की बात सामने आई थी।

विला की कीमत पर क्यों उठ रहे सवाल?

एक बड़ा विवाद खरीद मूल्य और संभावित बाजार मूल्य के अंतर को लेकर है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रजिस्ट्री के अनुसार खरीद लगभग ₹6.16 करोड़ में हुई, जबकि इन संपत्तियों की मौजूदा बाजार कीमत ₹50 करोड़ से अधिक बताई जा रही है। यह दावा अभी जांच का विषय है और इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। 

अगर यह अंतर सत्यापित होता है, तो सवाल यह होगा कि क्या संपत्तियाँ वास्तविक बाजार दर से कम में खरीदी गईं? यदि हाँ, तो इसके बदले क्या व्यवस्था थी? क्या लीज शर्तें बाजार में सामान्य रूप से मिलने वाली शर्तों से अलग थीं? ये सवाल जांच एजेंसियों के सामने हैं।

लेआउट मंजूरी का नया विवाद

विला खरीद के बाद एक और गंभीर मुद्दा सामने आया—लेआउट प्लान की मंजूरी। रिपोर्ट्स में आरोप लगाया गया है कि शिखर अग्रवाल ने दो महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए नियमों में बदलाव किया और लेआउट प्लान मंजूरी की शर्त हटा दी। यह आरोप विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि अग्रवाल उद्योग विभाग और RIICO से जुड़े थे।

सवाल यह है कि क्या यह नियम में बदलाव किसी सामान्य प्रशासनिक नीति के तहत हुआ या किसी विशेष परियोजना को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया? यदि नियम बदलने का फैसला उसी अधिकारी ने लिया जिसके परिवार का उस कंपनी से सीधा आर्थिक संबंध बताया जा रहा है, तो यह संघर्ष की स्थिति का स्पष्ट उदाहरण बन सकता है। 

राजस्थान इन्वेस्टमेंट प्रमोशन स्कीम का सवाल

एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 27 मार्च 2026 को ही जिस दिन अजबगढ़ रिसॉर्ट में 20 विला खरीदे गए, उसी दिन वित्त विभाग ने गोयल फैशंस कंपनी को राजस्थान इन्वेस्टमेंट प्रमोशन स्कीम-2019 के तहत विशेष पैकेज देने का आदेश जारी किया। यह समय का संयोग जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

यहाँ मुख्य सवाल यह है कि क्या कंपनी को यह पैकेज उसकी पात्रता और नियमों के आधार पर मिला, या इसमें कोई विशेष सुविधा दी गई? क्या निवेश प्रोत्साहन की प्रक्रिया में पारदर्शिता रखी गई? क्या नीतिगत निर्णय लेने वाले अधिकारी और संपत्ति खरीदने वाले परिवार के बीच कोई हित का टकराव था? इन सवालों का जवाब अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।

शिखर अग्रवाल कौन हैं?

शिखर अग्रवाल राजस्थान कैडर के 1993 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। वे राजस्थान सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव, उद्योग एवं राज्य उपक्रम थे और RIICO के पदेन अध्यक्ष भी थे। उन्हें IIT कानपुर से शिक्षा लेने और प्रशासनिक सेवा में लंबे करियर से जोड़ा जाता है। पिछली भाजपा सरकार, जो कि वसुंधरा राजे की सरकारी थी, तब जेडीसी थे और तब जयपुर के पूर्व राजपरिवार की एक होटल पर कब्जा लेने के मामले में भी शिखर अग्रवाल राजपूत समाज के निशाने पर आ गये थे।

उनकी पत्नी प्रशाखा माथुर राजस्थान कैडर की ही वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं। मामले में उनका नाम भी संपत्ति खरीद से जोड़ा गया है, जिससे यह सवाल उठा है कि क्या पुलिस और प्रशासन दोनों सेवाओं से जुड़े परिवार के लिए इतनी बड़ी संपत्ति खरीद की वित्तीय जांच होनी चाहिए।

सरकार ने क्या कार्रवाई की?

राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने बुधवार देर रात आदेश जारी कर शिखर अग्रवाल को सभी प्रशासनिक प्रभारों से मुक्त कर दिया और उन्हें आगे के आदेश तक APO कर दिया। सरकार ने इसे “प्रशासनिक कारणों” से जोड़ा है।

यह कार्रवाई मीडिया रिपोर्ट के प्रकाशित होने के लगभग 24 घंटे के भीतर हुई। सरकार का यह कदम दिखाता है कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अधिकारी को नीतिगत और निवेश संबंधी निर्णयों से अलग रखा जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई एफआईआर, बर्खास्तगी या दोष सिद्धि का आदेश सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं हुआ है।

एसीबी और सीबीआई को शिकायत

मीडिया रिपोर्ट के बाद ‘पब्लिक अगेंस्ट करप्शन’ संगठन से जुड़े दो वकीलों (पूनम चंद भंडारी और डॉ. टी.एन. शर्मा) ने राजस्थान एंटी-करप्शन ब्यूरो के महानिदेशक और सीबीआई के निदेशक को ईमेल से शिकायत भेजी। उन्होंने संपत्ति सौदों में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच के लिए एफआईआर दर्ज करने की मांग की। 

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस मामले में आय से अधिक संपत्ति, बेनामी संपत्ति और पद के दुरुपयोग की संभावना की जांच होनी चाहिए। उनका तर्क है कि केवल APO करना पर्याप्त नहीं है; संपत्ति के स्रोत, लीज अनुबंध, निवेश प्रोत्साहन और नियमों में बदलाव की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

इसके साथ ही अब ये आरोप भी लग रहे हैं कि शिखर अग्रवाल कई महिलाओं को भी निजी संदेश भेजने का काम करते थे। फ्रस्ट इंडिया न्यूज ने अपने एक्स अकाउंट पर कुछ लोगों के हवाले से लिखा है कि विज्ञापने मांगने के लिए जाने वाली लड़कियों और मदद मांगने के लिए जाने वाली लड़कियों को देर रात प्रेम भरे संदेश मोबाइल पर भेजने का काम करते थे, जिनकी जांच कराने की भी मांग की जा रही है।

कंपनी का पक्ष क्या है?

गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक संजय गोयल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि विला की खरीद-बिक्री बाजार दरों पर हुई और इसमें कोई विशेष लाभ या तय लीज की व्यवस्था नहीं थी। किंतु सवाल यह उठ रहा है कि इस कंपनी को इसी कालखण्ड में जमीनें न्यूनतम दरों पर क्यों दी गईं और उन्हीं बेचे हुए विला को कंपनी ने लीज पर क्यों लिया?

कंपनी के पक्ष में यह भी कहा गया कि यह एक पारदर्शी और आधिकारिक सौदा था। यदि यह दावा सही है, तो कंपनी को खरीद-बिक्री के दस्तावेज, बाजार मूल्यांकन, लीज अनुबंध और निवेश प्रोत्साहन से जुड़े सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराने होंगे। 

शिखर अग्रवाल का पक्ष

अभी तक शिखर अग्रवाल की ओर से विस्तृत सार्वजनिक बयान या पूर्ण स्पष्टीकरण की रिपोर्ट सीमित रूप से सामने आई है। सरकारी आदेश में उन्हें केवल “प्रशासनिक कारणों” से APO किया गया बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार ने उन्हें दोषी माना है या केवल जांच के दौरान निर्णय प्रक्रिया से अलग रखा है। 

अग्रवाल के पक्ष में यह कहा जा सकता है कि परिवार के सदस्यों द्वारा संपत्ति खरीदना अपने आप में अपराध नहीं है, बशर्ते खरीद के पैसे का स्रोत वैध हो, रजिस्ट्री पारदर्शी हो और अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग न किया हो। लेकिन यहीं सबसे बड़ी जांच की जरूरत है, क्योंकि आरोप केवल संपत्ति खरीद के नहीं, बल्कि नीतिगत फैसलों और नियमों में बदलाव से भी जुड़े हैं। जिस समय विला खरीदे गए, उसी दौरान संबंधित विभाग से ही इस तरह से रियायती दरों पर सरकारी लाभ उस कंपनी को दिया गया था।

ब्यूरोक्रेसी और भ्रष्टाचार: बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक अधिकारी की संपत्ति का नहीं है। यह इस बात की परीक्षा भी है कि राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी में नीति निर्माण, भूमि, लेआउट मंजूरी, निवेश प्रोत्साहन और राज्य उपक्रमों के निर्णय कितने पारदर्शी तरीके से होते हैं। दरअसल, कई अधिकारियों पर इस तरह से सरकारी संपत्तियों को लुटाने के आरोप लगते रहे हैं, और इसका सीधा लाभ अधिकारी नहीं लेते हैं, बल्कि दूसरे रास्ते से इसका फायदा उठाया जाता है, जिससे कभी पकड़ में आते ही नहीं हैं। बड़ी बात यह है कि ये अधिकारी सरकारी नौकर हैं, सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है, लेकिन जब जनता इनके पास काम के लिए जाती है, तो मिलते ही नहीं हैं, बल्कि काले अंग्रेजों की तरह बर्ताव करते हैं।

