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गहलोत का राजनीतिक जादू और पायलट का इंतज़ार: राजस्थान की कुर्सी का वो कच्चा चिट्ठा जो कोई नहीं खोलता


एक नेता जो विपक्ष में बैठकर भी सत्ता चलाता है, जो अपनी ही पार्टी के नेताओं को निपटाकर CM बनता है, जो हाईकमान को चुनौती देता है और फिर भी बचा रहता है, और जो जानबूझकर कांग्रेस को पूरा बहुमत नहीं जीतने देता, ताकि उसकी ज़रूरत बनी रहे। यह कोई फ़िल्म की कहानी नहीं, यह अशोक गहलोत की सियासी जादूगरी है।

राजनीति में एक कहावत है कि "जो दिखता है, वो होता नहीं और जो होता है, वो दिखता नहीं।" इस कहावत को अगर किसी एक नेता ने सबसे बेहतरीन तरीके से जिया है, तो वो हैं अशोक गहलोत। तीन बार मुख्यमंत्री, तीनों बार अलग तरीके से, तीनों ही बार अलग दुश्मन को निपटाकर, और हर बार यह साबित करके कि राजनीति में असली जादू वो नहीं होता जो मंच पर होता है, असली जादू वो होता है जो पर्दे के पीछे होता है। आज राजस्थान की राजनीति का वो कच्चा चिट्ठा खोलेंगे जो अखबारों में नहीं आता, जो TV पर नहीं दिखता और जो नेता खुद कभी नहीं बताते। गहलोत तीन बार CM कैसे बने? पायलट दो बार CM बनने से क्यों चूके? और 2028 में क्या होगा? बीजेपी सरकार रिपीट होगी या कांग्रेस सत्त में वापसी करेगी? इन सभी सवालों के जवाब आज एक-एक करके निकालने का प्रयास करेंगे।

1998 के विधानसभा चुनाव में गहलोत के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस ने 156 सीटों पर जीत दर्ज की। यह पहली बार था, जब गहलोत ने साबित किया कि CM बनने का रास्ता सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि उससे पहले संगठन की जड़ें मज़बूत करने से बनता है। जिस दौर में कांग्रेस कमज़ोर हो रही थी, उस दौर में गहलोत ने अलग-अलग जातियों और वर्ग से नेताओं को चुना और पार्टी के लिए युवा नेताओं की लंबी फेहरिस्त तैयार की। 

यह उनकी पहली strategy है, विपक्ष में रहते हुए संगठन बनाओ, जातीय समीकरण साधो और जब चुनाव आए तो गांधी परिवार के सामने यह दिखाओ कि तुम्हारे बिना जीत असंभव है। हालांकि, पार्टी अध्यक्ष गहलोत ही थे, जैसे आज डोटासरा हैं, लेकिन फिर भी इलेक्शन के टाइम किसी एक चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ा जाता है, तो यह बात भी 16 आने सच है कि उस चुनाव में कांग्रेस ने परसराम मदेरणा का चेहरा आगे कर चुनाव लड़ा था, और इसलिए किसान वर्ग ने कांग्रेस को बंपर वोट दिया, लेकिन फिर भी गांधी परिवार ने मदेरणा को सीएम नहीं बनाया।

2003 में वसुंधरा राजे ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी। बुरी तरह से हारकर गहलोत विपक्ष में आ गए, लेकिन वो पांच साल शांत नहीं बैठे। धीरे-धीरे संगठन फिर खड़ा किया। जातीय समीकरण फिर साधे, और 2008 में 13 दिसंबर 2008 को गहलोत ने दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, लेकिन इस बार सरकार बनाना आसान नहीं था। 

कांग्रेस को बहुमत नहीं था, तो गहलोत ने क्या किया? 2008 में जिस तरह से सरकार बचाने के लिए गहलोत ने BSP के 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करके पार्टी का ही प्रदेश स्तर पर विलय करवाया, यह आज एक उदाहरण के रूप में जाना जाता है, यानी जब बहुमत न हो तो दूसरी पार्टी के विधायक तोड़ो, यह गहलोत की दूसरी strategy है।

