राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बड़ा एक्शन लिया है। सीनियर आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को एपीओ करने के बाद अगले ही दिन सरकार ने 30 वृहद शास्ति मामलों का एक साथ निस्तारण करते हुए 17 सेवारत अधिकारियों की वेतनवृद्धि रोकी और 16 सेवानिवृत्त अधिकारियों की पेंशन पर कार्रवाई की।
यह कार्रवाई अकेले शिखर अग्रवाल के मामले तक सीमित नहीं है। भजनलाल सरकार ने इससे पहले भी कई मौकों पर भ्रष्टाचार, वित्तीय गड़बड़ी, अवैध खनन में कथित मिलीभगत और ड्यूटी में लापरवाही के आरोपों पर अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। लेकिन इस बार एक साथ 33 अधिकारियों (17 सेवारत और 16 सेवानिवृत्त) पर कार्रवाई को सरकार के दो साल के कार्यकाल में सबसे बड़े बैच एक्शन के रूप में देखा जा रहा है।
शिखर अग्रवाल को क्यों APO किया गया?
शिखर अग्रवाल राजस्थान कैडर के 1993 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं और उद्योग विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) के पद पर तैनात थे। राज्य के कार्मिक विभाग ने 28 अक्टूबर की देर रात उन्हें “प्रशासनिक कारणों” का हवाला देते हुए पदस्थापन की प्रतीक्षा में, इसे अंग्रेजी में एपीओ यानी अवेटिंग पोस्टिंग ऑर्डर्स की स्थिति कहते हैं। इसका मतलब है कि उन्हें मौजूदा पद से हटा दिया गया है, लेकिन अभी कोई नई पोस्टिंग नहीं दी गई है।
यह कार्रवाई उस समय हुई जब एक मीडिया जांच रिपोर्ट में उन पर और उनके परिवार पर बड़े पैमाने पर संपत्ति खरीदने के आरोप लगे। रिपोर्ट के अनुसार शिखर अग्रवाल, उनकी पत्नी और आईपीएस अधिकारी प्रशाखा माथुर, उनके दो बेटे तथा ससुराल के लोगों ने ढाई साल के दौरान एक ही रियल एस्टेट कंपनी से करीब 40 विला और कॉटेज खरीदे।
40 विला-कॉटेज और 6.16 करोड़ का सवाल
जांच रिपोर्ट के मुताबिक ये संपत्तियां दो जगहों पर थीं, अलवर जिले के अजबगढ़ में 20 विला और उदयपुर जिले के बुजरा में 20 कॉटेज। इन सबकी खरीद में करीब 6.16 करोड़ रुपये खर्च हुए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन संपत्तियों को खरीदने के बाद उन्हें उसी कंपनी को लीज पर दे दिया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बुजरा के कॉटेज सालाना 4 लाख रुपये प्रति कॉटेज की दर से और अजबगढ़ के विला सालाना 5 लाख रुपये प्रति विला की दर से लीज पर दिए गए। इस हिसाब से कुल लीज आय सालाना करीब 2 करोड़ रुपये बनती है। यानी आरोप यह है कि पहले एक ही कंपनी से बड़ी संख्या में संपत्तियां खरीदी गईं, फिर उन्हीं को वापस लीज पर देकर नियमित आय का रास्ता बनाया गया।
इसके अलावा एक और गंभीर आरोप भी सामने आया है। आरोप लगाने वाले पक्ष ने दावा किया कि मुंबई के पास कर्जत में एक बड़े रिसॉर्ट प्रोजेक्ट में शिखर अग्रवाल की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यालय और उद्योग विभाग से जुड़े कार्यकाल के दौरान कुछ कंपनियों को बड़े सौदे मिले। हालांकि, अभी ये सभी आरोप हैं और सरकार ने एपीओ को “प्रशासनिक कारण” बताया है; अभी तक किसी अदालत या जांच एजेंसी ने उन्हें दोषी घोषित नहीं किया है।
33 अधिकारियों पर एक साथ कार्रवाई
शिखर अग्रवाल को APO करने के अगले दिन, यानी 28 अक्टूबर को, भजनलाल सरकार ने वृहद शास्ति यानी मेजर पेनल्टी से जुड़े 30 मामलों का निस्तारण किया। इसमें 17 सेवारत अधिकारियों की 2 से 4 वार्षिक वेतनवृद्धियां रोकी गईं। साथ ही 16 सेवानिवृत्त अधिकारियों की पेंशन रोकने या उसमें कटौती करने के आदेश जारी किए गए।
