अलवर जिले का खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र राजस्थान की औद्योगिक शक्ति का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। यहां दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे की गूंज सुनाई देती थी, मशीनों का शोर हर सुबह नई उम्मीद लेकर आता था और हज़ारों श्रमिक परिवारों की रोज़ी-रोटी इन्हीं फैक्ट्री गेटों से जुड़ी थी, लेकिन आज उसी खुशखेड़ा के औद्योगिक क्षेत्र में एक अजीब सन्नाटा पसरा हुआ है। मशीनों की जगह ताले लटक रहे हैं, श्रमिकों की जगह खाली शिफ्ट पड़ी हैं और उत्पादन जहां तीन शिफ्ट चलता था, वहां अब एक भी मुश्किल से पूरी होती है। यह तस्वीर किसी नीतिगत चूक की नहीं, बल्कि हज़ारों किलोमीटर दूर मध्य-पूर्व में छिड़े एक युद्ध की है, जिसकी आंच अब राजस्थान के हर औद्योगिक नगर में महसूस हो रही है।
अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक आपूर्ति शृंखला को जो चोट पहुंचाई है, उसका सबसे गहरा घाव भारत के उन लघु और मध्यम उद्योगों पर दिखाई दे रहा है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर टिके हैं। ब्यावर जिले में, जो राजस्थान का ‘मिनरल हब’ कहलाता है, लगभग 1100 फैक्ट्रियों में से 1000 इकाइयों पर ताले लटक गए हैं और मशीनों का शोर सन्नाटे में बदल चुका है। यह महज एक जिले की कहानी नहीं है। लघु उद्योग भारती के अनुसार राजस्थान के करीब 14 जिलों में यह सेक्टर फैला है, जिससे 6 लाख लोग सीधे तौर पर जुड़े हैं।
संकट की जड़ें समुद्र की गहराइयों में हैं। ईरान-इज़राइल संघर्ष के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं और लॉजिस्टिक्स खर्च आसमान छू रहा है। मिडिल ईस्ट और लाल सागर क्षेत्र में खतरे के कारण जहाज़ों ने अपने रूट बदल दिए हैं, जिससे कंटेनर भाड़ा 300-500 डॉलर से बढ़कर 2,000 से 4,500 डॉलर तक पहुंच गया है और वॉर सरचार्ज के चलते बीमा प्रीमियम में भी भारी वृद्धि हुई है। व्यापार की यह जीवनरेखा जब खतरे में पड़ती है, तो सबसे पहले मार उन छोटे उद्यमियों और मज़दूरों पर पड़ती है जिनके पास न तो संचित पूंजी का कुशन होता है, न संकट झेलने की वित्तीय क्षमता।
जयपुर के कंटेनर यार्ड से जुड़े कारोबारियों के अनुसार पहले जहां 150 कंटेनर नज़र आते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर 2,000 से ज़्यादा हो गई है। यह कंटेनरों का अम्बार दरअसल उन आशाओं और मेहनत का अम्बार है जो महीनों की कड़ी मशक्कत के बाद बंदरगाह तक पहुंची, लेकिन आगे जाने का रास्ता बंद मिला। जालोर में 80 प्रतिशत इकाइयां बंद होने के कगार पर हैं, जबकि पिछले कुछ हफ्तों में 250 यूनिट बंद हो चुकी हैं और 6,000 से ज़्यादा मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं।
यह संकट केवल खनिज उद्योग तक सीमित नहीं है। कपड़े से लेकर सेरामिक और मार्बल तक की कंपनियों में कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई न होने से इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन बुरी तरह डिस्टर्ब हो गई है। जयपुर के बगरू, रींगस और सीतापुरा जैसे इंडस्ट्रियल इलाकों में कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई बाधित होने से कपड़ा, सेरामिक, मार्बल और केमिकल फैक्ट्रियों में ताले लग गए हैं। सोजत की मेहंदी फैक्ट्रियां जो यूरोप और खाड़ी देशों तक अपना माल भेजती थीं, वे भी इस वैश्विक उथल-पुथल से अछूती नहीं रह सकीं।
जो दृश्य सबसे अधिक मर्मस्पर्शी है, वह जयपुर रेलवे स्टेशन का है। फैक्ट्रियां बंद होने से कोरोना जैसे दौर का डर सताने लगा है। जो मज़दूर बचे भी हैं उन्हें घरेलू एलपीजी सिलेंडर न मिलने से खाने-पीने का भी संकट पैदा हो गया है। जयपुर रेलवे स्टेशन पर अजमेर-सियालदह और गरीब नवाज़ एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल लौटने वाले मज़दूरों की भारी भीड़ जमा है। वही पलायन, वही बेबसी, वही सामान उठाए कंधे, जो हमने 2020 में देखे थे। फ़र्क सिर्फ इतना है कि उस बार एक महामारी ने यह तस्वीर बनाई थी, इस बार एक युद्ध ने तबाही मचा दी है।