और फिर 2018 में, जब सचिन पायलट के चेहरे पर वोट पड़े थे? 2003 और 2013 की हार के बाद कांग्रेस टूटी हुई थी। सचिन पायलट PCC अध्यक्ष थे। वो चाहते थे कि CM फेस उन्हें बनाया जाए, लेकिन परिणाम के बाद गांधी परिवार ने गहलोत पर भरोसा किया। 17 दिसंबर 2018 को गहलोत ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री बने। पायलट ने पांच साल मेहनत की, ज़मीन तैयार की, लेकिन कुर्सी गहलोत को मिली।

तो गहलोत की असली strategy क्या है? पहली बात, विपक्ष में रहते हुए गांधी परिवार की सेवा करो, उनके programmes में आगे रहो, उनके हर फैसले का समर्थन करो। राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के दौरान अशोक गहलोत उनके मार्गदर्शक भी रहे। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की लॉन्चिंग के दौरान गहलोत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दूसरी बात, जातीय समीकरणों को इतना मज़बूत रखो कि गांधी परिवार के पास दूसरा विकल्प न रहे। और तीसरी बात सबसे विवादास्पद है, अपने प्रतिद्वंद्वियों को पार्टी के अंदर ही इतना कमज़ोर करो कि वो कभी मुख्यमंत्री की दौड़ में आ ही न सकें।

आरोप लगते हैं कि गहलोत खुद की पार्टी के नेताओं को निपटाते हैं। यह आरोप बहुत तीखा है, लेकिन इसके जवाब में कई मजबूत तथ्य हैं। 2018 में जब कांग्रेस जीती तो PCC अध्यक्ष सचिन पायलट थे, पाँच साल उन्होंने राजस्थान में ज़मीन तैयार की, विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार चुने, लेकिन CM गहलोत बने। 

पायलट को deputy सीएम बना दिया गया। फिर गहलोत ने धीरे-धीरे पायलट के करीबी मंत्रियों को कमज़ोर किया। SOG notice भेजा, तत्कालीन डिप्टी CM सचिन पायलट ने आरोप लगाया कि गहलोत के इशारे पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप में SOG notice भेजा गया। 11 जुलाई 2020 को पायलट ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत की और 19 विधायकों के साथ मानेसर रिज़ॉर्ट में डेरा डाला। 14 जुलाई को पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया गया, यानी जो नेता उनके लिए खतरा बना, उसे पद से हटवा दिया।

ऐसा नहीं है कि गहलोत ने केवल राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को निपटाया, 2022 में कुर्सी हिलती देख सोनिया गांधी को भी आंखें दिखाने से नहीं चूके। 25 सितंबर 2022 को गहलोत गुट के विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को सामूहिक रूप से इस्तीफा सौंप दिया। 

यह तब हुआ जब गांधी परिवार ने संकेत दिया था कि गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष बनें और प्रदेश का CM बदला जाए। गहलोत ने अपने 90 से ज़्यादा विधायकों को इकट्ठा करके सीधे हाईकमान को चुनौती दे दी। संदेश साफ था कि "मेरे बिना राजस्थान में सरकार नहीं चलती।" और अंतत: गांधी परिवार को झुकना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस हारने तक गहलोत CM बने रहे। यह उनकी सबसे बड़ी जीत थी, लेकिन गांधी परिवार के साथ रिश्ते में यही सबसे बड़ी दरार भी बनी।

जब कांग्रेस बहुमत की तरफ बढ़ रही होती है, तब निर्दलीय उम्मीदवार ही गहलोत की असली चाल होती है। वैसे तो यह आरोप बहुत गंभीर है। कहा जाता है कि गहलोत जानबूझकर चुनाव में अपने करीबी लोगों को निर्दलीय उतरवाते हैं। इससे दो काम होते हैं। 

पहला तो कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता और दूसरा यह कि जब सरकार बनती है तो वो निर्दलीय गहलोत के साथ आ जाते हैं और गहलोत की ताक़त बढ़ जाती है। 2018 में 200 में से 199 सीटों पर वोटिंग हुई, जिनमें कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं और 13 निर्दलीय जीते। उन 13 निर्दलीयों में से अधिकांश गहलोत के करीबी माने जाते थे। 

इन्हीं के दम पर गहलोत सरकार चली। अगर कांग्रेस को 113-115 सीटें मिलतीं तो गहलोत की ज़रूरत उतनी नहीं रहती। पूर्ण बहुमत आता तो गांधी परिवार किसी को भी CM बना सकता था, लेकिन अधूरे बहुमत में गहलोत अपरिहार्य बन गए।

