दौसा में सचिन पायलट किरोड़ीलाल मीणा हैं किंगमैकर



राजस्थान विधानसभा चुनाव में जिलेवार विधानसभा दावेदारों की श्रंखला में आज मैं पूर्व राजस्थान की दौसा विधानसभा सीट के दावेदारों की बात करंगा। अब तक जयपुर, सीकर और भीलवाड़ा के समीकरण बताने का प्रयास कर चुका हूं। दौसा सीट 1991 से 2000 तक राजेश पायलट की लोकसभा सीट हुआ करती थी। बाद में साल 2000 के दौरान राजेश पायलट का अचानक सड़क दुर्घटना में निधन के बाद उपचुनाव में इस सीट से उनकी पत्नी और सचिन पायलट की मां रमा पायलट सांसद चुनी गईं। 


इसके बाद 2004 के आम चुनाव में सचिन पायलट की राजनीति में एंट्री हुई तो इसी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़कर पहली जीत हासिल की। इसके अगली बार 2009 के संसदीय चुनाव में यह सीट रिजर्व हो गई, जिसके कारण सचिन पायलट को अजमेर सीट से चुनाव लड़ना पड़ा। अजमेर से चुनाव जीतकर वह केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में उनको अजमेर से ही हार का मुंह देखना पड़। 


दौसा जिले में पांच विधानसभा सीट आती हैं। इनमें से अभी चार सीट कांग्रेस के पास है, जबकि एक सीट पर निर्दलीय विधायक हैं। जिले में दौसा के अलावा महुआ, सिकराय, लालसोट, बांदीकुई सीट आती हैं। इनमें से महुआ सीट पर निर्दलीय ओमप्रकाश हुडला एमएलए हैं। इसके अलावा दौसा से मुरारीलाल मीणा, लालसोट से मुरारीलाल मीणा, सिकराय से ममता भूपेश और बांदीकुई से गजराज खटाना विधायक हैं। इससे पहले साल 2013 में ओमप्रकाश हुडला भाजपा के टिकट पर महुआ से विधायक थे। साथ ही बांदीकुई से अल्का सिंह गुर्जर थीं, जबकि लालसोट से राजपा के डॉ. किरोड़ीलाल मीणा थे। इसी तरह से सिकराय से राजपा की गीता वर्मा थीं। साथ ही दौसा सीट पर भाजपा के शंकरलाल शर्मा जीते थे। 



दौसा में वर्तमान विधायक मुरारी लाल ने पिछली बार भाजपा विधायक शंकर शर्मा को 50000 वोट से हराया था। इसका सबसे बड़ा कारण सचिन पायलट फैक्टर रहा था। इस बार भी गुर्जर—मीणा वोट अधिक होने के कारण मुरारीलाल मीणा ही सबसे मजबूत दावेदार हैं, लेकिन एक पुराने कांग्रेस परिवार से ताल्लुक रखने वाले राधेश्याम मीणा भी मजबूती से दावेदारी कर रहे हैं। इनके अलावा कोई खास दावेदार नहीं हैं। वैसे तो मुरारीलाल मीणा के लिए सबकुछ ठीक है, लेकिन परिस्थिति बदली तो अपनी पत्नी सविता मीणा को यहां से आगे करके खुद दौसा से सांसद का लड़ सकते हैं। किंतु सविता मीणा तब ही लड़ेंगी, जब सामने भाजपा से ऐसा उम्मीदवार हो, जो मुरारी को हरा सकें, ताकि सविता मीणा को आगे करके मुरारी लाल खुद हार से बचना चाहें।


भाजपा की बात की जाए तो पूर्व विधायक शंकर लाल शर्मा फिर से मजबूत दावेदार हैं। उनका मजबूत पक्ष भी यही है कि वो पूर्व विधायक हैं और क्षेत्र की नब्ज को अच्छी तरीके से जानते हैं। हालांकि, अधिक उम्र और निष्क्रियता सबसे बड़ी कमजोरी भी है। इसके साथ ही दूसरा नाम नीलम गुर्जर का है, जो यहां पर बीते चार साल से सक्रिय हैं। भाजपा की प्रदेश मंत्री हैं, साथ ही जिला परिषद सदस्य भी हैं। सबसे मजबूत पक्ष यह है कि सबसे युवा दावेदार हैं। 


