कौन करवा रहा है रणथम्भौर में राजकुमारी की दूसरी होटल का निर्माण?



राजस्थान की राजनीति में आजकल एक डिजाइन वाले बॉक्स की बहुत चर्चा है। चर्चा कहती है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार की सभी घोषणाओं, योजनाओं, यात्राओं और दौरों की डिजाइन भी यही बॉक्स बना रहा है। इस बॉक्स को आपने देखा तो नहीं होगा, किंतु इसका नाम सुना जरूर होगा। ऐसे में इसके बार में विस्तार से बात करना लाजमी है, कि आखिर ये डिजाइन वाला बॉक्स ऐसा है? जिसकी आजकल पैंडोरा बॉक्स से भी अधिक चर्चा में है।

दरअसल, राजस्थान सरकार के फरवरी में पेश किये गये बजट से पहले प्रदेशभर में बड़े बैनर, पोस्टर टांगे गये थे, जिसकी डिजाइन और 'बचत, राहत, बढ़त' का स्लोगन काफी चर्चित रहा था। हालांकि, अशोक गहलोत की अफसरशाही पर जरूरत से अधिक निर्भरता ने बजट के सारे गुड का गोबर कर दिया था।

अपना आखिरी बजट भाषण शुरू करने के दौरान शुरुआती सात मिनट तक सीएम गहलोत ने पिछले साल का बजट भाषण पढ़ दिया। मजेदार बात यह है कि इसकी भनक सरकार के मंत्रियों, विधायकों और यहां तक कि विपक्ष को भी नहीं लगी। अंतत: सात मिनट बाद अचानक जागी ब्यूरोक्रेसी ने सीएम के पास संदेश भिजवाया कि बजट पिछले साल का पढ़ा जा रहा है। सीएम ने अपना बजट भाषण रोका और फिर उसके बाद जो हुआ, वह राजस्थान विधानसभा में एक काले अध्याय की तरह अंकित हो गया।

हालांकि, इससे भी डिजाइन वाले बॉक्स की सेहत पर फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि इसमें उसका कोई रोल नहीं था। उसका रोल था प्रदेशभर में पहली बार बजट से पहले किये गये प्रचार का। राजस्थान के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि बजट की थीम का प्रचार किया गया। विपक्ष ने इसको बजट लीक होना बताया तो सरकार ने कहा कि जनता को यह संदेश देना था कि सीएम बजट में लोगों को क्या क्या दे रहे हैं, इसका सबको पता होना चाहिये। एक ​इतिहास यह रहा है कि पहली बार राज्य के सभी स्कूलों—कॉलेजों के एलईडी लगाकर लाइव प्रसारित किया गया।

किंतु चर्चा यह नहीं है कि बजट कैसे हुआ और कौन—कौन उसको देख रहे थे, चर्चा और सियासी मंथन की बात यह है कि जिस थीम को डिजाइन वाले बॉक्स ने लीक कर प्रदेशभर में बैनर लगाए, उसी डिजाइन वाले बॉक्स के हाथ अब सरकार का प्रचार तंत्र है। अब सरकार जो कुछ भी प्रचारित कर रही है, सब कुछ उसी डिजाइन वाले बॉक्स से निकलकर सामने आता है। तीन—चार बार तो ऐसा हुआ कि सीएम का सार्वजनिक भाषण पहले ही मीडिया को बांट दिया गया।



बावजूद इसके सीएम गहलोत के आजकल जितने भी प्रचार की सामग्री तैयार हो रही है, वह उसी डिजाइन वाले बॉक्स से निकल रही है। अब सवाल यह उठता है​ कि इसमें क्या खास बात है, जो हम इसकी यहां पर चर्चा कर रहे हैं? दरअसल, सरकार के अंतिम महीने चल रहे हैं। आने वाले नवंबर के अंत में या दिसंबर के शुरुआत में चुनाव होने हैं। उसके लिए सरकार ने, यानी अशोक गहलोत ने सत्ता रिपीट कराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। अखबार, टीवी से लेकर प्रदेश के सभी प्रचार बोर्ड पर हंसते—मुस्कुराते, हाथ जोड़े सीएम अशोक गहलोत की फोटो के साथ बड़े—बड़े दावे किये स्लोगन लिखे हैं।

