आज एक ऐसी बात करते हैं जो शायद आपके मन में भी आई होगी। सोचो, कोई तुम्हारे घर पर रोज़ पत्थर फेंके। कभी खिड़की तोड़े, कभी छत पर आग लगाए। और तुम हो कि बस देखते रहो। न बोलो, न पलटवार करो। पड़ोसी पूछें तो कहो "हाँ भाई, देख रहे हैं।" तो लोग क्या सोचेंगे? कि यह बंदा डरपोक है? या कि इसके मन में कुछ और चल रहा है? यही सवाल आज पूरी दुनिया खाड़ी देशों से पूछ रही है।
28 फरवरी 2026 को ईरान ने एक साथ छह देशों पर हमला किया। दुबई का हवाईअड्डा बंद हो गया। बहरीन में ड्रोन से इमारतें हिलीं। कतर के सबसे बड़े गैस प्लांट पर आग लगी। कुवैत जला। सऊदी अरब की राजधानी रियाद तक मिसाइलें पहुँचीं। मतलब पूरी खाड़ी जल रही थी। और इन सबके बाद भी आज तक किसी एक देश ने ईरान को जवाब नहीं दिया, लेकिन उससे पहले एक ज़रूरी बात। इस लड़ाई में आखिर कौन कितना डूबा? क्योंकि जब तक नुकसान नहीं समझोगे, चुप्पी की वजह नहीं समझोगे।
ईरान की बात करें तो यह देश इस युद्ध में सबसे ज़्यादा डूबा है, लेकिन मानता नहीं। युद्ध शुरू होने से पहले ही ईरान की हालत खराब थी, महंगाई 40 प्रतिशत से ऊपर, ईरानी रियाल लगातार गिर रहा था। जब अमेरिका और इज़राइल ने हमले किए तो 4,000 से ज़्यादा इमारतें तबाह हुईं, तेल और गैस के बड़े ठिकाने बर्बाद हो गए। Chatham House के विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की GDP 10 प्रतिशत से ज़्यादा गिर सकती है। और सबसे बड़ा झटका यह कि ईरान ने हॉर्मुज़ बंद करके अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन इससे ईरान का खुद का आयात रुक गया। गेहूँ लाने वाले नौ जहाज़ बाहर खड़े रहे, अंदर नहीं आ सके। यानी हथियार अपने ही पैर पर चला दिया।
खाड़ी देशों को जो नुकसान हुआ वो सुनकर आँखें चौड़ी हो जाएंगी। Goldman Sachs के अर्थशास्त्रियों ने हिसाब लगाया कि अगर युद्ध लंबा चला तो कुवैत और कतर की GDP इस साल 14 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है। सऊदी अरब को 3 प्रतिशत और UAE को 5 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है। कतर की LNG निर्यात क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा एक ही झटके में बर्बाद हो गया। दुबई का हवाईअड्डा बंद हुआ, दुनिया का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा है दुबई एयरपोर्ट, जो अमीरात को हर साल अरबों डॉलर का रैवेन्यू देता है। खाड़ी की सबसे बड़ी एयरलाइनें अभी भी युद्ध से पहले की उड़ानें बहाल नहीं कर पाई हैं। IEA के प्रमुख ने इसे "इतिहास की सबसे बड़ी ऊर्जा सुरक्षा चुनौती" बताया है।
अमेरिका लड़ रहा है और डॉलर भी जमकर खर्च कर रहा है। Pentagon के अनुसार पहले छह दिनों में ही 11.3 अरब डॉलर खर्च हो गए। बारहवें दिन तक यह आँकड़ा 16.5 अरब डॉलर तक पहुँच गया। रोज़ाना का खर्च है 50 करोड़ डॉलर, यानी हर रोज़ करीब 4,000 करोड़ रुपये। अमेरिका ने IEA के साथ मिलकर इतिहास का सबसे बड़ा तेल भंडार रिलीज़ किया, 120 दिनों में 40 करोड़ बैरल, लेकिन यह हॉर्मुज़ की तबाही के सामने ऊँट के मुँह में जीरा निकला।
Trump ने रूस पर लगे कुछ प्रतिबंध हटाकर रूसी तेल बाज़ार में लाने की कोशिश की, जिससे रूस को हर रोज़ 15 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त कमाई होने लगी। यानी अमेरिका ने दुश्मन ईरान को मारा और दोस्त रूस को फ़ायदा पहुँचा दिया। अब ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। उसे नाटो देश साथ नहीं दे रहे हैं, कांग्रेस ने बजट देने से इनकार कर दिया है, ईरान के कहर से खाड़ी देशों को बचाना चुनौती है और सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान ने उसके सामने युद्धविराम के लिए 5 बड़ी शर्तें रख दी हैं, जिनमें हॉर्मुज में स्थाई रूप से धन उगाही के साथ ही युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई मांगी है। इस्राइल भी अब अमेरिका के हाथ से निकलता जा रहा है, जबकि खाड़ी देशों का अमेरिका से भरोसा उठ रहा है।
वैसे देखा जाए तो इज़राइल इस युद्ध का सबसे बड़ा खिलाड़ी है, लेकिन क़ीमत भी चुका रहा है। इज़राइल के वित्त मंत्रालय ने बताया कि युद्ध की वजह से हर हफ़्ते 2.93 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है, यानी हर महीने करीब एक लाख करोड़ रुपये। Netanyahu कहते हैं कि "हम जीत रहे हैं।" लेकिन बैंक के आँकड़े कुछ और कहानी सुनाते हैं। अब वापस उस सवाल पर आते हैं जो आपके मन में है, ईरान से पिटने के बाद भी आखिर खाड़ी देश चुप क्यों हैं?
