28 फरवरी 2026 की सुबह जब अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत हमले शुरू किए, तो दुनिया की नज़रें सिर्फ तेहरान पर नहीं, बल्कि एक 21 नॉटिकल मील चौड़े समुद्री रास्ते पर भी टिक गईं, जिसका नाम है हॉर्मुज़ का दर्रा। यही वो संकरी समुद्री गली है, जिसे बंद करने से दुनिया का 5वाँ हिस्सा अँधेरे में डूब सकता है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि हॉर्मुज़ बंद होगा या नहीं, असली सवाल यह है कि अमेरिका वियतनाम से लेकर ईरान तक बार-बार युद्ध क्यों करता है? क्या वाकई में उसे परमाणु खतरा है अथवा तेल का खेल है कि इस्लामी सत्ता को दबाना है या डॉलर की एकाधिकारी व्यवस्था को बचाना है?
हॉर्मुज़ दर्रा ईरान और ओमान के बीच फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। इसके उत्तरी तट पर ईरान और दक्षिणी तट पर UAE व ओमान का मसंदम प्रायद्वीप है। हॉर्मुज़ द्वीप, केश्म और लारक जैसे रणनीतिक द्वीपों पर ईरान का कब्जा है, और ग्रेटर-लेसर टुम्ब तथा अबू मूसा जैसे विवादित द्वीप भी 1971 से ईरान के नियंत्रण में हैं। फारस की खाड़ी में नौसैनिक अभियानों की बागडोर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के हाथों में है। 2024 के आकड़ों के अनुसार हॉर्मुज़ से प्रतिदिन औसतन 2 करोड़ बैरल तेल गुज़रता था, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का एक चौथाई और दुनिया की कुल पेट्रोलियम खपत का लगभग 5वाँ हिस्सा है। इसके अलावा, दुनिया का लगभग 5वाँ LNG भी इसी मार्ग से जाता है। सऊदी अरब इस दर्रे से सबसे ज़्यादा कच्चा तेल भेजता है। 2024 में हॉर्मुज़ से गुज़रने वाले कुल कच्चे तेल का 38%, यानी 55 लाख बैरल प्रतिदिन यहीं से गुजरा है। इससे गुज़रने वाला 84% कच्चा तेल और 83% LNG एशियाई बाज़ारों को जाता है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया मिलकर इसके 69% हिस्से के खरीदार हैं।
अगर यह दर्रा कुछ दिन भी बंद रहा तो तबाही का नक्शा साफ है। भारत अपनी तेल ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से पूरा करता है। जापान और दक्षिण कोरिया के पास कोई वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग नहीं है। चीन 90% ईरानी तेल खरीद इसी रास्ते से करता है। यूरोप भी इसी रास्ते से एलएनजी खरीद करता है, उसको LNG संकट झेलना पड़ेगा। हॉर्मुज बंद होने पर वैश्विक गैस आपूर्ति में प्रतिदिन लगभग 29.5 करोड़ घन मीटर की कमी आ सकती है, जो 2021 में नॉर्ड स्ट्रीम से होने वाली औसत आपूर्ति से लगभग दोगुना है। वैकल्पिक बाईपास पाइपलाइनें मिलकर केवल 30 लाख बैरल प्रतिदिन संभाल सकती हैं, जो हॉर्मुज़ की क्षमता का महज़ एक छोटा अंश है।
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर 1200 घातक बमों से हमले किए। 1 मार्च की सुबह ईरानी राज्य मीडिया ने सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मृत्यु की पुष्टि की और 40 दिन के शोक की घोषणा की। इसके जवाब में ईरान ने इज़रायल, UAE, कतर, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन और सऊदी अरब पर मिसाइलें और ड्रोन दागे। IRGC ने मध्य-पूर्व में 6 चरणों में 27 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किये और आगे घातक परिणामों की चेतावनी दी है। इसके साथ ही ईरान ने हॉर्मुज़ दर्रे को बंद करने की कोशिश की और IRGC ने कच्चा तेल ले जाने वाले जहाज़ों को वहाँ से गुज़रने पर चेतावनी दी है। यानी हॉर्मुज दर्रा इस समय दुनिया की सैन्य शक्ति का केंद्र बन गया है।