नीलम गुर्जर ABVP से निकली हुई हैं और संघ में प्रथम वर्ष प्रशिक्षित हैं। भाजपा नीलम गुर्जर को इसलिए भी टिकट दे सकती है, क्योंकि पार्टी को इस क्षेत्र में पायलट फैक्टर से पार पाने के लिए ऐसे युवा उम्मीदवार की तलाश है, जो स्थानीय हो, सक्रिय हो, साथ ही क्षेत्र में अपनी कमांड भी रखता हो। इससे भी बढ़कर पायलट कैंप के लिए चिंता का विषय यह है कि जिला प्रमुख के चुनाव में 8 सदस्य भाजपा के जीते थे, फिर भी पार्टी को 13 वोट मिले। इसके साथ ही रतन तिवाड़ी हैं, जो भाजपा के जिलाध्यक्ष रहे हैं, लेकिन एसीबी के मामले में फंस गये थे। हालांकि, अभी क्लीन चिट मिल गई है। उससे पहले कन्या भ्रूण हत्या के मामले में भी फंसे थे।


दूसरी सीट सिकराय में कांग्रेस की ममता भूपेश वर्तमान विधायक हैं। इस बार फिर से दावेदार हैं, लेकिन पायलट फैक्टर बहुत बड़ी वजह है, जिसके कारण उनका टिकट कट सकता है। पिछले दिनों क्षेत्र में उनका जमकर विरोध हो चुका है। माना जाता है कि पायलट के कारण ही 2018 में जीती थीं। जिस कारण से ममता भूपेश पिछली बार जीती थीं, इस बार टिकट कटने और चुनाव हारने का बड़ा कारण रहेगा। इसके अलावा कांग्रेस से दौसा के पूर्व प्रधान डीसी बैरवा और सिकंदरा प्रधान सुल्तान बैरवा भी दावेदार हैं।


भाजपा की बात की जाए तो पूर्व विधायक नंदलाल बंशीवाल फिर से दावेदार हैं। उनकी इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ बताई जाती है। बंशीवाल की कजोरी की बात करें तो 2013 की हार के बाद क्षेत्र में निष्क्रिय बताए जाते हैं। दूसरा नाम भाजपा के पूर्व प्रत्याशी विक्रम बंशीवाल हैं। विक्रम 2018 में चुनाव हार गए थे, लेकिन अभी काफी सक्रिय हैं। तीसरा नाम गौरी देवी पाटन हैं, जो पूर्व सरपंच हैं। इनका मजबूत पक्ष यह है कि युवा चेहरा हैं और क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। कमजोरी की बात करें तो उनके सामने अनुभवी और दिग्गज नेता नंदलाल बंशीवाल की दावेदारी है। साथ ही पूर्व विधायक गीता वर्मा भी हैं, जो 2018 में भाजपा में ज्वाइन कर चुकी हैं। किरोड़ीलाल मीणा ने यदि साथ दिया तो फिर गीता वर्मा को भी टिकट मिल सकता है।


इसी तरह से दौसा जिले की बांदीकुई सीट पर अभी कांग्रेस के गजराज खटाना विधायक हैं। खटाना सचिन पायलट कैंप से आते हैं। सरकार का हिस्सा नहीं थे, इसलिए क्षेत्र में खास विरोध भी नहीं है। हालांकि, कमजोरी यह है कि यहां के स्थानीय नहीं होने के कारण बाहरी होने का मुद्दा उछल सकता है। अन्य दावेदारों में चतर सिंह गुर्जर, 2013 और 2018 के चुनाव मे बीएसपी से चुनाव लड़कर दूसरे नंबर पर रहने वाले भागचंद सैनी और वर्तमान जिला प्रमुख हीरालाल सैनी भी दावेदार हैं। उनकी मजबूती गहलोत गुट है। इसके साथ ही बांदीकुई से वैभव गहलोत के चुनाव लडने की चर्चा का बाजार गर्म है।


