सचिन पायलट कैम्प ने दिल्ली में बनाया स्थाई डेरा

Siyasibharat: 
1.सचिन पायलट का पलड़ा भारी, समर्थन में दिल्ली गये ये नेता अड़े

2.राज्य कांग्रेस की सियासी गणित में पायलट का पलड़ा एकबार फिर हुआ मजबूत

3.दिल्ली गए पायलट कैम्प के नेताओं ने दिल्ली में डाला स्थाई डेरा

पिछले एक साल से राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच जारी सियासी वर्चस्व की लड़ाई लागतात जयपुर से दिल्ली के बीच चल रही है। इस लड़ाई में हर दिन नया मोड़ और नए चेहरे सामने आते जा रहे हैं। 

जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी सियासी चालें चलते हुए बीएसपी से आए और निर्दलीय विधायकों को आगे करके पायलट कैंप के विधायकों के खिलाफ बयानबाजी करवाई थी। वहीं, पायलट कैंप कहां पीछे रहने वाला था। 

उनकी तरफ से भी निर्दलीय और बीएसपी विधायकों की विधानसभा सीटों से कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव हारे प्रत्याशियों ने पहले निर्दलीयों और बीएसपी की अनर्गल टिप्पणियों और कांग्रेस की सत्ता, संगठन में अत्यधिक दखलंदाजी के खिलाफ आलाकमान को खत लिखा, अब उन्होंने दिल्ली दरबार में स्थाई डेरा डाल दिया है। 

दिल्ली गए कांग्रेस के प्रत्याशियों ने खुले शब्दों में कह दिया है, जब तक आलाकमान हमसे मिल नहीं लेता, तब तक हम जयपुर वापस नहीं लौटेंगे। 

दरअसल, बीते 2 दिन से यह सब लोग आलाकमान से मिलने के लिए समय मांग रहे हैं और अभी तक इनको मिलने का समय नहीं मिला है।

आपको बता दें दिल्ली गए इन नेताओं में खंडेला विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी रहे सुभाष मील तो बस्ती से दौलत सिंह मीणा और शाहपुरा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके मनीष यादव प्रमुख नाम हैं। 

मनीष यादव ने इस पूरे मामले पर कहा कि निर्दलीयों ने सरकार का समर्थन किया, इस बात का हम स्वागत करते हैं, लेकिन निर्दलीय को सत्ता में शामिल करते हुए पूरा संगठन ही उन्हें सौंप दिया गया, यह कितना न्याय संगत है? उन्होंने कहा कि वह पार्टी आलाकमान और अजय माकन से मिलकर अपनी पीड़ा जाहिर करेंगे।

सियासी जानकारों का कहना है निर्दलीयों को ज्यादा तवज्जो देने से इन विधानसभा सीटों पर कांग्रेस कमजोर हुई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि निर्दलीय और बीएसपी से आए लोगों को ही साल 2023 के चिनाव में कांग्रेस से टिकट दिया जाएगा। ऐसे में 2018 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके कांग्रेसी नेताओं को खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। 

हालांकि, संकट के दिनों में सरकार के समर्थन में आए निर्दलीय और बीएसपी विधायकों का कहना था, वे बिना शर्त कांग्रेस को समर्थन कर रहे हैं। पर भला मौजूद दौर की सियासत में निस्वार्थ कुछ भी नहीं होता, सबकुछ सत्ता और शक्ति की लालसा में प्रयासरत रहते हैं। 

इसी का नतीजा है, बीते दिनों बीएसपी और निर्दलीय विधायकों ने ताबड़तोड़ पत्रकार वार्ताएं कीं, अलग-अलग मंचों और मोर्चों पर अपनी बात रखते हुए कांग्रेस के ही पायलट कैम्प के विधायकों को निशाने पर ले लिया था। 

मतलब साफ है, सत्ता व संगठन में बीएसपी से आए और निर्दलीय विधायक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं और वे लोग इसमें किसी तरीके की अड़चन भी नहीं चाहते।

 
ऐसे में बीएसपी और निर्दलीय विधायकों की विधानसभा सीटों से कांग्रेस के टिकट पर हारे  प्रत्याशियों को लगता है कि उनका राजनीतिक कैरियर दांव पर लगता नजर आ रहा है। इसलिए अपने राजनीतिक करियर को बचाने और अपने राजनीतिक गुरु सचिन पायलट के समर्थन में सियासी गणित को मजबूत करने के लिए रणनीतिक रूप से ये लोग दिल्ली पहुंचे हैं।

इसी सिलसिले में खंडेला विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी रहे सुभाष मील ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि निर्दलीय विधायकों ने अपने इलाकों में खुली लूट मचा रखी है,  हमारे इलाकों में पब्लिक और कांग्रेस कार्यकर्ता इनसे बहुत परेशान हैं। इस बात की शिकायत वह केंद्रीय आलाकमान को करना चाहते हैं, ताकि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा सके।

गौरतलब है कि 13 निर्दलीयों और छह बीएसपी से आए विधायकों को जोड़ लें, तो 2013 में कांग्रेस को हासिल हुई कि सीटों के आसपास का आंकड़ा है। 

ऐसे में अगर 2023 के चुनाव में यहां मौजूदा कांग्रेस प्रत्याशियों को टिकट काटकर बीएसपी और निर्दलीय विधायकों को टिकट दे दिया जाएगा, तो यहां बगावत होने के पूरे आसार हैं और ऐसे में कांग्रेस को लगभग दो दर्जन सीटों का साफ तौर पर नुकसान हो सकता है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि केंद्रीय आलाकमान असंतुष्ट कांग्रेस प्रत्याशियों, निर्दलीय विधायकों और बीएसपी से आए 6 लोगों के बीच कैसे समायोजन करता है। 

खबर तो यहां तक है कि चुनाव हार चुके कांग्रेस के लोग भी राजनीतिक नियुक्तियों में और संगठन में पद की लालसा रखते हैं। मौजूदा वक्त में तो उनके लिए इसका फायदा यही है और आगे चलकर 2023 में अपने टिकट को फिर से बनाए रखने की कवायद भी है। 

वैसे भी कांग्रेस कह चुकी है, जिनको टिकट मिल गया था, उनको राजनीतिक नियुक्तियों का फायदा नहीं दिया जाएगा। तो निर्दलीयों पर आरोपों के सहारे ही सही, ये हारे हुए प्रत्याशी भी सियासी फायदा उठाने के लिए कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बना रहे हैं।

सियासी भारत की टीम के राजनीतिक आकलन के मुताबिक राजस्थान कांग्रेस की उठापटक और सियासी वर्चस्व की लड़ाई का पूरा सच 2023 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में ही सामने आएगा।

सियासी भारत के लिए रामकिशन गुर्जर की रिपोर्ट

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