आखिर अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर हमला क्यों किया? क्या वास्तव में ईरान परमाणु हथियार बन रहा है? इसके समझने के लिए 5 दशक पीछे जाना होगा। 1971 में अमेरिका ने गोल्ड स्टैंडर्ड छोड़ दिया, यानी डॉलर के पीछे सोने की गारंटी खत्म हो गई। इस फैसले से अमेरिका ने एक तरह से अपने डॉलर को ही दुनिया के लिए सोना बना दिया। फिर 1974 में राष्ट्रपति निक्सन ने सऊदी अरब से गुप्त समझौता किया, जिसके मुताबिक OPEC का तेल सिर्फ डॉलर में बिकेगा और बदले में अमेरिका ओपेक देशों को सैन्य सुरक्षा देगा। यह "पेट्रोडॉलर" व्यवस्था पाँच दशकों से अमेरिकी शक्ति की रीढ़ है। आज दुनिया के लगभग 80% तेल सौदे डॉलर में होते हैं। इस व्यवस्था का फायदा यह है कि दुनिया के हर देश को तेल खरीदने के लिए पहले डॉलर इकट्ठा करने पड़ते हैं, जिससे अमेरिका को अपनी मुद्रा बेलगाम छापने की आज़ादी मिलती है।
इतिहास में जिसने भी डॉलर से मुँह फेरा, वो मिटा दिया गया। ओपेक में 12 देशा शामिल हैं, जिनमें से इराक, ईरान, वेनेजुएला जैसे देशों ने बाहर निकलने की कोशिश की तो अमेरिका ने उनको बर्बाद कर दिया। ये देश तेल निर्यात के बड़े केंद्र हैं, लेकिन उसका असली खिलाड़ी अमेरिका ही है। आज से 26 साल पहले साल 2000 में सद्दाम हुसैन ने इराक का तेल डॉलर के बजाए यूरो में बेचना शुरू किया। अमेरिका ने तीन साल तक सद्दाम हुसैन को तानाशाह बताने का माहौल बनाया और इराक के लोगों को सद्दाम के खिलाफ बहकाया, और 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया। अमेरिकी सेना ने सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई, और उसके बाद इराकी तेल फिर डॉलर में बिकने लगा। तब केवल अकेला सद्दाम हुसैन नहीं मारा गया, बल्कि 2 लाख से अधिक इराकी नागरिक मारे गए।
लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी ने अफ्रीका के लिए सोने पर आधारित "दीनार" का प्रस्ताव रखा। गद्दाफी अमेरिका की आंख की किरकिरी हो गया, साल 2011 में NATO की लीडरशिप में लीबिया तबाह हुआ और गद्दाफी को मार दिया गया। अमेरिका की ओर से हिलेरी क्लिंटन कहा, "हम आए, हमने देखा, वो मर गया"... यही इस पूरे खेल की बेशर्म स्वीकारोक्ति थी। वेनेजुएला के निकोलस मादुरो ने डॉलर से बाहर तेल व्यापार को बढ़ावा दिया, तो अमेरिका ने वेनेजुएला पर कड़े प्रतिबंध लगाए और जनवरी 2026 में उन्हें उनके घर के अंदर घुसकर गिरफ्तार कर लिया गया, इस पर भी पूरी दुनिया खामोश रही। इसी तरह से ईरान ने 2000 के दशक से तेल यूरो और युआन में बेचने की कोशिश की, जिसके कारण बीते ढाई दशक में अमेरिकी तनाव लगातार बढ़ता रहा।
अमेरिका ने आरोप लगाया कि ईरान परमाणु बम बनाने का काम कर रहा है, जबकि पेट्रोडॉलर को चुनौती देने वाली ईरान की oil bourse योजना ही अमेरिका के लिए असली खतरा थी, परमाणु कार्यक्रम तो इस कहानी का एक आवरण था। रूस ने मजबूरी में युक्रेन पर हमला किया, अमेरिका समेत यूरोप ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। रूस ने भारत को रुपये में और चीन को यूआन में तेल बेचना जारी रखा। अमेरिका ने पहले चीन को टैरिफ के नाम पर डराने का प्रयास किया, लेकिन चीन नहीं माना और अंतत: अमेरिका चुप हो गया। इसके बाद भारत पर दबाव बनाने के लिए 25 फीसदी और फिर 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया। बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसे निलंबित कर दिया, लेकिन अमेरिका ने नये कानून का सहारा लेकर 18 फीसदी टैरिफ लगा दिया। अमेरिका लगातार भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने दा दबाव बना रहा है।
