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वसुंधरा को भजनलाल ने सियासी मैदान में चित्त किया!

राजस्थान की बारां जिले की अंता विधानसभा सीट एक बार फिर से कांग्रेस के पास चली गई है। करीब दो साल पहले दिसंबर 2023 में यहां पर भाजपा के कंवरलाल मीणा ने जीते थे, लेकिन करीब 6 महीने पहले 20 साल पुराने एक मामले में सजा होने के बाद उनकी विधायकी चली गई। चुनाव हुआ है तो भाजपा अपनी सीट बचाने उतरी थी, खासतौर पर वसुंधरा राजे के लिए यह सीट करो या मरो जैसी स्थिति में थी, लेकिन हुआ वही, जिसका मैंने 10 दिन पहले 4 नवंबर को जिक्र किया था। 

उन कारणों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया था कि प्रमोद जैन भाया क्यों जीत रहे हैं। यह भी बताया था कि यहां पर वसुंधरा राजे चुनाव लड़ रही हैं, भाजपा की सरकार या संगठन चुनाव में नहीं है। मंत्री किरोड़ीलाल मीणा का चुनाव मैदान नहीं उतरना सबको अखर रहा था। ऐसे लग रहा था कि किरोड़ीलाल यहां पर प्रचार नहीं कर न केवल वसुंधरा राजे के उम्मीदवार का विरोध कर रहे थे, बल्कि नरेश मीणा का भी पक्ष ले रहे थे। 

2008 से अब तक देखा गया है कि पांचों चुनाव में कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया का वोट स्विंग कम होता है, दो बार हारे, तीसरी बार जीते। हारे तब बेहद कम वोटों से और तीनों ही बार जीते तो बड़े अंतर से जीते हैं। कई नेताओं द्वारा भाया पर कर्प्शन के आरोपों के बावजूद ग्राउंड पर उनका काम बोला है। 

यहां उनके लिए कांग्रेस की दिखाई एकता काम आई, सचिन पायलट ने प्रचार किया, अशोक चांदना ने जोर लगाया तो जो गुर्जर समाज का वोट नरेश मीणा के साथ जाने की संभावना थी, वो नहीं खिसक पाया, नरेश मीणा की आक्रामक शैली भले युवाओं को पसंद आती हो, लेकिन अधिसंख्य लोग इस शैली को ज्यादा पसंद नहीं करते हैं, भाजपा के उम्मीदवार मोरपाल सुमन का कमजोर कद और सत्ता व संगठन द्वारा वसुंधरा राजे का साथ नहीं देने का यह परिणाम रहा है। कुल मिलाकर जो परिणाम आया है, वो अपेक्षा के अनुरूप ही आया है।

यहां पर समझने वाली बात यह है कि इन तमाम फैक्टर्स में सबसे भारी कौनसा रहा है? समझने वाल बात यह है कि इस परिणाम से भजनलाल शर्मा, वसुंधरा राजे, सचिन पायलट, अशोक गहलोत जैसे नेताओं की सेहत पर क्या असर पड़ेगा? नरेश मीणा दो साल के भीतर तीसरा चुनाव हारे हैं, यह समय उनके लिए बहुत कुछ सोचने और बदलाव करने का वक्त है। 

मेरे इस वीडियो को यदि नरेश मीणा देख रहे हों, तो उनको मेरी यही सलाह है कि भले आप अपनी स्टाइल को आक्रामक रखें, लेकिन किसी को थप्पड़ मारना, लात मारना, गाली गलोच करना, इन तताम चीजों को छोड़ना होगा। यदि ये तीन बदलाव किए गए तो फायदा मिलेगा। इसके साथ ही सीट पर चुननी होगी, ऐसा नहीं चलता कि हर चुनाव में आप बदलते हुए चुनाव लड़ते चले जाएंगे। इससे लोगों का विश्वास कम होता है। 

भाजपा के लिए बड़ा सबक है बिखराव का विपरीत परिणाम। यहां पर समझना होगा कि क्या वसुंधरा राजे का सरकार और संगठन ने साथ दिया? तमाम नेता, मंत्री और मशीनरी लगी हुई थी, लेकिन फिर भी यह पक्का है कि सत्ता और संगठन चुनाव को उस तरह से नहीं लड़ रहे थे, जैसे चुनाव जीतना होता है। 

