राजस्थान की ये 5 सीटें हार रही है भाजपा



Ram Gopal Jat

राजस्थान में लोकसभा के लिए मतदान हुए एक पखवाड़े से अधिक बीत गया है, लेकिन इसके बावजूद सियासी दलों द्वारा अपनी-अपनी जीत-हार के लिए विश्लेषण करने का दौर थम नहीं रहा है। एक तरफ कांग्रेस दावा रही है कि इस बार चौंकाने वाले परिणाम आएंगे, तो सत्ताधारी भाजपा ने मान लिया है कि इस बार हैट्रिक नहीं बन रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने भी कहा है कि एक दो सीटें हार सकते हैं, यानी लगातार तीसरी बार भाजपा सभी 25 सीटें नहीं जीत रही है। दूसरी तरफ प्रदेश भाजपा ने केंद्रीय लीडरशिप को जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें भी 3 से 5 सीटों पर कड़ा मुकाबला बताया गया है। भाजपा सार्वजनिक रूप से भले ही इसे स्वीकार नहीं करती हो, लेकिन पार्टी में तमाम नेता अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार करते हैं कि उनकी पार्टी 25 सीटों पर जीत की हैट्रिक नहीं बना रही है। 

आज इस वीडियो में उन पांच सीटों का विस्तार से विश्लेषण करके बताऊंगा कि वो कौन सी पांच सीटें हैं, जहां पर भाजपा हार रही है। साथ ही यह भी बताऊंगा कि भाजपा प्रत्याशियों के हारने का कारण क्या रहेगा। क्रमवार बताऊंगा कि किस सीट पर सबसे बड़ी हार होने वाली है, उसके बाद कम हार वाली सीट के बारे में बात करुंगा। राज्य की 25 में से सबसे बड़ी हार पार्टी की दौसा सीट पर होने जा रही है। यहां पर भाजपा के कन्हैयालाल मीणा का कांग्रेस के विधायक मुरारी लाल मीणा से हुआ है। 

मुरारीलाल और कन्हैयालाल वैसे तो 4-4 बार विधायक रहे हैं, लेकिन मोटा अंतर इस बार यह है कि भाजपा के पास मोदी लहर के कमजोर होने के कारण चीजें खिलाफ जा रही हैं। इस सीट पर पिछले चुनाव में भी भाजपा को सबसे छोटी जीत मिली थी। इस बार पार्टी ने टिकट बदला, लेकिन यहीं पर पार्टी के दो बडे नेता डॉ. किरोडीलाल मीणा और सांसद जसकौर मीणा के बीच खींचतान चलती रही है। 

चुनाव प्रचार के दौरान और उसके बाद भी किरोडीलाल मीणा ने कहा है कि यदि कन्हैयालाल हारेंगे तो वो मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। किरोड़ी ने जोर देकर कहा है कि चाहे उनको रोड पर आना पड़े, लेकिन मोदी से वादा किया है कि कभी भाजपा से गद्दारी नहीं करेंगे। यह बात सही है कि किरोडीलाल अपने वादे के पक्के हैं, इसलिए उनके समर्थकों और विरोधियों को भी पूरा विश्वास है कि दौसा सीट यदि भाजपा हारी तो किरोड़ी अपने वादे के मुताबिक इस्तीफा दे देंगे। दरअसल, बात यह है कि जब से किरोड़ी को मंत्री बनाया है और वो भी खंडित विभाग देकर बिठाया है, तब से किरोड़ी और उनके समर्थक सरकार से नाखुश दिखाई दे रहे हैं। 

यही कारण है कि दौसा में किरोड़ी द्वारा बार-बार अपील करने के बाद भी मीणा समाज ने कन्हैयालाल को वोट देने से साफ मना कर दिया, तब आखिर में किरोड़ी लाल मीणा ने अपने समाज और अपने क्षेत्र के मतदाताओं से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि यदि कन्हैयालाल हारे तो वो मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे। अब यह बात तो सभी जानते हैं कि किरोड़ी लाल अपने वादे के पक्के हैं, और कन्हैयालाल के हारने पर इस्तीफा भी दे देंगे। किंतु सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में किरोड़ीलाल केवल इसलिए इस्तीफा देने को तैयार हैं कि कन्हैयालाल को जिताना है?

