राजस्थान की राजनीति में मानेसर कांड़ एक ऐतिहासिक सबक बन चुका है। आज राजनीति को समझने वाले अपनी आने वाली पुस्तों को बताएंगे कि 2020 में एक मानेसर कांड़ हुआ था, जिसने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। ऐसा सियासी कांड़ उससे पहले कभी नहीं हुआ था, लेकिन अब पांच साल के बाद एक बार फिर से राजस्थान की राजनीति में मानेसर कांड़ की चर्चा चल पड़ी है।
अशोक गहलोत और हनुमान बेनीवाल जैसे नेताओं को लगता है कि भाजपा की भजनलाल शर्मा सरकार एक मानेसर जैसे कांड़ का सामना कर सकती है। बेनीवाल के बयान के बाद इस चर्चा ने जोर पकड़ा तो अशोक गहलोत ने ऐसी बातों को पहले ही यह कहकर हवा दी थी कि भाजपा में कुछ नेता भजनलाल शर्मा की की कुर्सी छीनने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनको, यानी कांग्रेस को भजनलाल शर्मा शूट करते हैं, वे सीएम बने रहने चाहिए। दूसरी ओर पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा है कि राज्य सरकार के अफसर भजनलाल को सीएम पद से हटाने की योजना बना रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब भजनलाल शर्मा कांग्रेस और अशोक गहलोत को शूट करते हैं, तो फिर गहलोत सीएम को हटने की चेतावनी क्यों दे रहे हैं? क्यों अशोक गहलोत को लगता है कि भजनलाल शर्मा को हटाने के लिए भाजपा में अंदर साजिश चल रही है? और अशोक गहलोत को भाजपा की इंटरनल पॉलिटिक्स के बारे में इतनी गहराई से कौन बताता है, जबकि ऐसे बड़े फैसले केवल मोदी-शाह के स्तर पर होते हैं, जिनकी किसी को भनक तक नहीं लगती है?
सवाल यह भी उठता हे कि हनुमान बेनीवाल ने किस आधार पर कहा है कि राजस्थान में एक बार फिर से मानेसर कांड़ हो सकता है? डोटासरा ने इस बात का जिक्र क्यों किया कि राज्य की ब्यूरोक्रेसी ही भजनलाल शर्मा को हटाने की योजना बना रही है?
इन दोनों नेताओं के बयानों के आधार पर भाजपा में भी मानेसर कांड़ होने की संभावनाओं की बात करेंगे, लेकिन उससे पहले आपमें से जो लोग मानेसर कांड़ को नहीं जानते हैं, वो शॉर्ट में समझ लीजिए। दरअसल, अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच सीएम पद के लिए खींचतान चल रही थी। पायलट सीएम बनना चाहते थे, जिसका गांधी परिवार ने उनसे वादा किया था और गहलोत उनको पार्टी से निपटना चाहते थे।
जब गांधी परिवार ने कोई रेस्पोंस नहीं दिया और गहलोत सीएम की कुर्सी से चिपक गए, तब 11 जुलाई 2020 को पायलट अपने डेढ़ दर्जन साथियों के साथ हरियाणा के मानेसर स्थित एक रिजॉर्ट में चले गए। यहां ये सभी विधायक 34 दिन तक रहे और कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार दो होटलों में कैद रही। बाद में गांधी परिवार ने बीच बचाव कर पायलट को मनाया, और उन्होंने गहलोत सरकार को समर्थन दिया।
उस दौरान पूरे देश की नजरें राजस्थान पर आकर टिक गई थींं। उस कांड के कारण सचिन पायलट को डिप्टी सीएम और पीसीसी चीफ के पदों से हाथ धोना पड़ा था और दोनों नेताओं के बीच लगातार साढ़े तीन साल तक खींचतान चलती रही थी। दोनों नेताओं की इस सियासी जंग से जनता परेशान थी, जिसके चलते कांग्रेस पार्टी पिछले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।
उसके बाद भाजपा पांच साल बाद सत्ता में आई, लेकिन सीएम बनने की सबसे तगड़ी दावेदार वसुंधरा राजे को दरकिनार कर पहली बार जीते विधायक भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। सियासी साजिशों से अनजान भजनलाल शर्मा मोदी-शाह के आर्शीवाद से शासन तो कर रहे हैं, लेकिन माना जाता है कि वसुंधरा राजे का गुट हमेशा इस ताक में बैठा रहता है कि कैसे कोई रास्ता निकले और भजनलाल को हटाकर वसुंधरा को सीएम बनाया जाए।
इसे लेकर वसुंधरा राजे का गुट कई बार गुप्त बैठकें कर चुका है, लेकिन संख्याबल की कमी के कारण बगावत जैसा कदम नहीं उठाया जा सका है। दो बार सीएम रहीं वसुंधरा राजे तानाशाह स्टाइल में शासन करती हैं। जब वो सीएम होती हैं तो दिल्ली में बैठे अपने आलाकमान को भी ज्यादा भाव नहीं देती हैं। इसलिए मोदी और शाह को पता है कि यदि वसुंधरा को मुख्यमंत्री बना दिया गया तो राजस्थान सरकार में उनकी चवन्नी नहीं चलेगी।
