सचिन पायलट को फिर से अशोक गहलोत का साथ देना होगा. Jalor Loksabha Election 2024



राजस्थान का लोकसभा चुनाव रोचक होता जा रहा है। भाजपा जहां अपने पुराने उम्मीदवारों को बदलने का प्रयास कर रही है तो कांग्रेस तकरीबन सभी जगह लगातार तीसरी बार प्रत्याशी बदलकर 15 साल बाद एक अदद सीट की तलाश में जुटी है। इसके चलते कांग्रेस के बड़े नेता अपमान भुलाकर साथ आने तक को तैयार हो गए हैं। इस कड़ी में  कांग्रेस महासचिव सचिन पायलट ने एक बार फिर से अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को जिताने की गारंटी दे डाली है। 

इससे पहले पायलट ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भी दावा किया था कि कांग्रेस आलाकमान को वैभव गहलोत को जिताने की गारंटी पर टिकट दिलाया था। हालांकि, बाद में परिणाम बहुत बुरा आया और भाजपा के गजेंद्र सिंह शेखावत ने हनुमान बेनीवाल के सहारे गहलोत के बेटे को पौने तीन लाख से अधिक वोटों से करारी मात दी। 

इस बार गहलोत ने अपने बेटे को जोधपुर से निकालकर जालोर से टिकट दिलाया है, जहां पर पिछली बार कांग्रेस के रतन देवासी उम्मीदवार थे। उन्होंने भाजपा के देवजी पटेल के सामने 511723 वोट लेकर अपनी ताकत दिखाई थी। उसी वोटबैंक के दम पर अशोक गहलोत ने अपने बेटे वैभव गहलोत को जालोर से टिकट दिलाया है, ताकि जिताकर सांसद बना सकें। 

आपको याद होगा 2014 से 2018 तक की सचिन पायलट की मेहनत के बाद कांग्रेस की सरकार बनी थी, लेकिन पायलट को सीएम नहीं बनाया गया। अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बने और इतना ही नहीं हुआ, बल्कि डेढ साल बाद ही सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त तक कर दिया था। 

गहलोत ने पायलट को नाकारा, निकम्मा और झगड़ालू तक कहा था। सरकार के आखिरी साल में पायलट ने गहलोत सरकार के खिलाफ आरपार की लड़ाई का ऐलान किया था, लेकिन अंत समय में गहलोत ने अपनी चतुराई का परिचय देकर पायलट को फिर से राजी कर लिया। 

अब पायलट कह रहे हैं कि वैभव गहलोत को जिताने के लिए उन्होंने पिछली बार भी पूरा प्रयास किया था और इस बार भी जान की बाजी लगा देंगे। जबकि इन्हीं पायलट का गहलोत ने पूरे पांच साल तक भंयकर अपमान किया, जलील किया और राजनीतिक हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

समझने वाली बात यह है कि पिछली बार जोधपुर में गहलोत, पायलट के अलावा कांग्रेस की पूरी सरकार ने कैंप किया था, फिर भी एक सीट नहीं जिता पाए थे, तो क्या इस बार जिता पाएंगे? इसको आगे समझेंगे, पहले जालोर सीट का इतिहास समझना जरूरी है, ताकि आपको यह समझ आ सके कि भाजपा के लुंबाराम चौधरी और वैभव गहलोत में से कौन भारी पड़ रहा है।

जालोर सीट का गठन देश के पहले लोकसभा चुनाव के साथ ही साल 1952 में हो गया था। पहले चुनाव में निर्दलीय भवानी सिंह ने कांग्रेस उम्मीदवार को हराया था। अगले चुनाव 1957 में कांग्रेस के सूरज रतन दमामी जीते। पांच साल बाद 1962 में भी कांग्रेस के हरीश चंद्र माथुर जीते, लेकिन 1967 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को हराकर स्वतंत्र पार्टी के डीएन पाटोदिया जीत हासिल की। 

