भाजपा की टॉप लीडरशिप के कहने पर वसुंधरा से मिले थे बेनीवाल!



राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे से मुलाकात की खबर ने प्रदेश में हलचल मचा रखी है। भाजपा से लेकर रालोपा और कांग्रेस के कई नेताओं की नींद हराम हो गई है। हमने वीडियो बनाया, खबर लिखी और उसको लेकर लोगों की प्रतिक्रिया भी आई। अधिकांश को इस बात पर भरोसा नहीं है कि हनुमान बेनीवाल और वसुंधरा राजे के बीच कोई मुलाकात हो भी सकती है। किंतु हमारे सूत्रों पर हमें उतना ही भरोसा है, जितना आप लोगों को हमारे उपर है। आप सोचते होंगे कि बड़े मीडिया समूह, टीवी, अखबार वालों ने यह खबर क्यों नहीं चलाई? असल बात यह है कि ये बड़े कहे जाने वाले मीडिया समूह सरकार के साथ विज्ञापन नीति से जुड़े हुए हैं। आज टीवी, अखबार की हालात आपको पता है क्या हो चुकी है? कोई भी सरकार को या सरकार में आने की संभावना वाले नेता को नाराज नहीं करना चाहता है। ये मीडिया समूह बॉल्ड और निष्पक्ष खबर दिखाने से इसलिए डर रहे हैं कि सत्ता बदलते ही कहीं वसुंधरा राजे फिर से सीएम बन गईं और उनसे नाराज हो गईं तो क्या होगा? 

वीडियो देखें: हनुमान बेनीवाल वसुंधरा राजे की मुलाकात का सूत्रधार कौन?

एक नेशनल टीवी चैनल ने खबर चलाई, लेकिन जब उपर से प्रेशर आया तो खबर रोक दी गई। हमारे उपर इस तरह का कोई दबाव नहीं है। हम वो ही खबर दिखाते हैं, जो सच होती है, जो जनता जानना चाहती है। हनुमान बेनीवाल और वसुंधरा राजे की मुलाकात के बाद सवाल यह है कि आखिर किस वजह से वसुंधरा राजे ने हनुमान बेनीवाल से मुलाकात की है? वो कौनसा कारण रहा है, जो अपने धुर विरोधी बेनीवाल ने वसुंधरा राजे ने आगे बढ़कर मुलाकात करने को मजबूर होना पड़ा है?


राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि वसुंधरा राजे ने खुद आगे बढ़कर हनुमान बेनीवाल से मुलाकात की है, तो इसका मतलब यह है कि भाजपा के ​बड़े नेताओं ने इसके दिशा निर्देश दिए होंगे। काफी समय से यह माना जा रहा था कि यदि वसुंधरा को भाजपा सीएम के लिए आगे नहीं करती है तो फिर वह अपनी पार्टी बना सकती हैं, लेकिन वसुंधरा राजे इस बात को अच्छे से जानती हैं कि अलग पार्टी बनाकर इस उम्र में सक्सेज होना नामुमकिन है। उनके सामने कल्याण सिंह से लेकर उमा भारती और राजस्थान में किरोड़ीलाल मीणा से लेकर घनश्याम तिवाड़ी के बड़े उदाहरण हैं, जो ऐसा करके वापस भाजपा में लौटने को मजबूर हो चुके हैं। इतिहास गवाह है, भाजपा से अलग होकर केवल हनुमान बेनीवाल ही सफल हो पाए हैं, बेनीवाल के अलावा कोई नेता भाजपा में जन्मा हो और सक्सेज हो गया हो, ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है।


इसलिए इस बात की संभावना नहीं के बराबर है कि वसुंधरा जैसी कद्दावर और अनुभवी नेता अलग पार्टी बनाने जैसा जोखिम उठाने को तैयार हो पाएंगी। उनको इस बात का पक्का पता है कि अलग होकर वह भाजपा के कार्यकर्ताओं से भी हाथ धो बैठेंगी, जो आज विपरीत परिस्थिति में भी उनके साथ खड़े हैं। यही वजह है कि 100 में से 100 राजनीतिक विचारक वसुंधरा राजे की नई पार्टी बनाने की धारणा का सीधा खंडन करते हैं। फिर सवाल यह है कि क्यों वसुंधरा राज ने हनुमान बेनीवाल ने मुलाकात की?