वसुंधरा राजे 2013 से 18 तक ऐसा कर चुकी हैं। जबकि तब 2014 में नरेंद्र मोदी पीएम बन चुके थे और अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। उसी दौरान मोदी-शाह चाहते थे कि पार्टी अध्यक्ष उनकी इच्छा से बने, लेकिन वसुंधरा राजे ने ऐसा नहीं करने दिया था।
कहते हैं कि वसुंधरा राजे पहली बार सीएम थीं और नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में अमित शाह को जब राज्य बदर कर दिया था, तब वो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से रहने की मदद मांगने आए थे। मुख्यमंत्री होते नरेंद्र मोदी ने अपनी समकक्ष वसुंधरा को उनके मंत्री अमित शाह की मदद करने के लिए निवेदन किया था, लेकिन दो घंटों तक इंतजार कराने के बाद भी वसुंधरा ने अमित शाह से मिलने की जहमत नहीं उठाई थी।
तभी से अमित शाह और वसुंधरा राजे के रिश्ते सामान्य नहीं हैं। यह भी कहा जाता है कि 2018 में मोदी और शाह चाहते तो वसुंधरा राजे की सत्ता रिपीट हो सकती थी, लेकिन दोनों ने जानबूझकर ऐसा नहीं होने दिया। दोनों को वसुंधरा राजे अपनी राजशाही स्टाइल के कारण झटके देकर खासे नाराज कर चुकी थीं। ऐसे में 2018 के चुनाव में जब वसुंधरा राजे सत्ता से बाहर हुईं तो दोनों नेताओं ने अपनी मर्जी से अध्यक्ष बनाया और वसुंधरा राजे को लगभग दरकिनार कर दिया गया।
यहां तक कि विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए भी वसुंधरा राजे को खास तवज्जो नहीं दी गई। अपनी इच्छा से अध्यक्ष नहीं बनाए जाने के कारण वसुंधरा पूरे पांच साल आलाकमान से नाराज रहीं, चुनाव में भी खास रुचि नहीं दिखाई, जो दोनों बड़े नेता भी नहीं चाहते थे।
भाजपा की वर्तमान सरकार को करीब दो साल हो चुके हैं, लेकिन वसुंधरा राजे की नाराजगी और सीएम नहीं बनाए जाने की टीस साफ तौर पर दिखाई देती है। पिछले दिनों अंता उपचुनाव में भी भाजपा की लीडरशिप ने वसुंधरा को खास सपोर्ट नहीं किया, जिससे उनके करीबी प्रत्याशी मोरपाल सुमन करीब 15 हजार वोटों से चुनाव हार गए।
सीएम नहीं बनाए जाने, भजनलाल सरकार में चलत की कमी, आलाकमान द्वारा भाव नहीं दिए जाने और अंता का उपचुनाव हारने के कारण वसुंधरा राजे खासी नाराज बताई जाती हैं, जिसके कारण विपक्षी नेताओं का मानना है कि वसुंधरा राजे यदि दम दिखाए तो कई विधायक उनके साथ आ सकते हैं, और वो भजनलाल की भाजपा सरकार को अल्पमत में ला सकती हैं। यही वजह है कि हनुमान बेनीवाल मानेसर कांड़ और अशोक गहलोत भजनलाल शर्मा को सीएम पद से हटाए जाने के बयान देते रहते हैं।
कांग्रेस और अशोक गहलोत को भजनलाल के सीएम बने रहने से फायदे की बात करें तो इस बयान को जातिगत आधार पर कसौटी पर कसा जाना चाहिए। राज्य में जाट, राजपूत, ब्राह्मण तीन बड़ी जातियां हैं। नेरेटिव के आधार पर ब्राह्मण और राजपूत तो भाजपा को ही वोट देते हैं, लेकिन जाट अपनी पसंद के अनुसार वोटिंग करते हैं, जो समय, उम्मीदवार, मुद्दों और लीडरशिप के अनुसार तय होता है।
ब्राह्मण समुदाय कांग्रेस को वोट नहीं करता है, लेकिन ब्राह्मण समाज से आने वाले भजनलाल शर्मा को सीएम बनाए रखने से अशोक गहलोत द्वारा जाट, मीणा, गुर्जर, राजपूत जैसे समाजों की नाराजगी का नेरेटिव बनाया जाता है। भजनलाल के नाम से कांग्रेस पार्टी यही हथियान चला रही है, ताकि भाजपा को मिलने वाले जाट, गुर्जर, मीणा वोट में सेंधमारी की जा सके।
अशोक गहलोत और हनुमान बेनीवाल की बगावत करने वाली बातों में कितना दम है, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन भाजपा की अनुशासनात्मक कार्यशैली, संगठन में विधायकों को एकजुट रखने की क्षमता, केंद्रीय स्तर पर गुप्तचर एजेंसियों की निगरानी जैसे कारणों से वसुंधरा राजे गुट की मानेसर कांड़ सरीखी बगावत की संभावना बेहद कम हो जाती है। इसलिए सामान्य तौर पर यही माना जाता है कि इन दोनों नेताओं के बयान केवल नेरेटिव बनाने से ज्यादा कुछ नहीं हैं।
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