जिस साल भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तब 1971 कांग्रेस के एनके संघी ने पाटोदिया को हराया, लेकिन पांच साल बाद 1977 में जनता पार्टी के हुकमाराम ने कांग्रेस उम्मीदवार को हरा दिया। इसके बाद 1980 के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस के विरदाराम फुलवारिया जीते। अगले चुनाव में पंजाब से आए कांग्रेस उम्मीदवार सरदार बूटासिंह जीते, लेकिन 1989 के चुनाव में 7 साल पहले गठित हुई भारतीय जनता पार्टी के कैलाश मेघवाल ने जीत का खाता खोला। 

दो साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस के सरदार बूटासिंह भाजपा के कैलाश मेघवाल को हरा दिया। 1996 में कांग्रेस के पारसाराम मेघवाल जीते, लेकिन दो साल बाद कांग्रेस ने फिर से सरदार बूटासिंह को टिकट देकर मैदान में उतार दिया, जिसमें वो जीत गए। सरदार बूटासिंह 1999 के चुनाव में फिर जीत गए। इसके बाद 2004 में भाजपा की बी. शुशीला जीतीं। 

अगले चुनाव में भाजपा के देवजी पटेल जीते, जो आजतक सांसद हैं। इस बार भाजपा ने लगातार तीन बार से जीत रहे देवजी पटेल का टिकट काटकर लुंबाराम चौधरी को मैदान में उतारा है, जो बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आते हैं, लेकिन संघ के करीबी होने के कारण काफी मजबूत स्थिति में हैं।

कांग्रेस के सरदार बूटासिंह ने आखिरी बार 25 साल पहले चुनाव लड़े थे, जो देश के गृहमंत्री जैसे पद पर रहे हैं, लेकिन उसके बाद जालोर में कांग्रेस लगातार हार रही है। भाजपा ने पिछली चुनाव यहां पर करीब 2.61 लाख वोटों से जीता था। जालोर लोकसभा सीट में 22.89 लाख मतदाता हैं, जिनमें सबसे अधिक करीब 8 लाख मतदाता एससी—एसटी वर्ग से आते हैं। 

जालोर लोकसभा सीट राजपूत भी बड़ी आबादी बताई जाती है। यहां राजपूत और भोमिया राजपूत मिलाकर करीब 4 लाख वोट हैं, लेकिन इसके बावजूद आजतक यहां पर किसी राजपूत को जीत हासिल नहीं हुई है। जालोर में राजपूत, भोमिया राजपूत का आपस में टकराव होने के कारण राजपूत समाज से टिकट की कोई दावेदारी भी नहीं करता है। 

यहां पर एससी—एसटी मतदाताओं के बाद बिश्नोई, कल्बी और रेबारी जाति की संख्या है, जिनके 2.50 लाख से भी कम वोट हैं। ये दोनों जातियां संगठित हैं, लेकिन नरम स्वभाव की हैं। कलबी जाति कुनबी पटेल जाति समूह की ही उपजाति है। यह जाति सीरवी और आंजना की तरह किसान वर्ग की मानी जाती है, जो खुद को जाट जाति के करीब मानती हैं। 

उत्तरी गुजरात में पहले इस जाति के लोग राजस्थानी वेशभूषा पहनते थे। इस क्षेत्र में बाकी जातियां बेहद पिछड़ी या अल्पसंख्यक हैं। जमींदार वर्ग पर आश्रित छोटी अल्पसंख्यक जातियों की बड़ी आबादी है। इस क्षेत्र की सभी जातियों में सामाजिक सद्भाव है। इसलिए यहां की राजनीति में अल्पसंख्यक जैन और ब्राह्मण समुदाय के नेताओं का भी दबदबा रहा है।

जालौर राजस्थान राज्य का एक ऐतिहासिक शहर है। यह शहर प्राचीन काल में 'जाबालिपुर' के नाम से जाना जाता था। लूनी नदी की उपनदी सुकरी नदी के दक्षिण में स्थित जालौर राजस्थान का ऐतिहासिक जिला है। जालौर किला, जहाज मंदिर, श्री स्वर्णगिरी तीर्थ, श्री उमेदपुर तीर्थ यहां के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। इसके आठ विधानसभा क्षेत्र हैं। दिल्ली से जालौर की दूरी 757 किलोमीटर है। 1952 से अब तक 9 बार बाहरी उम्मीदवार जीतकर सांसद बने हैं। 

