एक युवा विधायक, भरी दुपहरी में 48 डिग्री की झुलसाती धूप, चारों तरफ हजारों लोगों का हुजूम, पुलिस के साथ तीखी झड़प और अचानक वो विधायक अपने बेग से पेट्रोल की बोतल निकालता है, अपने सिर पर छिड़कता है और माचिस जलाने ही वाला होता है कि उसके समर्थकों द्वारा रोक लिया जाता है।
आगे बढ़ने से पहले जरा सोचिए राजस्थान के बाड़मेर में ऐसा क्या हो गया, जिसने पूरे देश की राजनीति और सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया? आखिर क्यों शिव विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय और निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी को आत्मदाह जैसा खौफनाक कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा? क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक स्टंट था, या फिर इसके पीछे छिपी है हजारों गरीब मजदूरों के आंसुओं, उनके हक और उनके साथ हुए धोखे की एक ऐसी दास्तां, जिसे सुनकर आपका सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा? आज इस वीडियो में हम राजनीति से ऊपर उठकर इस पूरे मामले का पूरा सच, इसकी जड़ और उस खौफनाक मंजर की पूरी कहानी को एक-एक करके डिकोड करेंगे, इसलिए इस वीडियो को आखिर तक जरूर देखिए और ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए, ताकि सच हर किसी के सामने आ सके।
इस पूरी कहानी की शुरुआत आज से नहीं, बल्कि करीब 30 साल पहले हुई थी। राजस्थान का बाड़मेर जिला, जो अपनी तपती रेतीली जमीनों के लिए जाना जाता है, वहां एक प्रोजेक्ट की शुरुआत होती है जिसे हम 'गिरल लिग्नाइट माइंस' के नाम से जानते हैं। राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स लिमिटेड, यानी RSMML की इस खदान के लिए थुंबली, गिरल और आसपास के तमाम गांवों के किसानों की उपजाऊ जमीनें अधिग्रहित की गईं, यानी सरकार और कंपनी ने वो जमीनें ले लीं।
अब आप सोचिए, एक किसान के लिए उसकी जमीन ही उसका सब कुछ होती है, उसकी मां होती है, उसकी आजीविका का एकमात्र साधन होती है, लेकिन उन सीधे-साधे ग्रामीणों ने देश के विकास के लिए, इलाके की तरक्की के लिए अपनी वो जमीनें हंसते-हंसते सौंप दीं। क्यों सौंप दीं? क्योंकि उस समय कंपनी ने, प्रशासन ने और सरकार ने उनसे एक बहुत बड़ा वादा किया था। वादा यह था कि जिन परिवारों की जमीनें इस माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए ली जा रही हैं, उनके घर के युवाओं को, वहां के स्थानीय लोगों को इस माइंस में स्थायी रोजगार दिया जाएगा, उन्हें नौकरियां दी जाएंगी, ताकि उनका घर बार चल सके।
लेकिन वक्त बदला, साल बीते और धीरे-धीरे वो वादे सिर्फ कागजों पर सिमटकर रह गए। ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी अपने वादों से पूरी तरह मुकर गई। रोजगार देना तो दूर की बात, पिछले कुछ समय में कंपनी और ठेकेदारों ने एक बहुत बड़ा आत्मघाती कदम उठाया। उन्होंने वहां सालों से काम कर रहे 100 से अधिक स्थानीय ड्राइवरों और श्रमिकों को बिना किसी ठोस वजह के नौकरी से निकाल दिया, उन्हें सीधे तौर पर बेरोजगार कर दिया, और उनकी जगह पर बाहर के राज्यों और अन्य इलाकों से लोगों को लाकर काम पर रख लिया गया। अब आप खुद को उस जगह पर रखकर सोचिए, आपकी जमीन चली गई, आपके पास खेती का साधन नहीं बचा, और जिस नौकरी के भरोसे आप अपने बूढ़े माता-पिता का इलाज करा रहे थे, अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे थे, वो नौकरी भी आपसे छीन ली गई। स्थानीय मजदूरों का यह भी आरोप है कि माइंस के अंदर श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उनसे तय समय से ज्यादा काम लिया जाता है, लेकिन जब सैलरी या बोनस की बात आती है, तो 'बोनस एक्ट 1965' के तहत उन्हें उनका जायज हक नहीं मिलता। उन्हें सुरक्षा के बुनियादी उपकरण तक नहीं दिए जाते, जिससे आए दिन हादसों का डर बना रहता है।