इस संकट की एक और परत है, जिसे समझना ज़रूरी है। ईरान के ऊपर से हवाई क्षेत्र बंद होने और सुरक्षा कारणों से विमान कंपनियों ने जयपुर से उड़ानों में भारी कटौती की है। जयपुर-अबू धाबी और दुबई रूट पर सबसे बुरा असर पड़ा है। दुबई की दोनों नियमित उड़ानें लगातार रद्द चल रही हैं। इसका सीधा असर राजस्थान के उन लाखों परिवारों पर पड़ रहा है जिनके बेटे और पति खाड़ी देशों में काम करते हैं। इटली और खाड़ी देशों से भारत आने वाली टिकटें, जो पहले 50,000 रुपये के आसपास थीं, अब 1,50,000 रुपये तक पहुंच गई हैं। शेखावाटी के हज़ारों परिवार ऐसे हैं जो ईद पर या छुट्टी में घर आने का इंतज़ार कर रहे थे, लेकिन तीन गुना किराये के सामने वे बेबस हैं।
वैश्वीकरण ने हमें यह सुविधा दी कि हम दुनिया के किसी भी कोने में अपना माल बेच सकते हैं, किसी भी देश से कच्चा माल मंगवा सकते हैं, लेकिन इसी वैश्वीकरण ने हमें यह भी सिखाया है कि दूर के देशों की राजनीतिक उठापटक अब हमारे घर के दरवाज़े तक आती है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे माल की कीमतें 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं, लॉजिस्टिक और शिपिंग की लागत पांच गुना तक महंगी हो चुकी है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में जारी तनाव की वजह से चीन और यूरोप से होने वाले आयात पर भी बुरा असर पड़ा है। यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उन परिवारों की पीड़ा हैं जो महीने के अंत में तनख्वाह का इंतज़ार करते हैं।
इस परिस्थिति में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी आर्थिक संरचना की उस कमज़ोरी को पहचानें, जो हमें बाहरी झटकों के प्रति इतना असुरक्षित बनाती है। भारत का लघु और मध्यम उद्योग जगत, जो देश के कुल निर्यात में महत्वपूर्ण हिस्सेदार है, आज भी ऊर्जा आपूर्ति के मामले में बेहद कमज़ोर स्थिति में है। इंदौर और उससे लगे क्षेत्रों के करीब 5000 से ज़्यादा उद्योग अपनी कच्चे माल की ज़रूरत के लिए 60 फीसदी तक मिडिल ईस्ट के देशों पर निर्भर हैं। यही निर्भरता राजस्थान के उद्योगों की भी है। जब तक हम वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को उद्योगों से जोड़ने में सफल नहीं होते, जब तक हम अपनी सप्लाई चेन को विविध और लचीला नहीं बनाते, तब तक इस तरह के संकट बार-बार आते रहेंगे।
राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार दोनों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि प्रभावित उद्यमियों और श्रमिकों के लिए तत्काल राहत के उपाय किए जाएँ। ऐसे उद्योगों को अल्पकालीन ब्याजमुक्त ऋण, विद्युत ऊर्जा पर सब्सिडी और निर्यात प्रोत्साहन के विशेष पैकेज दिए जाने चाहिए ताकि वे इस तूफान में टिके रह सकें। साथ ही दीर्घकालीन दृष्टिकोण से यह भी ज़रूरी है कि राजस्थान, जो सौर ऊर्जा में देश का अग्रणी राज्य है, अपने औद्योगिक क्षेत्रों को हरित ऊर्जा से जोड़ने की रफ्तार तेज़ करे। खुशखेड़ा और भिवाड़ी जैसे इलाकों में पहले से चल रहे अक्षय ऊर्जा प्रकल्प इसी दिशा में एक सकारात्मक क़दम हैं।
युद्ध कहीं और लड़े जाते हैं, पर उनकी कीमत चुकाते हैं खुशखेड़ा के वे मज़दूर जो रोज़ सुबह साइकिल पर सवार होकर कारखाने की तरफ निकलते हैं। उनके लिए दुनिया का भूगोल ईरान की स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ या लाल सागर नहीं है, उनकी दुनिया उस फैक्ट्री गेट तक सिमटी है जो आज बंद है। इस बंद दरवाज़े को खोलने के लिए नीतिगत संवेदनशीलता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और सप्लाई चेन की पुनर्संरचना, तीनों की एक साथ ज़रूरत है। यही समय की मांग है।

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