गहलोत के जादू को आपने देखा, लेकिन युवाओं की पहली पसंद होने के बाद भी सचिन पायलट CM क्यों नहीं बन पाए? पायलट की कहानी भारतीय राजनीति की सबसे दुखद कहानियों में से एक है। 2013 में जब कांग्रेस बुरी तरह हारी, तब पायलट ने PCC अध्यक्ष बनकर पांच साल राजस्थान की ज़मीन तैयार की, गाँव-गाँव गए, बूथ स्तर तक संगठन बनाया, 2018 में कांग्रेस जीती, लेकिन CM पायलट नहीं बने। 

सवाल उठता है ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि गांधी परिवार को लगा कि गहलोत का अनुभव ज़्यादा है, पायलट युवा हैं, उन्हें Deputy सीएम से शुरू करने दो। गहलोत ने गांधी परिवार को भरोसा दिलाया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को आधी सीटों पर जीत दिलाएंगे, लेकिन सभी 25 सीटें हार गए। 

फिर 2020 में जब पायलट ने बगावत की, तो उन्होंने खुद अपना सबसे बड़ा नुकसान किया। गांधी परिवार ने उनकी बगावत को माफ तो किया, लेकिन भरोसा कमज़ोर हो गया। 2022 में जब गहलोत ने हाईकमान को ही चुनौती दी, तब एक मौका था कि पायलट CM बनें, लेकिन गहलोत के विधायकों ने इतनी बड़ी संख्या में इस्तीफे दिए कि गांधी परिवार डर गया कि अगर पायलट को CM बनाते तो सरकार ही गिर जाती।

राजस्थान में 1993 से एक अटूट मिथक चला आ रहा है, हर पांच साल में सरकार बदलती है। 1993 में भाजपा। 1998 में कांग्रेस। 2003 में भाजपा। 2008 में कांग्रेस। 2013 में भाजपा। 2018 में कांग्रेस। 2023 में भाजपा, तो क्या 2028 में कांग्रेस आएगी? मिथक कहता है कांग्रेस ही आएगी, लेकिन क्या मिथक से चुनाव जीते जाते हैं? ऐसा बिलकुल भी नहीं है, मिथक तो टूटने के लिए ही होते हैं। 

BJP के लिए 2028 इसलिए कठिन है, क्योंकि सरकार होने के कारण Anti-incumbency का सामना करना पड़ेगा, लेकिन कांग्रेस के लिए 2028 इसलिए कठिन है, क्योंकि उनके पास एक united CM face नहीं है। गहलोत अपनी PR कंपनी और रील्स से चौथी बार CM बनना चाहते हैं। पायलट गांधी परिवार की कृपा से पहली बार CM बनना चाहते हैं। डोटासरा संगठन के दम पर उभर रहे हैं, और जूली विधानसभा में लड़ते रहे हैं।

अब सीएम बनाने में संविधान की बात करते हैं। संविधान के अनुसार CM वही बनता है, जिसे विधानसभा में विधायकों के बहुमत का समर्थन हो। राज्यपाल सबसे बड़े दल के नेता को आमंत्रित करते हैं, लेकिन व्यवहार में पार्टी का CM कौन होगा यह तय करती है पार्टी हाईकमान, और कांग्रेस में हाईकमान मतलब गांधी परिवार। 

इसलिए राजस्थान में CM वही बनेगा, जिसे गांधी परिवार चाहेगा, और गांधी परिवार वही चाहेगा, जो उनकी राष्ट्रीय राजनीति के लिए ठीक हो। राजस्थान में 2028 का चुनाव personality नहीं, performance पर लड़ा जाएगा। अगर BJP सरकार ने 5 साल में ज़मीन पर काम दिखाया, तो मिथक टूट सकता है। 

अगर नहीं दिखाया तो Anti-incumbency कांग्रेस को वापस ले आएगी, लेकिन जब तक कांग्रेस गहलोत-पायलट की खींचतान से बाहर नहीं निकलती, जब तक एक united चेहरा नहीं होगा, जब तक निर्दलीयों की राजनीति बंद नहीं होगी, तब तक 2028 में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित नहीं है। राजनीति में जादू वही करता है जो दूसरों को दिखता नहीं। गहलोत 44 साल से यही करते आ रहे हैं... तो सवाल यह है कि क्या राजस्थान की जनता अबकी बार यह जादू पहचान लेगी?


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