इस खेल में हथियार उद्योग भी बराबर का भागीदार है। सऊदी अरब डॉलर में तेल बेचता है, वही डॉलर अमेरिकी हथियार खरीदने में लगाता है, डॉलर वापस अमेरिका आता है, यह "weapon-dollar" का चक्र है। ट्रम्प ने मार्च 2025 में खुद कहा कि सऊदी अरब 4 साल में 1 ट्रिलियन डॉलर अमेरिकी कंपनियों पर खर्च करेगा। अमेरिका के लिए चिंता की बात यह है कि 2000 में दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 71% थी, आज घटकर लगभग 59% रह गई है। ईरान-रूस-चीन की साझेदारी और BRICS का उभार इसी डी-डॉलराइज़ेशन को गति दे रहे हैं, यही अमेरिका को सबसे ज़्यादा डराता है।
सऊदी अरब ने UAE, बहरीन, कतर, कुवैत और जॉर्डन पर ईरानी हमलों की कड़ी निंदा की, यानी खाड़ी के अरब देश ईरान के साथ नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध हैं। 1400 साल पुराना सुन्नी-शिया विभाजन, सऊदी-ईरान क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता, और ओपेक की अमेरिकी सुरक्षा छत्र पर निर्भरता इसके कारण हैं। तुर्की, मिस्र, पाकिस्तान जैसे देश ईरान के साथ खड़े होने की कीमत नहीं चुकाना चाहते। इसलिए ये सभी देश या तो चुप हैं, या अमेरिका के साथ खड़े हैं। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका का विरोध किया तो उसे हटाकर जेल में डाल दिया गया। आज इमरान खान अपने ही देश में जमानत नहीं ले पा रहे हैं, जबकि पाकिस्तान की जनता इमरान खान को बेहद चाहती है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने ईरान पर हमलों को "अनुचित" बताते हुए निंदा की, साथ ही ईरान के खाड़ी हमलों की भी आलोचना की। कराची में शिया प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर धावा बोला, जिसमें कम से कम एक दर्जन लोग मारे गए। यानी पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर न इधर का न उधर का, लेकिन जब तक अमेरिकी IMF कर्ज़ और सैन्य सहायता जारी है, सरकार वाशिंगटन को नाराज़ नहीं कर सकती। भारत की स्थिति अलग है। PM मोदी ने नेतन्याहू को फोन कर युद्धविराम की अपील की, UAE से ईरानी हमलों की निंदा की, लेकिन आधिकारिक रुख संयम तक सीमित रहा। भारत के लिए दाँव बड़े हैं, ईरान में चाबहार बंदरगाह, खाड़ी में 1 करोड़ भारतीय कामगार, और अधिकांश ऊर्जा आपूर्ति यहीं से होती है। भारत न अमेरिका-इज़रायल के खिलाफ जा सकता है, न ईरान को पूरी तरह छोड़ सकता है, और भारत की यही "रणनीतिक स्वायत्तता" की असली परीक्षा है।
अमेरिका का इस तरह से छोटे देशों को तबाह करके अपने अंतर्गत लेने का कोई एक कारण नहीं है। यह कई परतों वाला खेल है। उसे डॉलर को बचाना है। ओपेक के तेल पर नियंत्रण रखना है। चीन-रूस-ईरान की धुरी को तोड़ना है। अपने हथियार उद्योग को मुनाफा देना है और दुनिया के बाकी देशों को संदेश देना है। 2001 से अमेरिकी युद्धों में 9 लाख से अधिक लोग मारे गए, जिसमें 3 लाख 35 हज़ार से ज़्यादा आम नागरिक थे। अमेरिका के पास दुनिया में 800 से अधिक विदेशी सैन्य ठिकाने हैं, 159 देशों में 1 लाख 73 हज़ार सैनिक तैनात हैं, और सालाना 700 अरब डॉलर से ज़्यादा का सैन्य बजट है। ईरान पर परमाणु हथियार का डर सतह की कहानी है, असली मकसद पेट्रोडॉलर की रक्षा और डॉलर की वैश्विक आरक्षित मुद्रा की स्थिति बनाए रखना है। हॉर्मुज़ दर्रे पर छाया यह संकट महज़ एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं, बल्कि यह बहुध्रुवीय दुनिया की परीक्षा है। इतिहास यही कहता है कि महाशक्तियाँ तब तक युद्ध करती रहती हैं, जब तक उनकी व्यवस्था टिकी रहती है या जब तक वो खुद न टूट जाएँ। स्पेन और ब्रिटिश शासन इसके उदाहरण हैं और ईरान पर हमला उसी पुरानी कहानी का एक नया अध्याय है।

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