इसी अन्याय के खिलाफ, अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए बाड़मेर के ये गरीब मजदूर और ग्रामीण पिछले करीब 40 दिनों से, यानी 9 अप्रैल से गिरल माइंस के बाहर धरने पर बैठ गए, लेकिन अफसोस की बात देखिए कि इतने दिनों तक कड़ाके की गर्मी में, खुले आसमान के नीचे ये लोग चिल्लाते रहे, लेकिन न तो कंपनी के कानों पर जूं रेंगी और न ही प्रशासन का कोई नुमाइंदा इनका दर्द सुनने आया। और इसी मोड़ पर एंट्री होती है वहां के युवा विधायक रविंद्र सिंह भाटी की। भाटी पहले दिन से इन मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। वे खुद इस भीषण गर्मी में, जहां तापमान 48 डिग्री को पार कर रहा था, मजदूरों के साथ धरने पर बैठे रहे। मामला तब और गंभीर हो गया, जब हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ठेकेदार कंपनी की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दे दिया कि गिरल माइंस से लिग्नाइट का परिवहन यानी ट्रांसपोर्टेशन तुरंत शुरू किया जाए और जो भी इसमें बाधा डाले, उस पर कानूनी कार्रवाई हो। इस आदेश के बाद प्रशासन एकदम एक्टिव हो गया और उसने माइंस के आसपास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया।
मजदूरों को लगा कि अब तो उनका हक हमेशा के लिए छीन लिया जाएगा। इसी गुस्से और हताशा में 19 मई को रविंद्र सिंह भाटी के नेतृत्व में सैकड़ों गाड़ियों का एक विशाल काफिला बाड़मेर जिला कलेक्ट्रेट की तरफ कूच करता है। मजदूर चाहते थे कि वे सीधे कलेक्टर से मिलें और अपनी बात रखें, लेकिन पुलिस ने शहर के बाहर ही, बीएसएफ गेट के पास बैरिकेड्स लगाकर इस पूरे काफिले को रोक दिया। माहौल गरमा चुका था। काफिला रोके जाने से नाराज भाटी और तमाम मजदूर गाड़ियां वहीं छोड़कर पैदल ही कलेक्ट्रेट की तरफ बढ़ गए। जब ये लोग कलेक्ट्रेट के मुख्य गेट पर पहुंचे, तो वहां पुलिस ने इन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इसके बाद जो हुआ, उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच भारी धक्का-मुक्की शुरू हो गई, तीखी बहस होने लगी। मजदूर चिल्ला रहे थे कि हमें कलेक्टर से मिलना है, लेकिन कलेक्ट्रेट के दरवाजे बंद थे।
जनता की इस बेबसी को देखकर, प्रशासन के इस अड़ियल और संवेदनहीन रवैये को देखकर रविंद्र सिंह भाटी का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने चिल्लाते हुए कहा कि अगर इस तंत्र में गरीब की आवाज सुनने वाला कोई नहीं है, तो ऐसे जनप्रतिनिधि होने का क्या फायदा? और देखते ही देखते, पलक झपकते ही भाटी ने अपने पास मौजूद एक बोतल से अपने सिर और पूरे शरीर पर पेट्रोल छिड़क लिया। वहां मौजूद पुलिसकर्मी और समर्थक सन्न रह गए। जैसे ही भाटी ने माचिस निकालकर आग लगाने की कोशिश की, वहां खड़े उनके एक सजग समर्थक ने अपनी जान पर खेलकर तुरंत उनके हाथ से माचिस झपट ली और पुलिसकर्मियों ने उन्हें अपने घेरे में ले लिया।
सोचिए, अगर वो माचिस जल जाती, तो आज बाड़मेर ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान का माहौल क्या होता? एक बार ऐसी ही एक घटना राजस्थान विवि के मैन गेट पर घटित हुई थी, जिसमें जलने से छात्र की जान चली गई थी। इस घटना के तुरंत बाद कलेक्ट्रेट परिसर को छावनी में बदल दिया गया, सारे दरवाजे बंद कर दिए गए। इस भारी हंगामे के बाद प्रशासन बैकफुट पर आया और अधिकारियों ने विधायक रविंद्र सिंह भाटी को जिला कलेक्टर के साथ वार्ता के लिए अंदर बुलाया।
आज यह वीडियो देखकर हमें और आपको बंद कमरों में बैठकर इस पर सिर्फ चर्चा नहीं करनी है, बल्कि एक बहुत बड़ा सवाल पूछना है। सवाल इस देश के सिस्टम से है, उन बड़ी-बड़ी कंपनियों से है जो विकास के नाम पर गरीबों की जमीनें तो ले लेती हैं, लेकिन जब उनके हक, उनकी रोटी और उनके रोजगार की बात आती है, तो उन्हें लाठियों और बैरिकेड्स के दम पर चुप कराने की कोशिश की जाती है। अपने अधिकार मांगने पर अंग्रेजी शासन की तरह आम नागरिकों को लठ मारे जाते हैं। क्या अपनी ही जमीन पर रोजगार मांगना कोई गुनाह है? क्या श्रम कानूनों के तहत 8 घंटे की ड्यूटी और सही वेतन मांगना अपराध है? अगर एक चुने हुए विधायक को जनता की बात सुनाने के लिए खुद पर पेट्रोल छिड़कना पड़ रहा है, तो सोचिए इस देश के आम नागरिक की औकात इस सिस्टम के सामने क्या रह गई है? इस वीडियो को सिर्फ एक खबर मत समझिए, यह उन सैकड़ों परिवारों की आजीविका का सवाल है जो आज दाने-दाने को मोहताज हो रहे हैं। इस वीडियो को इतना शेयर कीजिए, कि यह गूंज जयपुर से लेकर दिल्ली तक बैठे हुक्मरानों के कानों तक पहुंचे और इन गरीब मजदूरों को उनका हक, उनकी नौकरी और उनका सम्मान वापस मिले। आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? क्या रविंद्र सिंह भाटी का यह कदम सही था या प्रशासन की गलती थी? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए, वीडियो को लाइक और शेयर कीजिए, और ऐसे ही जमीनी सच को जानने के लिए हमें अभी फॉलो और सब्सक्राइब कीजिए।

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