राजस्थान की सियासत एक सप्ताह में दो बड़े आयोजन हुए। निकाय चुनाव की आहट के बीच हनुमान बेनीवाल की रैलियों और कांग्रेस की रैली ने सरकार की नाक में दम कर दिया। नागौर से जयपुर तक लगातार तीन दिन तक आक्रामक रहे हनुमान बेनीवाल ने प्रशासन को झुकाया तो कांग्रेस ने बाड़मेर में भीड़ जुटाकर सरकार की नींद उड़ा दी। जन हितैषी मांगों को लेकर हमेशा की तरह हनुमान बेनीवाल ने एक बार फिर सत्ता और प्रशासन को चुनौती दी है। नागौर में एक महिला एसडीएम पूनम चायल द्वारा जेके लक्ष्मी सीमेंट फैक्ट्री को अवैध रूप से 14 हजार बीघा सरकारी जमीन आवंटित किए जाने के मामले बेनीवाल ने न केवल धरना दिया, बल्कि लगातार तीन दिन तक आंदोलन किया और जब प्रशासन ने उनको किये वादे पूरे नहीं किये तो तीसरे दिन सीधे जयपुर कूच कर दिया। यह कोई मामूली प्रदर्शन नहीं था, बल्कि सीधे तौर पर सत्ता में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों के गालों पर जोरदार तमाचा था। उंची शह पर सीमेंट फैक्ट्री को हजारों बीघा जमीन देने और बजरी माफिया के खिलाफ उनका आंदोलन साबित करता है कि बेनीवाल केवल नागौर के सांसद नहीं, बल्कि ईमानदारी से देखा जाए तो आज की तारीख में जनता के लिए लड़ने वाले राजस्थान के एक एकमात्र नेता हैं, जो सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए दिनरात एक कर देते हैं।
उनकी यह राजनीतिक रणनीति और सक्रियता पंचायती राज और निकाय चुनावों की आहट में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। तीन दिनों में दो बड़ी रैलियों का आयोजन यह साफ संदेश देता है कि हनुमान बेनीवाल सिर्फ एक क्षेत्रीय नेता नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में निर्णायक शक्ति बन चुके हैं, जो इस स्थानीय चुनाव ही नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं। अजमेर—जयपुर की सीमा पर कलेक्टर और एसपी से मुलाकात के दौरान हमेशा की तरह बिना किसी हिचकिचाहट के प्रशासन द्वारा हनुमान बेनीवाल की सभी मांगों को मान लेना यह दिखाता है कि प्रशासन भी अब उनकी राजनीतिक पकड़ को अच्छे से समझ चुका है। दूसरी तरहफ कांग्रेस की सियासत में उथल-पुथल साफ नजर आ रही है। बाड़मेर में भौगोलिक सीमाओं से एक मंत्री के इशारे पर प्रशासनिक छेड़खानी के खिलाफ कांग्रेस की जन आक्रोश रैली की, जिसमें पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी, कांग्रेस महासचिव सचिन पायलट, पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली मौजूद रहे, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का न होना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कांग्रेस अब गहलोत के बिना चलने की ठान चुकी है? अरावली मामले में भी कांग्रेस के बाकी नेता साथ रहे, लेकिन गहलोत ने अलग रास्ता अपनाया था, जिससे यह साफ हो गया कि गांधी परिवार के इशारे पर राजस्थान कांग्रेस ने धीरे—धीरे गहलोत से दूरी बना ली है।
तीन बार सीएम रहने के बावजूद राजस्थान की सत्ता संरचना अब अशोक गहलोत के लिए चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। सचिन पायलट और गोविंद डोटासरा का धीरे—धीरे सही दिशा में बनता गठजोड़ और टीकाराम जूली का समर्थन अशोक गहलोत की स्थिति को कमजोर कर रहा है। कांग्रेस आलाकमान के अलावा राज्य स्तर पर युवा और महत्वाकांक्षी नेताओं का बढ़ता प्रभाव यह दिखा रहा है कि कांग्रेस के अंदर नए समीकरण गहलोत को पीछे छोड़ चुके हैं। अरावली बचाओ मामले में कांग्रेस के तमाम नेता एक साथ थे, जबकि गहलोत सोशल मीडिया पर अकेले ही सरकार पर निशाना लगा रहे थे। मजेदार बात यह है कि इन दिनों अशोक गहलोत की टीम सोशल मीडिया पर सचिन पायलट की टीम पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। पिछले दिनों जानकारी में आया था कि अशोक गहलोत मुंबई में किसी के साथ सोशल मीडिया मजबूत करने के लिए बड़ी डील करके आये हैं। मुंबई में अशोक गहलोत की बेटी रहती हैं, जबकि उनका बड़ा बिजनेश बताया जाता है, जहां वो अक्सर जाते रहते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने रणनीति में बदलाव किया है। माना जा रहा है कि अशोक गहलोत को अब गांधी परिवार बिलकुल भी लिफ्ट नहीं दे रहा है, जिसके कारण उन्होंने सोशल मीडिया को मजबूत कर कांग्रेस में अपनी पकड़ बनाने पर फोकस किया है। दरअसल, सत्ता से बाहर होने के बाद अशोक गहलोत कभी सोनिया गांधी से मिलते नहीं दिखे, तो प्रियंका गांधी भी भाव नहीं दे रही हैं। इन दो सालों में राहुल गांधी के साथ भी गहलोत की केवल एक बार फोटो सामने आई है, जिसके कारण उनको अहसास हो चुका है कि अब गांधी परिवार उनकी जादूगरी से उकता चुका है।