सरकार ने 'महंगाई राहत शिविर' के नाम से प्रदेशभर में अपनी 10 तरह की घोषणाओं का पिटारा खोल रखा है। हर प्रचार में गहलोत की हंसती, मुस्कुराती फोटो के साथ घोषणाओं का प्रचार किया जा रहा है। इसमें भी बड़ी बात यह है कि सभी तरह की प्रचार सामग्री एक ही रंग, डिजाइन, सीरत और सूरत की होती है। अब से पहले कभी भी राजस्थान सरकार का सूचना एवं जन संपर्क विभाग इस तरह से एकरूपता वाले विज्ञापन नहीं बना पाता था। नतीजा यह निकलता था कि विज्ञापन से जनता उतनी प्रभावित नहीं होती थी। अब सवाल यह उठता है कि जब सरकार के पास पूरा तंत्र है, आईएएस, आरएएस अधिकारियों से लेकर पीआरओ, एपीआरओ जैसे अधिकारी मौजूद हैं, फिर प्रचार का जिम्मा डिजाइन वाले बॉक्स को क्यों दिया हुआ है?

आपको पता होगा सरकार के अधिकारियों के वेतन की एक सीमा होती है। यह बात और है कि ऊपर कितना माल कूट सकते हैं, यह उनकी काबिलियत पर निर्भर करता है। किंतु जिस डिजाइन वाले बॉक्स के पास पूरा ठेका है, उसको जो माल दिया जा रहा है, उतनी सैलरी तो ये अधिकारी अपने जीवन में नहीं ले पाते होंगे। प्रश्न यह उठता है कि आखिर कितना मोटा माल डिजाइन वाले बॉक्स को दिया गया है, जो इतना जबरदस्त काम हो रहा है कि चुनावी मौसम होने के बाद भी पूरा सूचना एवं जन संपर्क विभाग बेरोजगार हो गया है?

कुछ समय पहले नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ ने एक बयान में कहा था कि सीएम के प्रचार का जिम्मा लेने वाले इस डिजाइन वाले बॉक्स को सरकार ने 370 करोड़ का ठेका दिया है। अब यदि नेता प्रतिपक्ष यह बात कहते हैं, तो यह पक्का है कि इतना पैसा तो सरकार से ही गया है। किंतु बाजार की रणनीति समझने वाले कहते हैं कि यह 370 एक नंबर में है, बाकी दो नंबर का खेल अलग है और उसके भुगतान के तरीके भी अदृश्यता लिए हुए हैं, जो खास लोगों को दिखाई देते हैं। उस रणनीतिक पेमेंट के तरीके रणथंभौर होटल निर्माण में भुगतान से लेकर, जयपुर की लग्जरी होटलों और हवाई यात्राओं के खर्चे के रूप में भी होने बताये जाते हैं।

नेता प्रतिपक्ष के दावे से इतर कुछ कांग्रेसी नेता इस ठेके की रकम 180 करोड़ से लेकर 520 करोड़ रुपये तक बताते हैं। अब यह बात कितनी सच है, इसको या तो खुद सीएम अशोक गहलोत सत्यापित कर सकते हैं, या फिर डिजाइन वाले बॉक्स के प्रत्यक्ष अरोड़ा और परोक्ष अरोड़ा बता सकते हैं। दरअसल, सियासी हलकों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि इस डिजाइन के पीछे कांग्रेस के हाल ही में जीते एक प्रदेश के प्रभारी से लेकर राष्ट्रीय राजकुमारी तक का हिस्सा है। कुछ लोग इसमें दो राष्ट्रीय महासचिव हिस्सेदार होने का भी दावा करते हैं।

इस डिजाइन वाले बॉक्स के पास राजस्थान ही नहीं, बल्कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ चुनाव का भी ठेका दिया है। एक ओर जहां कर्नाटक जीत का जश्न मनाया जा रहा है, तो दूसरी ओर राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता रिपीट कराने के साथ ही मध्य प्रदेश जीतने का भी दावा किया जा रहा है और उस दावे के पीछे इसी डिजाइन वाले बॉक्स की रणनीति बताई जाती है। सवाल यह उठता है कि यदि ये तमाम बातें सच हैं, तो फिर सचिन पायलट जैसे करिश्माई नेता को पीछे क्यों धकेला जा रहा है, जो अपने दम पर कांग्रेस को राज्य में फिर से चुनाव जिता सकते हैं।

