ईरान पर Israel और United States के हमलों के बाद दुनिया भर की प्रतिक्रियाएँ सावधानी से संतुलित रेखा पर आईं, क्योंकि यह एक व्यापक और जटिल भू-राजनीतिक, आर्थिक तथा रणनीतिक समीकरण है। इस पूरे विषय को समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि संदेश केवल “हमलाओं” का नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य गठबंधन, आर्थिक प्रतिबंध और वैश्विक हितों का भी है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि 2025–2026 के मध्य पूर्व तनाव केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह एक जटिल क्षेत्रीय और वैश्विक प्रणाली में उभर रहा है, जिसमें अमेरिका, इज़राइल, खाड़ी राजतंत्र, रूस, चीन तथा यूरोप के अपने-अपने हित जुड़े हुए हैं। इस संदर्भ में भारत, चीन और अन्य देशों की प्रतिक्रिया केवल “रववैये” का नतीजा नहीं, बल्कि रणनीतिक हितों का संतुलन है।
भारत का रुख शांत, संयमित और सावधान इसलिए रहा क्योंकि वह किसी भी बड़े युद्ध में सीधे शामिल नहीं होना चाहता। भारत की विदेश नीति हमेशा से संतुलन और आत्मनिर्भरता (Strategic Autonomy) पर आधारित रही है; यह किसी भी सैन्य गठबंधन में शामिल होने या किसी भी देश को खुलकर समर्थन देने की बजाय अपने हितों की रक्षा करता है।
ईरान पर हमला होने के बाद भारत ने पहले यह सुनिश्चित किया कि उसके अपने ऊर्जा आपूर्ति स्रोत धुरूण रहें, क्योंकि भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का 60% से अधिक खाड़ी देशों से आयात करता है, जिनमें ईरान भी एक पुराना खिलाड़ी है। अगर भारत इज़राइल-अमेरिका के खुलकर समर्थन में खड़ा होता, तो उसे न केवल ईरान बल्कि खाड़ी देशों, जैसे सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने ऊर्जा और निवेश साझेदारी पर नकारात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ सकता था।
इसलिए भारत ने संतुलन बनाते हुए कहा कि हिंसा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए और कूटनीतिक समाधान की कोशिश करनी चाहिए। यह वही रुख है जो भारत पहले भी कई बार अपनाता रहा है:—विशेषकर जब उसके ऊर्जा, प्रवासी समुदाय और सुरक्षा हित सामने हों।
दूसरी ओर, China की औपचारिक बयानबाजी भी इसी संतुलन की रणनीति का हिस्सा है। चीन न तो सीधे किसी सैन्य गठबंधन में शामिल होता है और न ही किसी वैश्विक शक्ति संघर्ष के पक्ष में खुलकर बोलता है, क्योंकि उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता है। चीन खाड़ी देशों से ऊर्जा का बड़ा हिस्सा लेता है, विशेष रूप से ईरान और सऊदी अरब से, और वह चाहता है कि यह मार्ग सुरक्षित और खुला रहे। इसी लिए चीन ने हमला होने के बाद सीधा न तो अमेरिका और इज़राइल का समर्थन किया और न ही ईरान का खुलकर समर्थन किया, बल्कि उसने तटस्थ भाषा का उपयोग किया जिसमें संघर्ष को बढ़ाने के बजाय शांतिपूर्ण बातचीत और संघर्ष विराम की बात की गई। चीन को यह भी ध्यान है कि अगर वह किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनता है तो उसके लिए उसके कई ऊर्जा और व्यापार साझेदारों के साथ उसके रिश्तों में दरार आ सकती है।
तीसरी महत्वपूर्ण वजह यह है कि आज कोई भी प्रमुख देश, चाहे वह अमेरिका हो, यूरोपीय संघ के सदस्य हों, रूस हो या कोई अन्य, ईरान का खुलकर समर्थन नहीं कर रहा, क्योंकि विश्व राजनीति में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, हथियारों की खरीद-बिक्री, बैंकिंग सिस्टम और व्यापार नेटवर्कों की एक विस्तृत जाल है, जो अमेरिका के नेतृत्व में चलता है। अमेरिका के पास वैश्विक बैंकिंग सिस्टम में मजबूत प्रभाव है, जो डॉलर को बाकी दुनिया की प्रमुख मुद्रा बनाता है, और इसके खिलाफ जाने वाले देशों को आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों का जोखिम होता है। इसलिए कोई भी बड़ा देश ईरान को खुले समर्थन में नहीं खड़ा होता, क्योंकि इससे उसके अपने आर्थिक हितों और वैश्विक व्यापार नेटवर्क पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
एक और कारण यह है कि मध्य पूर्व में प्रचलित संघर्ष आज केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, परमाणु क्षमता, आतंकवाद-रोधी नीतियाँ और सुरक्षा गठबंधनों से जुड़ा हुआ है। अमेरिका और इज़राइल का कहना है कि उनका संघर्ष ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए है; वहीं ईरान इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न मानता है। ऐसे माहौल में कोई भी देश खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करना चाहता क्योंकि इससे वह सीधे दूसरे पक्ष के साथ टकराव में पड़ सकता है।
यह भी समझना आवश्यक है कि विश्व राजनीति में आज कोई भी देश अकेले ताकत नहीं है; हर देश के सामने आर्थिक, सुरक्षा और निवेश सम्बन्धी जटिल समीकरण होते हैं। अगर कोई देश ईरान का खुलकर समर्थन कर देता, तो वह अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों, व्यापार प्रतिबंधों और सैन्य दबावों का सामना कर सकता था। इसी वजह से अमेरिका और उसके साझेदार लगातार यह संदेश देते रहे हैं कि इस संघर्ष का समाधान कूटनीति और वार्ता से होना चाहिए, न कि सैन्य टकराव से।
दूसरी ओर ईरान के साथ गुप्त सहयोग या रणनीतिक समर्थन रखने वाले देश, जैसे कुछ शिया मिलिशिया समूह, कुछ अफ्रीकी और कुछ दक्षिण एशियाई देश सीधे राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें भी वैश्विक आर्थिक नेटवर्क और अमेरिका-पश्चिम के साथ तनाव का जोखिम है।
इसलिए भारत की सधी हुई प्रतिक्रिया, चीन की औपचारिक बयानबाजी और दुनिया के किसी देश द्वारा ईरान के खुले समर्थन या सहयोग में अनिच्छा, इन सबका मूल कारण है रणनीतिक हितों का संतुलन, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हित, वैश्विक बैंकिंग और व्यापार प्रणालियाँ, सैन्य गठबंधन और क्षेत्रीय शक्ति समीकरण शामिल हैं। दुनिया आज किसी भी बड़े युद्ध को बढ़ावा देने के पक्ष में नहीं है क्योंकि वैश्विक आर्थिक नेटवर्क और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों ही देशों की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इसी कारण वैश्विक प्रतिक्रियाएँ संयम, कूटनीति और संघर्ष विराम पर आधारित रही हैं, न कि किसी एक पक्ष का खुला समर्थन देने पर।

Post a Comment