असल बात यह है कि इसके पीछे किरोड़ीलाल की बड़ी रणनीति है। जिसके तहत जनता और अपनी पार्टी, दोनों के साथ भावनात्मक दबाव की राजनीति खेल रहे हैं। एक तरफ किरोड़ी को इस बात का भरोसा हो गया है कि कन्हैयालाल जीत नहीं रहे हैं, तो दूसरी तरफ किरोड़ी अपनी विभागीय जिम्मेदारियों से खुश नहीं हैं। जिस तरह से उनको पंचायती राज विभाग दिया गया, लेकिन उसके सभी पॉवर मदन दिलावर के हाथ में सौंप दिए। इसकी वजह से अंदरखाने किरोड़ी अपनी ही पार्टी से नाराज भी हैं, लेकिन वो इस उम्र में पार्टी को छोड़ भी नहीं सकते हैं। इसलिए किरोड़ी ने एक तीर से तीन शिकार करने का खेल खेला है। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर कन्हैयालाल हार क्यों रहे हैं? वास्तव में देखा जाए तो पूर्वी राजस्थान में मीणा और गुर्जर समाज का दबदबा रहा है। इस क्षेत्र में कभी किरोड़ीलाल दोनों ही समाजों के बड़े नेता हुआ करते थे, लेकिन पहले गुर्जर आरक्षण आंदोलन के समय 2005 में गुर्जर समाज उनसे छिटक गया। इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी से चुनाव लड़ा, तब मीणा समाज पूरी तरह से उनके साथ था, लेकिन जब 2018 में किरोडीलाल ने फिर से भाजपा ज्वाइन की तो मीणा समाज भी उनसे पहले के मुकाबले दूर हो गया। 

बीते पांच साल में सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार से संघर्ष किया तो पूर्वी राजस्थान के गुर्जर समाज के साथ ही मीणा समाज भी उनके साथ जुड़ता चला गया। खासकर मुरारीलाल मीणा, रमेश मीणा और हरीश मीणा के कारण किरोड़ी लाल के बजाए सचिन पायलट के अधिक करीब आ गया। इन्हीं पांच सालों में जब किरोड़ी लाल ने जमकर धरने प्रदर्शन किए तो मीणा समाज ने साथ दिया। मीणा समाज को लगता था कि किरोड़ी के संघर्षों और मोदी से नजदीकी के कारण उनको सीएम बनाया जाएगा, लेकिन सीएम पद उनको नहीं मिला, बल्कि जो विभाग दिए गए, उनको भी खंडित कर दिया गया। तभी से मीणा समाज भाजपा से खासा नाराज है। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मीणा समाज ने इसलिए किरोड़ीलाल को साफ कर दिया कि इस बार आपके कहने पर भाजपा को वोट नहीं देंगे। 

अब मीणा समाज के पास मुरारी लाल मीणा और हरीश मीणा जैसे नए नेता हैं। ये दोनों ही सचिन पायलट के खास हैं। इसलिए गुर्जर और मीणा समाज ने इस बार दौसा में मुरारीलाल मीणा को वोट दिया है। किरोड़ीलाल को आभास है कि कन्हैयालाल हार रहे हैं और इस वजह से अपने वादे के मुताबिक इस्तीफा देने का बहाना मिल जाएगा। उसके बाद पूरा दबाव पार्टी के ऊपर होगा। सरकार में या तो उनको पूरा विभाग मिलेगा या फिर विभाग बदलकर पॉवरफुल विभाग दिया जाएगा। दौसा में गुर्जर मीणा सबसे बड़ा वोट बनता है। 2004 में सचिन पायलट को वोट देने के बाद दोनों समाज इस बार एक हुए हैं, तो भाजपा को यहां पर सबसे बड़ी हार मिलने जा रही है। 

दूसरी सीट झुंझुनूं है, जहां पर भाजपा ने हार हुए विधायक प्रत्याशी शुभकरण चौधरी को टिकट देकर जुआ खेला है। झुंझुनूं में भाजपा 2014 और 2019 की मोदी लहर में जीती थी, उसके बाद यहां स्थितियों में लगातार परिवर्तन होता जा रहा है। पहले किसान आंदोलन, उसके बाद अग्निवीर योजना और आखिर में महिला पहलवानों के कारण क्षेत्र में भाजपा के खिलाफ बहुत नाराजगी है। यह निर्वाचन क्षेत्र जाट बहुल है और तीनों ही मुद्दे जाट समाज से जुड़े हुए हैं। अग्निवीर योजना से नाराजगी का बड़ा कारण यह है कि झुंझुनूं जिला देश को सर्वाधिक सैनिक देने वाला है। यहां के लोगों का मानना है कि भाजपा की मोदी सरकार ने उनके बच्चों का भविष्य खराब करने का काम किया है। 