दरअसल, वसुधंरा राजे इन दिनों राजस्थान में सीएम फेस बनने का पूरा प्रयास कर रही हैं। इसको लेकर वह जयपुर से दिल्ली तक भागदौड़ कर रही हैं। हालांकि, अभी तक भाजपा आलाकमान ने उनको किसी तरह का आश्चासन नहीं दिया है, लेकिन पिछने दिनों जिस तरह से एक दिन अचानक दिल्ली से जयपुर आईं और वहां पर भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री प्रकाश चंद्र से मुलाकात कर वापस दिल्ली लौट गईं, उसके बाद कयास लगाए गये कि जो बड़े नेता वसुंधरा राजे से नाराज हैं, उनको राजी करने का प्रयास चल रहा है। असल में प्रकाश चंद्र और वसुंधरा के रिश्ते काफी पहले खराब हो गये थे, जिसको लेकर यह भी कहा जाता है कि इस साढ़े चार में साल संघ ने वसुंधरा को कोई तवज्जो नहीं दी। उससे पहले के पांच साल शासन के दौरान वसुंधरा राजे ने संघ के लोगों का कोई काम नहीं किया था।


वसुंधरा राजे को किसी बड़े भाजपा ने नेता संघ के नाराज नेताओं से मिलने की सलाह दी थी, जिसके कारण ही वह प्रकाश चंद्र से मिलने जयपुर पहुंची थीं। इसके साथ ही इन दिनों भाजपा और रालोपा के बीच गठबंधन की चर्चा तेजी से चल रही है। कहा जा रहा है कि हनुमान बेनीवाल ने 35 सीटों की मांग की है, जबकि भाजपा 18 सीट देने को तैयार है। ऐसे में 25 सीटों पर सहमति बन सकती है। इससे बेनीवाल को ही नहीं, बल्कि भाजपा को भी फायदा होगा। असल में 2019 के लोकसभा चुनाव में रालोपा ने भाजपा से गठबंधन किया था, जिसके कारण एक सीट बेनीवाल जीते, जबकि जोधपुर, बाड़मेर, चूरू, सीकर, जयपुर ग्रामीण, पाली, राजसमंद, अजमेर जैसी 10 सीटों पर भाजपा को बड़ा फायदा मिला। भाजपा जानती है कि बेनीवाल का इन सीटों पर गहरा प्रभाव है। 


यही वजह है कि भाजपा विधानसभा चुनाव में रालोपा से गठबंधन कर सकती है। जब भाजपा ने बेनीवाल को गठबंधन के लिए कहा तो उनकी पहली शर्त यही थी कि वसुंधरा राजे को आगे किया जाएगा तो गठबंधन नहीं होगा। इस बात से वसुंधरा राजे को अवगत करवाया गया। वसुंधरा सीएम फेस बनना चाहती हैं, और भाजपा रालोपा के साथ गठबंधन करना चाहती है। वर्तमान समीकरण के हिसाब से दोनों चीजें संभव नहीं। इसलिए भाजपा के बड़े नेताओं ने वसुंधरा को कहा कि आप हनुमान बेनीवाल के साथ समझौता कीजिए। उसके बाद जब बेनीवाल इस बात के लिए तैयार हो जाएंगे कि वसुंधरा राजे चुनाव प्रचार करेंगी तो भी उनको दिक्कत नहीं है। वसुंधरा को पता है कि यदि सीएम बनने का रास्ता साफ करना है, तो उसके लिए चुनाव कैंपेन कमेटी को अपने हाथ में लेना होगा। और वसुंधरा को चुनाव कैंपेन कमेटी की जिम्मेदारी तभी दी जाएगी, जब हनुमान बेनीवाल गठबंधन के लिए वसुंधरा राजे के होते हुए हरी झंडी दे देंगे। यही वजह है कि वसुंधरा राजे ने सभी पुरानी कड़वी बातें भूलकर हनुमान बेनीवाल से मुलाकात कर उनकी नाराजगी दूर करने और रिश्तों को नये आयाम देने का प्रयास किया है। 


आपको याद होगा, जब आम चुनाव में भाजपा—रालोपा को अलाइंस हुआ था, तब वसुंधरा राजे सीन में नहीं थीं। तब भी बेनीवाल ने यही कहा था कि यदि वसुंधरा इस समझौतें में शामिल होंगी तो वह भाजपा से अलाइंस नहीं करेंगे। तब पूरा चुनाव मोदी के कंधों पर था, लेकिन अब विधानसभा चुनाव है और इसमें वसुंधरा राजे के बिना चुनाव लड़ना भाजपा के लिए आसान नहीं है। आज के समीकरण बताते हैं कि यह भी संकेत दे रहे हैं कि रालोपा के बिना भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाएगी। किंतु ये दोनों दल अलाइंस करते हैं तो यह गठबंधन 150 से ज्यादा सीटें जीत सकता है। य​ही वजह है कि भाजपा ने खुद आगे बढ़कर वसुंधरा को बेनीवाल के साथ रिश्ते मधुर करने की सलाह दी है।

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