कुछ समय पहले कांग्रेस का एक तबका यह दावा करता था कि पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने टॉप नेताओं की हकिकत जानने के लिए एक सर्वे करवाया था, जिसमें राहुल गांधी से उपर सचिन पायलट निकल गये थे। उस सर्वे को जब सोनिया गांधी से डिस्कर्स किया गया तो उन्होंने अपने बेटे—बेटी को साफ निर्देश दिये कि किसी भी सूरत में सचिन पायलट को सीएम या पार्टी में राष्ट्रीय स्तर का कोई पद नहीं दिया जाये।

माना जा रहा है कि उसके बाद से ही प्रियंका गांधी वाड्रा ने सचिन पायलट का पक्ष लेना छोड़ दिया। राहुल गांधी पहले ही खुद को अलग कर चुके थे। सोनिया गांधी तो 25 साल से गहलोत के पक्ष में बताई जाती हैं। यही वजह है कि तमाम तरह के आरोप प्रत्यारोप और बगावत के बाद भी गहलोत की जगह पायलट नहीं पहुंच पा रहे हैं और ना ही कांग्रेस की एसेट बताए जाने वाले सचिन पायलट को पार्टी से बाहर किया जा रहा है।

कांग्रेस के ही लोग यह भी चर्चा करते हैं कि यदि आज की तारीख में सचिन पायलट को मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह अध्यक्ष बना दिया जाये तो आने वाले कुछ ही बरसों में लोकप्रियता के मामले में राहुल गांधी को पीछे धकेलकर वह पीएम के दावेदार हो जायेंगे। अपनी विशेष शैली और काबिलियत के दम पर अशोक गहलोत का सियासी धैर्य तुड़वा चुके पायलट को युवाओं में लेकर क्रेज बढ़ता देख गांधी परिवार पीछे हट गया है। कहा जा रहा है कि पायलट की जिस तरह से देशभर में लोकप्रियता बढ़ रही है, उसके कारण गांधी परिवार काफी परेशान है। यही वजह है कि उनको कोई पद नहीं दिया जा रहा है।

इस सर्वे और कांग्रेसियों की चर्चा के पीछे जो भी हो, लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस की टॉप लीडरशिप की मंशा को ध्यान में रखते हुए ही जादूगर को डिजाइन वाले बॉक्स ने भी पायलट को सत्ता से दूर रखने की प्लानिंग दी है। डिजाइन वाले बॉक्स ने जिस तरह से सीएम अशोक गहलोत का पूरा कैंपेन डिजाइन किया है, वह काबिले तारीफ है, जिसको लेकर खुद भाजपा भी परेशान है। सरकारी पैसे से कोई भी सीएम इस तरह आजतक खुद की ब्रांडिंग नहीं करा पाया है, जैसा गहलोत करने में कामयाब हुए हैं।

जनता को पता नहीं कितने रुपयों की राहत मिलेगी, लेकिन अखबार और टीवी जगत को जो राहत गहलोत सरकार दे रही है, वह पूरा पांच साल की भरपाई करने वाला साबित हो गया है। दुर्भाग्य यह है कि बात यह है कि इसपर किसी तरह की नकेल कसने का सिस्टम नहीं है। इसको ना केंद्र सरकार रोक सकती है और ना ही कोई न्यायालय संज्ञान ले पा रहा है।

डिजाइन वाले बॉक्स को लेकर जो भुगतान की संख्या और तरीका है, उसकी चर्चा ने प्रदेश की सियासत में एक नया दौर शुरू कर दिया है। हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि यह तरीका भाजपा कई बरसों पहले ही आजमा चुकी है, इसलिये इस तरीके से भाजपा को हराना कठिन है, किंतु जिस तरह से सीएम अशोक गहलोत की टीम लगी हुई है, उससे एक बात साफ हो गई है कि या तो कांग्रेस ने पहली बार यह तरीका देखा है, या फिर ऊपर से आदेश है कि इसको आजमाना है।

दूसरी बात यह है कि आजकल कांग्रेस के प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा और प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के बीच पहले आप की जंग चल रही है। पिछले दिनों हुई मीटिंग के बाद रंधावा और डोटासरा ने सोशल मीडिया पर फोटो शेयर की, लेकिन दोनों ने ही आपस में एक दूजे की फोटो काटकर शेयर की। यानी दोनों एक दूसरे को पसंद नहीं करते हैं। चर्चा तो यह भी चल रही है कि कांग्रेस वाले केवल यही इंतजार कर रहे हैं कि पहले किसे अपने पद से हटाया जाता है, क्योंकि दोनों की खूब शिकायतें हो चुकी हैं, और इन दोनों का हटना तय है। 

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