इस योजना से नाराजगी जाहिर करने वाले क्षेत्रों में झुंझुनूं राजस्थान में टॉप रहा है। इसके साथ ही कांग्रेस उम्मीदवार बृजेंद्र ओला के पास शीशराम ओला की राजनीतिक विरासत है, जो यहां से लगातार 6 बार सांसद रहे थे। बृजेंद्र ओला को यहां पर उनकी सरल छवि के कारण बहुत पसंद किया जाता है, जबकि शुभकरण की छवि दबंग की होने के कारण लोगों में स्वीकार्यता नहीं है। इसके अलावा झुंझुनूं के लोकसभा चुनाव में भाजपा का मतदाता वोट देने कम गया है। ये तीन कारण ऐसे हैं जो भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। माना जा रहा है कि झुंझुनूं सीट भाजपा दूसरी बड़ी हार झेलने वाली है। 

तीसरी सीट बाड़मेर है, जहां पर त्रिकोणीय मुकाबला है। निर्दलीय विधायक रविंद्र भाटी को भाजपा का प्रदेश संगठन मैनेज नहीं कर पाया, जिसके कारण शीर्ष नेतृत्व नाराज भी है और इस क्षेत्र का पूरा राजपूत समाज भाजपा के खिलाफ वोट करके आया है। रविंद्र भाटी ने राजपूतों के अलावा, बिश्नोई और मुसलमानों के भी बहुत बड़ी संख्या में वोट लिए हैं। भाजपा की सबसे बड़ी विफलता यही है कि सरकार होने के बावजूद एक निर्दलीय को मैनेज करके अपने पक्ष में नहीं कर पाई। 

दशकों से राजपूत भाजपा का परंपरागत वोट रहा है, लेकिन रविंद्र भाटी के चुनाव लड़ने और बाड़मेर में जाट-राजपूत सियासी संघर्ष के कारण राजपूतों ने भाजपा के कैलाश चौधरी को वोट ही नहीं दिया। इसके कारण कांग्रेस के उम्मेदाराम बेनीवाल जीत की तरफ बढ़ गए हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि भाजपा के कैलाश चौधरी और रविंद्र भाटी के बीच दूसरे नंबर की लड़ाई रह गई है। यहां भाजपा दूसरी या तीसरी बड़ी हार की तरफ बढ़ रही है।

इन तीनों के अलावा टोंक सवाई माधोपुर सीट पर भी कांग्रेस भारी पड़ती दिखाई दे रही है, जिसका सबसे बड़ा कारण सचिन पायलट के कारण गुर्जर मीणा कॉम्बिनेशन है। इसके अलावा भाजपा के अंदर भी सुखबीर जौनपुरिया को लेकर खींचतान रही है। यहां पर भाजपा के कुछ नेता भी नहीं चाहते हैं कि सुखबीर जीते। इसका दूसरा पहलू यह है कि यदि हरीश मीणा जीत जाएंगे तो देवली उनियारा विधानसभा सीट खाली हो जाएगी। उपचुनाव होगा तो भाजपा के भी एक नेता को चुनाव लड़ने का अवसर मिलेगा। चर्चा चल रही है कि भाजपा के देवली उनियारा प्रत्याशी रहे विजय बैंसला ने भी अंदरखाने भाजपा को बहुत नुकसान पहुंचाया है। 

उनका पूरा ध्यान कांग्रेस प्रत्याशी को जिताकर देवली में उपचुनाव पर रहा है। इसलिए यह सीट भाजपा के लिए चौथी सबसे कमजोर सीट है। पांचवी सीट भरतपुर है, जो न केवल सीएम भजनलाल शर्मा को गृह नगर है, बल्कि जाट आरक्षण की मांग के कारण खासी नाराजगी रही है। उपर से कांग्रेस संजना जाटव विधानसभा चुनाव भी बड़ी मुश्किल से हारी थीं। भरतपुर में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती जाट आरक्षण आंदोलन ही रहा है। हालांकि, जब सीट बुरी तरह से हारती दिखाई दे रही थी, तब भजनलाल ने वादा किया था कि जाट आरक्षण के लिए वो जान लगा देंगे, केंद्र से आरक्षण दिलाकर रहेंगे, लेकिन इसके बाद भी भरतपुर में भाजपा के हालात खास नहीं सुधरे हैं। भाजपा के लिए भरतपुर पांचवी सबसे मुश्किल सीट साबित होने वाली है। 

इन पांच सीटों के अलावा जयपुर ग्रामीण, चूरू और नागौर सीट पर भी कड़ा मुकाबला रहने वाला है। भाजपा के नेता मानते हैं कि तीन से चार सीट हार सकते हैं तो कांग्रेस नेताओं का दावा कि कम से कम 8 सीटों पर कांग्रेस जीत रही है, जबकि ईमानदारी से दोनों दलों की स्थिति पर गौर किया जाए तो भाजपा पांच सीटों पर हार रही है और तीन सीटों पर दोनों के बीच बराबर का मुकाबला रहने वाला है। 

Post a Comment

Previous Post Next Post