इसे समझने के लिए 2019 याद करो। सऊदी अरब के सबसे बड़े तेल कारखाने अबक़ैक़ पर हमला हुआ। दुनिया का सबसे बड़ा तेल केंद्र जल गया। और अमेरिका ने क्या किया? बस बयान दिया। कोई जवाबी हमला नहीं, कोई ठोस मदद नहीं। उस दिन सऊदी अरब को समझ आ गया। अमेरिका छाता तो देता है, लेकिन बारिश होते ही खुद भाग जाता है। अमेरिकी नौसेना के पूर्व उप-कमांडर वाइस एडमिरल रॉबर्ट हार्वर्ड ने खुद कहा कि "हम डेढ़ दशक में इन देशों का भरोसा जीत नहीं पाए।" तो अब सोचो अगर सऊदी ईरान पर हमला करे और अमेरिका पीछे हट जाए, तो सऊदी अकेला पड़ जाएगा। और ईरान के सामने अकेले पड़ना मतलब खाड़ी देशों को बहुत बड़ा नुकसान।
यहाँ एक मज़ेदार मोड़ आता है। ईरान ने हमला किया और माफ़ी भी माँगी। ईरान ने कहा "यार, हमें माफ़ करना, हमारा निशाना तुम नहीं थे, हम तो बस अमेरिकी ठिकानों को मार रहे थे, तुम बीच में आ गए।" और अगले दिन फिर हमला कर दिया। यह माफ़ी नहीं है, यह धमकी है, बस तमीज़ से दी गई। ईरान खाड़ी देशों को इतना दर्द दे रहा है कि वे बेचैन हो जाएं, लेकिन इतना नहीं कि वे पलट कर वार करें। जैसे कोई तुम्हें चुटकी काटता रहे, दर्द हो लेकिन थप्पड़ न मार सको। ईरान चाहता है कि खाड़ी देश अमेरिका के पास जाकर कहें, "भाई बंद करो यह लड़ाई, हम तंग आ गए।" यानी खाड़ी देशों को अपना हथियार बनाना चाहता है ईरान, अमेरिका के ख़िलाफ़। आज इसमें ईरान काफी हद तक सफल होता हुआ नजर आ रहा है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने कुछ दिन पहले टीवी पर कहा कि "कभी अगर अमेरिका ने पाकिस्तान पर हमला किया तो हम भारत पर हमला करेंगे।" अब भारत और अमेरिका का क्या लेना देना? लेकिन यही चाल है, तीसरे को नुकसान पहुँचाने की धमकी देकर असली दुश्मन को डराओ। ईरान भी यही कर रहा है खाड़ी देशों के साथ। इस बीच 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान ने हाथ मिलाए थे, दूतावास खुले थे, रिश्ते बहाल हुए थे। तो अब सऊदी सोच रहा है यार, अभी तक तो बात हो रही थी, सीधे दुश्मन क्यों बनें? सऊदी के जानकार सलमान अल-अंसारी ने पुरानी कहावत याद दिलाई, "जिंदा लोग मुर्दों से नहीं लड़ते।" मतलब जब तक टाल सकते हो, टालो।
और सबसे बड़ी बात जो कहीं नहीं बताई जाती, ओमान का गुप्त खेल। छह खाड़ी देशों में सिर्फ ओमान पर ईरान ने हमला नहीं किया। क्योंकि ओमान सालों से ईरान और बाकी दुनिया के बीच चुपचाप बातचीत कराता आया है। 6 फरवरी 2026 को ओमान ने अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त बैठक कराई। 26 फरवरी को ओमान ने ही बताया कि ईरान समझौते के लिए तैयार हो गया था, अपना परमाणु कार्यक्रम रोकने को राज़ी था। बात बनने ही वाली थी। और तभी अमेरिका और इज़राइल ने हमला कर दिया। खाड़ी देश यह सब जानते हैं। उन्हें पता है कि ईरान बातचीत चाहता था और यह युद्ध अमेरिका ने शुरू किया। तो वे अमेरिका के साथ दिल से कैसे खड़े हों?
तो आख़िर में वह सवाल जो आप पूछना चाहते हैं, ये खाड़ी देश हैं किसके साथ? अमेरिका के या ईरान के? न इसके, न उसके। और यही इनकी सबसे बड़ी चालाकी है। GCC की बैठक में इन्होंने ईरान की निंदा की, लेकिन अमेरिका को अपनी ज़मीन से हमला नहीं करने दिया। मुँह से कहा कि "ईरान गलत है।" और काम से कहा कि "अमेरिका, हम तुम्हारे लिए नहीं लड़ेंगे।" यह चुप्पी डर नहीं है दोस्तों, यह एक बहुत होशियार खेल है। ये देश दोनों को अँधेरे में रख रहे हैं और खुद रोशनी में बैठे हैं। और इस खेल में हर देश घाटे में है, ईरान अपने ही हथियार से ज़ख्मी है, खाड़ी देश जल रहे हैं, अमेरिका रोज़ 4,000 करोड़ फूँक रहा है और इज़राइल हर हफ्ते एक लाख करोड़ गँवा रहा है। मध्य पूर्व की राजनीति हमेशा से ऐसी ही रही है, जो दिखता है वो होता नहीं, जो होता है वो दिखता नहीं।

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