सवाल यह है कि जब कोई वरिष्ठ अधिकारी उद्योग, निवेश और राज्य उपक्रमों का प्रभारी हो, तो क्या उसके परिवार की निजी कंपनियों से बड़ी संपत्ति खरीद को स्वतः घोषित और जांचा जाना चाहिए? क्या ऐसे मामलों में अधिकारी को तुरंत निर्णय प्रक्रिया से हटाया जाना चाहिए? क्या राज्य में अधिकारियों की संपत्ति घोषणा की समयबद्ध सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए? असल बात यह है कि अधिकांश अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, लेकिन इनकी जांच करने वाली कोई स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है, बल्कि इसी पुलिस बेड़े में से जांच की जाती है तो इससे स्वतंत्र जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आपने कई बार देखा होगा, अधिकारी को रंगे हाथों एसीबी द्वारा पकड़ा जाता है, लेकिन कोर्ट में साबित ही नहीं कर पाते और वही भ्रष्ट अधिकारी फिर से प्राइम पोस्ट पर लगा दिए जाते हैं।

भजनलाल सरकार की जांच नीति

भजनलाल शर्मा सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की बात कही है। सरकार ने अब तक कई अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति, धारा 17-ए के तहत जांच, निलंबन, अनिवार्य सेवानिवृत्ति और विभागीय कार्रवाई को मंजूरी दी है। जनता का कहना है कि इस तरह के मामलों की समयबद्ध और ईमानदारी से जांच होनी चाहिए, ताकि सरकारी संपत्ति को लुटने से बचाया जा सके।

सरकार ने 2026 में 27 अधिकारियों के खिलाफ 21 मामलों में अभियोजन स्वीकृति दी, जिनमें दो एसडीएम और एक डीएसपी शामिल बताए गए। इसके बाद 33 सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई को मंजूरी दी गई, जिसमें कुछ की वेतन वृद्धि और कुछ की पेंशन रोकने के आदेश शामिल हैं। 

इसके अलावा, सरकार ने 2025 में भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति से जुड़े सात मामलों में अभियोजन स्वीकृति दी थी और एक मामले में धारा 17-ए के तहत विस्तृत जांच को मंजूरी दी थी। इस तरह भजनलाल सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में ब्यूरोक्रेसी की जांच और कार्रवाई के कम से कम तीन बड़े चरण सामने आए हैं, 2025 की अभियोजन स्वीकृतियाँ, 2026 की 27 अधिकारियों वाली कार्रवाई, और 33 अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई।

राजनीतिक पक्ष

इस मामले पर राजनीतिक दलों ने भी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी है। कांग्रेस नेतृत्व इसे भाजपा सरकार की “जीरो टॉलरेंस” दावे की परीक्षा मान रहा है और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहा है। भाजपा की ओर से यह कहा जा रहा है कि सरकार ने तुरंत कार्रवाई कर अधिकारी को पद से हटा दिया है।

लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि सरकार केवल APO तक रुकती है या स्वतंत्र जांच, संपत्ति का ऑडिट, लीज दस्तावेजों की जांच और आवश्यकता होने पर एफआईआर तक की प्रक्रिया आगे बढ़ाती है। बीते दो दशकों में एपीओ को अब कोई दण्ड नहीं माना जाता, बल्कि सस्पेंड की कार्यवाही को भी अधिकारियों ने दण्ड की परिभाषा से बाहर कर दिया है। ऐसे में सरकार ने एपीओ किया है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।

इस मामले में आगे कई संभावनाएँ हैं:

- राज्य सरकार उच्चस्तरीय जांच या विभागीय जांच का आदेश दे सकती है। 

- एसीबी या सीबीआई शिकायत के आधार पर प्रारंभिक जांच कर सकती है।

- खरीद दस्तावेज, लीज अनुबंध, बैंक लेनदेन, आयकर रिकॉर्ड और संपत्ति घोषणा की जांच हो सकती है।

- लेआउट मंजूरी और निवेश प्रोत्साहन से जुड़े फैसलों की प्रक्रिया की समीक्षा हो सकती है।

यह मामला अभी जांच के दौर में है। शिखर अग्रवाल को अभी दोषी नहीं ठहराया गया है, लेकिन आरोप इतने गंभीर हैं कि केवल प्रशासनिक हटाव से मामला खत्म नहीं हो सकता। सरकार, जांच एजेंसियाँ और संबंधित कंपनी—तीनों को अब सबूत और दस्तावेजों के आधार पर जवाब देना होगा।

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