इधर, सत्ता में बैठै अधिकांश मंत्री काफी कमजोर साबित हो रहे हैं, जिससे भाजपा आलाकमान काफी परेशान है। पिछले दिनों गृहमंत्री अमित शाह जयपुर में मंत्रियों से मिलकर अपना काम जनता के समक्ष मजबूती से उठाने के निर्देश दे चुके हैं। सत्ता की कमजोरी और कांग्रेस की गुटबाजी का हनुमान बेनीवाल ने पूरा लाभ उठाया है। उनके आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनता अब केवल घोषणा या भाषणों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहती है। बजरी माफिया और अवैध भूमि आवंटन के खिलाफ उनका कड़ा रुख यह दिखाता है कि अब जनता के मुद्दे केवल राजनीतिक बयानबाजी का विषय नहीं रह सकते। जयपुर कूच और नागौर रैली ने यह संदेश साफ कर दिया कि हनुमान बेनीवाल पश्चिमी राजस्थान से अपनी सियासी धमक दिखा रहे हैं। कांग्रेस के भीतर गहलोत की कमजोर स्थिति और पायलट—डोटासरा के सक्रिय हस्तक्षेप से यह साफ हो गया है कि पार्टी का नया शक्ति केंद्र अब पुराने नेताओं से हटकर युवा और महत्वाकांक्षी नेताओं की ओर बढ़ रहा है। यह केवल रणनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि गहलोत की सियासी छवि पर सीधी चोट है। हनुमान बेनीवाल का बढ़ता प्रभाव इस अंतर को और स्पष्ट करता है। प्रदेश की राजनीति अब स्पष्ट तौर पर दो धड़ों में बंट चुकी है। एक ओर हनुमान बेनीवाल की सशक्त उपस्थिति और उनकी रैलियों ने नया राजनीतिक परिदृश्य बना दिया है, जबकि दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर गहलोत—पायलट—डोटासरा का असंतुलन और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति गहलोत की पकड़ को कमजोर करती दिख रही है। लगातार एक सवा साल तक अपनी ही सरकार के खिलाफ मुखर रहने वाले कृषि मंत्री किरोड़ीलाल मीणा की अचानक और रहश्यमयी चुप्पी ने साबित कर दिया है कि किरोड़ी जनित विवाद के समय हनुमान बेनीवाल ने पैसे लेने के जो आरोप लगाए थे, वो काफी गहरा असर कर गये। उस विवाद के बाद किरोड़ी ने तुरंत माफी मांग ली थी, लेकिन जो वीडियो आरोप हनुमान बेनीवाल ने किरोड़ी पर लगाए, वो आज भी सोशल मीडिया पर रह रहकर वायरल होते रहते हैं। यह भी सामने आया है कि उस समय भाजपा सरकार के फायरब्रांड कृषि मंत्री को भाजपा आलाकमान ने दिल्ली बुलाया गया था, तभी से किरोड़ी अपनी सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल पा रहे हैं।
वसुंधरा राजे को आइना दिखाने के बाद भाजपा ने 2009 में पार्टी ने हनुमान बेनीवाल को बाहर का रास्ता दिखा दिया था, तब से बेनीवाल लगातार आक्रामक होते जा रहे हैं। 2009 से ही लगातार चार—4 सरकारों के खिलाफ करीब दो दशक से जनहित के मुद्दों पर बिना रुके संघर्ष करने वाले बेनीवाल ने यह साबित कर दिया कि वे केवल क्षेत्रीय मुद्दों तक सीमित नेता नहीं हैं। उनके धरने, आंदोलन, रैलियों और कूच ने यह दिखाया कि जनता के मुद्दे सीधे सत्ता और प्रशासन के सामने उठाए जाने चाहिए। सरकार और प्रशासन की नाकामी को बेनीवाल ने जनता के सामने उजागर किया और उन्हें मजबूर किया कि वे कार्रवाई करें। इससे उनकी राजनीतिक साख और कार्यकर्ताओं में मजबूती, दोनों बढ़ी हैं। राजस्थान की राजनीति अब स्पष्ट रूप से यह दिखा रही है कि पुराने नेता और पुराने समीकरण अब निर्णायक नहीं हैं। जनता सक्रिय है, नेता चुनौतीपूर्ण हैं और सत्ता का नया समीकरण बन चुका है। हनुमान बेनीवाल के साथ ही दक्षिण राजस्थान में भारत आदिवासी पार्टी की पकड़, नरेश मीणा और रविंद्र सिंह भाटी जैसे युवा नेताओं की सक्रियता और कांग्रेस के भीतर गहलोत की कमजोर स्थिति यह तय कर रही है कि आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति पूरी तरह से नई दिशा में जाएगी।
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