सत्ता-संगठन ने प्रभुलाल सैनी को टिकट देना चाहा, वसुंधरा राजे ने वीटो किया और मोरपाल को टिकट दिलाया, इसका परिणाम वसुंधरा राजे ने भुगत लिया है। इस हार के लिए वसुंधरा राजे को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सेहत पर कोई असर नहीं होने वाला है। अध्यक्ष मदन राठौड़ को इससे कोई मतलब ही नहीं है। वो वैसे भी नाममात्र के नजर आ रहे हैं। काम करने के लिए उनके पास है भी नहीं। 

अब सवाल यह उठता है कि इससे वसुंधरा राजे को क्या नुकसान होगा? असल में भले चेहरा मोरपाल सुमन का हो, लेकिन पूरा चुनाव वसुंधरा राजे ही लड़ रही थीं। इसलिए हार का नुकसान उनको उठाना ही होगा। नुकसान की बात करें तो केवल सीएम बनने की संभावना नहीं धुमिल हुई हैं, बल्कि मंत्रीमंडली फेरबदल में उनके गुट के विधायकों को मिलने वाली जगह भी कम हो गई है। 

एक सीट का परिणाम बहुत कुछ बदल देता है। जीतने पर वसुंधरा राजे भजनलाल सरकार और संगठन, दोनों पर हावी होतीं। केंद्रीय लीडरशिप पर भी बहुत प्रभाव पड़ता, लेकिन जिन्होंने चाहा, वैसा ही परिणाम आया तो इसका सियासी भुगतान वसुंधरा को ही करना होगा। भजनलाल शर्मा पर पहले भी कोई जिम्मेदारी नहीं थी और आगे भी नहीं रहने वाली है। उनकी कुर्सी दिल्ली से तय हुई थी और वहीं से कुर्सी का भविष्य तय होगा। संगठन मुखिया मदन राठौड़ के पास न करने को कुछ है और न ही जिम्मेदारी का कोई असर है। 

इधर, कांग्रेस में अशोक गहलोत को लाभ होगा। गोविंद सिंह डोटासरा को भी फायदा होगा, उनका कद बढ़ेगा, जो लोग उनको शेखावाटी का नेता कहते थे, वो सोचने पर मजबूर होंगे। पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट को भी लाभ होने वाला है। या​नी इस जीत से प्रमोद जैने भाया से लेकर अशोक चांदना तक, कांग्रेस का हर नेता फायदे में रहेगा। 

अशोक गहलोत के करीबी होने के कारण प्रमोद जैन भाया की जीत से उनको फायदा मिलेगा, टिकट देने और अध्यक्ष होने के कारण डोटासरा समर्थक इस जीत को अपनी जीत बताएंगे और सचिन पायलट के पास कहने को है कि गुर्जर वोट नरेश मीण के पास नहीं जाने दिया। ऐसे में कांग्रेस के तीनों बड़े नेता फायदे में रहने वाले हैं। हार के बाद भी फायदा तो मोरपाल सुमन को भी होने वाला है। 

भले ही वो अपना पहला चुनाव हार गए हों, लेकिन उनको अगले चुनाव में मुख्य दावेदार माना जाएगा। नरेश मीणा यदि अगली बार भी इसी सीट से चुनाव लड़ते हैं तो शायद जीत के समीकरण बन जाएं, लेकिन इसकी संभावना बेहद कम है कि वो फिर से सीट नहीं बदलेंगे। यदि उन्होंने अगले चुनाव में फिर से सीट बदली तो उनपर कोई भरोसा नहीं करेगा। 

जीता कौन, हारा कौन, इसका असर तभी माना जाएगा, जब विकास पर फर्क पड़े, लेकिन विकास की अपनी रफ्तार रहने वाली है, विधायक कोई बने। ऐसे में जनता को कुछ दिन मनोरंजन करने का मौका मिला है, लोकतंत्र के इस कथित पर्व में हिस्सा लेने का अवसर मिला है, इससे अधिक कुछ नहीं मिलने वाला है। 


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