इन कार्रवाइयों में आरएएस अधिकारी, इंजीनियर, पुलिस कर्मी और अन्य राज्य सेवा के अधिकारी शामिल हैं। सरकार के अनुसार कुछ मामलों में अवैध बजरी खनन में कथित मिलीभगत, कुछ में मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े अपराधियों से निकटता या मिलीभगत, और कुछ में जांच या ड्यूटी में लापरवाही पाई गई।
उदाहरण के लिए, एक मामले में पुलिस टीम के तत्कालीन निरीक्षक, सहायक उप निरीक्षक और कॉन्स्टेबल की उचित जांच न करने की लापरवाही पाई गई, जिस पर तीनों की वार्षिक वेतनवृद्धि रोकी गई। दूसरे मामले में मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त अपराधियों से निकटता और इनामी अपराधी को गिरफ्तार न करने के आरोप पर एक वृत्ताधिकारी और एक कॉन्स्टेबल की 2-2 वार्षिक वेतनवृद्धियां रोकी गईं।
इससे पहले की बड़ी कार्रवाइयां
भजनलाल सरकार ने यह पहली बार इतने बड़े पैमाने पर एक्शन नहीं लिया है। इससे पहले भी कम से कम दो बड़े मौकों पर अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए थे। पहली बड़ी कार्रवाई मार्च 2025 में हुई, जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भ्रष्टाचार निवारण संशोधन अधिनियम-2018 के तहत सामने आए पांच मामलों में सात अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। उसी दौरान एक सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन रोकने और तीन सेवारत अधिकारियों की वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का निर्णय भी लिया गया।
दूसरी बड़ी कार्रवाई जून 2025 में हुई, जब मुख्यमंत्री ने 38 लंबित भ्रष्टाचार संबंधी मामलों का निस्तारण किया। इसमें 11 सेवारत अधिकारियों के खिलाफ सीसीए नियम 16 के तहत और दो अधिकारियों के खिलाफ सीसीए नियम 17 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई, जिसके तहत उनकी वार्षिक वेतनवृद्धि रोकी गई। साथ ही नौ सेवानिवृत्त अधिकारियों की पूरी या आंशिक पेंशन रोकने की कार्रवाई की गई।
इसके अलावा मई 2025 में भी एक बड़ा एक्शन हुआ था, जिसमें पद के दुरुपयोग और राज्य सरकार को वित्तीय नुकसान पहुंचाने के एक मामले में एक अधिकारी को राजकीय सेवा से बर्खास्त किया गया। उसी दौरान नौ अधिकारियों की पेंशन रोकी गई और तीन अधिकारियों की वेतनवृद्धि रोकने का निर्णय लिया गया।
संदेश क्या है?
भजनलाल सरकार का यह संदेश साफ है कि सरकारी पद केवल अधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी भी है। भ्रष्टाचार, वित्तीय गड़बड़ी, अवैध खनन में मिलीभगत या ड्यूटी में लापरवाही जैसे मामलों में नियमों के अनुसार जवाबदेही तय की जाएगी।
शिखर अग्रवाल का मामला इस बात का बड़ा उदाहरण बन गया है कि जब भी संदेह उठे, सरकार पहले अधिकारी को पद से हटाकर जांच का रास्ता खोल सकती है। हालांकि अभी उन पर कोई औपचारिक आरोप पत्र या अदालती दोषसिद्धि नहीं है, लेकिन APO की कार्रवाई से यह संकेत साफ है कि सरकार इस मामले को हल्के में नहीं ले रही।
कुल मिलाकर, राजस्थान में अब प्रशासनिक जवाबदेही का दायरा सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह रहा। सीनियर आईएएस से लेकर रिटायर्ड अधिकारियों तक, सभी के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल रहा है। यही कारण है कि इस बार के एक्शन को भजनलाल सरकार के “जीरो टॉलरेंस” दृष्टिकोण का सबसे बड़ा प्रदर्शन माना जा रहा है।

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