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'AAP का सूर्यास्त: क्यों भागे राघव चड्ढा, संदीप पाठक, हरभजन समेत 7 सांसद?


10 में से 7। यह कोई चुनाव का नतीजा नहीं है। यह AAP के राज्यसभा सांसदों की वो संख्या है जो एक झटके में BJP में चली गई। राघव चड्ढा, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, सब के सब बीजेपी में गए और जाने से पहले गणित भी इतना सटीक रखा कि दल बदल कानून भी न लगे। यह संयोग है या सुनियोजित खेल?

24 अप्रैल 2026 को भारतीय राजनीति में एक ऐसा भूकंप आया, जिसने आम आदमी पार्टी की बुनियाद हिला दी। राज्यसभा में AAP के 10 में से 7 सांसदों, राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत सिंह सहनी और स्वाति मालीवाल ने BJP में विलय का ऐलान कर दिया। 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीन सांसद सामने आए, बाकी चारों के सिग्नेचर पेपर राज्यसभा के चेयरमैन को सुबह ही सौंप दिए थे। राघव चड्ढा ने कहा कि “आम आदमी पार्टी, जिसे मैंने अपने खून-पसीने से सींचा, जिसे 15 साल की जवानी दी, वो पार्टी अब अपने मूल सिद्धांतों से पूरी तरह भटक चुकी है। वो अब देश के लिए नहीं, निजी स्वार्थ के लिए काम कर रही है।” 

अब सबसे बड़ा सवाल, क्या इन सातों पर दल बदल कानून लागू होगा? और राघव चड्ढा का वो तर्क जिसे उन्होंने ढाल की तरह इस्तेमाल किया, क्या वो संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है?

भारत में दल बदल विरोधी कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए पारित किया गया और इसे संविधान की 10वीं अनुसूची में जोड़ा गया। इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वो स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है। लेकिन इस कानून में एक खिड़की भी है और राघव चड्ढा ने ठीक उसी खिड़की से छलांग लगाई है। 

91वें संविधान संशोधन अधिनियम 2003 के तहत यह प्रावधान है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई से अधिक सदस्य एक साथ दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाएगा। यानी विलय के मामले में दल-बदल के आधार पर अयोग्यता लागू नहीं होगी, बशर्ते उक्त विलय विधायक दल के उन दो-तिहाई सदस्यों के साथ हो, जिन्होंने किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ विलय की सहमति दी हो। 

AAP के पास राज्यसभा में 10 सांसद हैं। दो-तिहाई का मतलब है कम से कम 7, और संयोग से ठीक 7 ही गए हैं। गणित बिल्कुल सटीक है। तो क्या ये सात बच जाएंगे? तकनीकी रूप से राघव चड्ढा का तर्क संविधान सम्मत दिखता है, लेकिन अंतिम फैसला राज्यसभा के चेयरमैन करेंगे। दल बदल कानून के तहत सदस्य की योग्यता का निर्धारण सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है और इस बारे में उनका निर्णय अंतिम होता है। 

यहीं असली पेच है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि दल बदल विरोधी कानून तब भी लागू होता है, जब कोई गुट पार्टी से अलग होता है। शिवसेना और उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे का उदाहरण सामने है, वहाँ भी दो-तिहाई थे, फिर भी कानूनी लड़ाई चलती रही। यानी ये मामला अदालत तक पहुँचेगा और AAP जरूर चुनौती देगी।

AAP ने इस पूरे घटनाक्रम को “ऑपरेशन लोटस” करार दिया है। AAP सांसद संजय सिंह का कहना है कि BJP ने ED और CBI का इस्तेमाल करके इन सांसदों पर दबाव बनाया और पंजाब में भगवंत मान सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। अरविंद केजरीवाल ने भी कहा कि BJP ने पंजाब की जनता को एक बार फिर धोखा दिया है। दूसरी तरफ संदीप पाठक कहते हैं कि उन्होंने 10 साल इस पार्टी को दिए, नई राजनीति के सपने के साथ आए थे, लेकिन आज वो रास्ता अलग करने पर मजबूर हुए। 

अब सवाल यह है कि क्या पूरी AAP BJP की हो गई? राज्यसभा में तीन सांसद अभी भी AAP के साथ हैं। लोकसभा में AAP का एकमात्र सांसद पंजाब से है। पंजाब में भगवंत मान की सरकार मजबूत बहुमत के साथ है, वो तत्काल नहीं गिरेगी। लेकिन संगठनात्मक रूप से AAP को जो क्षति हुई है, वो अपूरणीय है। राघव चड्ढा, जो पार्टी का चेहरा था, युवा आवाज था, संसदीय धार था, उसका जाना प्रतीकात्मक से कहीं अधिक है। संदीप पाठक, जो पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव थे, पूरी चुनावी मशीनरी जिनके हाथ में थी, उनका जाना पार्टी की रीढ़ तोड़ने जैसा है।

भारतीय राजनीति का यह कड़वा सत्य है कि “आया राम, गया राम” की परंपरा आज भी जिंदा है, बस अब उसे संविधान की 10वीं अनुसूची की भाषा में बोला जाता है। जो पार्टी भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने के नारे पर खड़ी हुई थी, आज उसी के सबसे विश्वासपात्र चेहरे उसे “अपराध की पार्टी” कह रहे हैं। और जिस BJP को AAP ने वर्षों तक दुश्मन नंबर एक बताया, उसी के दरवाजे पर जाकर दस्तक दे रहे हैं। राजनीति में न कोई स्थायी दुश्मन होता है, न स्थायी दोस्त, सिर्फ स्वार्थ ही स्थाई होता है।​​​​​​​​​​​​​​​​

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