यही वजह है कि इस बार अशोक गहलोत ने बाहरी होने के बावजूद अपने बेटे को जिताने के लिए इस सीट का चुनाव किया है। सवाल यह उठता है कि जब अशोक गहलोत के गृह जिले और खुद के पांच बार सांसदी वाले जोधपुर से गहलोत का बेटा नहीं जीत पाया तो किस उम्मीद से वैभव गहलोत को यहां पर उतारा गया है? गहलोत भले ही अब सीएम नहीं हों, लेकिन गांधी परिवार और उसके आसपास रहने वाले कांग्रेसी नेताओं में उनकी पकड़ मजबूत है। जिसके कारण उन्होंने अपने बेटे को टिकट दिला दिया है। 

खास बात यह है कि एक तरफ जहां पूरी कांग्रेस पार्टी और सचिन पायलट भी पूरे राजस्थान में प्रचार करने में जुटे हैं, तो अशोक गहलोत ने अभी से जालोर में कैंप कर लिया है, ताकि अपने जीते जी बेटे को राजनीति में स्थापित किया जा सके। अशोक गहलोत भी खुद की तरह पहले सांसद बनाकर और फिर कांग्रेस की सत्ता आने पर विधायक बना अपने बेटे को राज्य का  सीएम बनाने का सपना देख रहे हैं। सवाल यह उठता है कि सचिन पायलट ने वैभव गहलोत की जीत के लिए पूरी ताकत लगाने का दावा क्यों किया है? अशोक गहलोत कहते हैं कि राजनीति में जो होता है, वो दिखता नहीं है और जो दिखता है वो होता नहीं है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच अदावत जग जाहिर है। 

भले ही विधानसभा चुनाव से पहले पायलट गहलोत के बीच मनमुटाव खत्म होने का दावा किया गया हो, लेकिन तब से अब तक पायलट गहलोत एक बार भी साथ नहीं दिखे हैं। गहलोत ने पांच साल में पायलट की राजनीतिक हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, ऐसे में पायलट भी गहलोत के बेटे वैभव की राजनीतिक भ्रूण हत्या करना चाहते हैं। प्रचार करते भले ही दिखेंगे, लेकिन जितनी बार भी पायलट का जालोर दौरा होगा, उतनी ही वैभव की हार पक्की होती चली जाएगी।

दूसरी तरफ लुंबाराम चौधरी हैं जो पहली बार सांसद का चुनाव लड़ रहे हैं। लुंबाराम चौधरी भाजपा के बेहद सक्रिय कार्यकर्ता हैं। एक बार प्रधान, एक बार जिला परिषद सदस्य और दो बार भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे हैं।  1995 में वार्ड पंच, 2005 में प्रधान और 2020 में जिला परिषद सदस्य बने हैं। पारिवारिक राजनीति के लिहाज से भले ही वैभव गहलोत भारी दिखाई देते हों, लेकिन लुंबाराम स्थानीय होने के कारण भारी पड़ रहे हैं। पिछली बार कांग्रेस के रतन देवासी ने 5.11 लाख वोट हासिल किए थे, लेकिन इस बार गहलोत के कारण उनका टिकट काट दिया गया, जिसके कारण रतन देवासी काफी नाराज हैं और इसलिए उनके कार्यकर्ता भी वैभव गहलोत के लिए प्रचार नहीं कर रहे हैं। 

फिर भी अशोक गहलोत ने अपने गुट के तमाम कांग्रेसियों को जालोर में झोंक दिया है। अब देखना यह होगा कि स्थानीय और सामान्य परिवार से आने वाले भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता लुंबाराम चौधरी जीतकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचते हैं या राज्य के सबसे अमीर राजनेता अशोक गहलोत और उनकी संतान वैभव गहलोत की जीत का सपना पूरा हो पाता है। 

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