भाजपा में पूर्व विधायक प्रत्याशी रामकिशोर सैनी सबसे मजबूत दावेदार हैं। अनुभवी होने के साथ ही पूर्व में मंत्री रहे हैं, जनता से सीधा जुड़ाव और स्वच्छ ईमानदार छवि के कारण टिकट मिल सकता है। हालांकि, उम्र अधिक होना और निष्क्रियता दावेदारी कमजोर करते हैं। इसके साथ ही भाजपा से युवा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र सैनी भी दावेदार जता रहे हैं। भूपेंद्र सैनी युवा चेहरा हैं, साथ ही क्षेत्र में सक्रियता काफी है। इसके अलावा सैनी को लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला का करीबी माना जाता है। 


सैनी का कमजोरी पक्ष यह है कि अभी पहला चुनाव लडने की तैयारी हैं। इसलिए कांग्रेस का टिकट तय करेगा कि भूपेंद्र को मिलेगा या नहीं। माना जा रहा है कि कांग्रेस से गजराज खटाना आए तो बीजेपी से भूपेंद्र सैनी को उम्मीदवार बनाया जाएगा। ऐसे में 2013 और 2018 में बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके भागचंद सैनी फिर मैदान में होंगे। ऐसी स्थिति में भाजपा फिर से तीसरे नंबर पर जा सकती है। 


महुआ सीट पर इस बार भाजपा किरोड़ीलाल मीणा के करीबी को टिकट दे सकती है। यहां पर निर्दलीय ओमप्रकाश हुडला विधायक हैं, जो पहले भाजपा के विधायक थे, लेकिन पिछली बार करोड़ीलाल मीणा के भाजपा में शामिल होने से उनको टिकट नहीं मिला था। इस बार कांग्रेस उनको टिकट दे सकती है। कांग्रेस के पास यहां पर ओमप्रकाश हुडला से मजबूत प्रत्याशी है भी नहीं। 


उन्होंने संकट के समय अशोक गहलोत सरकार का साथ दिया था, इसलिए गहलोत कैंप से कांग्रेस टिकट दे सकती है। भाजपा की बात की जाए तो प्रत्याशी रहे राजेंद्र मीणा को फिर से टिकट मिलना तय माना जा रहा है। राजेंद्र मीणा को किरोड़ीलाल मीणा का करीबी माना जाता है। युवा होने के साथ ही पिछले चुनाव में ओमप्रकाश हुडला को कड़ी टक्कर दे चुके हैं। कांग्रेस के अजय बोहरा यहां पर पिछली बार चौथे नंबर पर रहे थे। 


लालसोटी सीट पर अशोक गहलोत सरकार के चिकित्सा मंत्री परसादी लाल मीणा विधायक हैं। पिछली बार उन्होंने भाजपा के रामविलास मीणा को करीब 9 हजार वोटों से हराया था। परसादी लाल की उम्र काफी हो चुकी है, जिसके कारण अपने बेटे को टिकट दिलाना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस द्वारा कहा गया कि जो मंत्री जीत सकता है, उसका टिकट नहीं कटेगा, तब से परसादी लाल वापस चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं। 


परसादी लाल लालसोट सीट से 1985 से 2003 तक विधायक थे। उसके बाद 2018 में जीते थे। साल 2013 में उनको किरोड़ीलाल मीणा ने हराया था। भाजपा से इस बार वही उम्मीदवार होगा, जो किरोड़ीलाल मीणा चाहेंगे। माना जा रहा है कि भाजपा इस बार लालसोट सीट पर किरोड़ीलाल के भाई जगमोहन मीणा को टिकट दे सकती है। 


कुल मिलाकर दौसा की सभी पांच सीटों पर इस बार रोचक मुकाबला होगा। माना जा रहा है कि सचिन पायलट अपने साथी मुरारीलाल मीणा और गजराज खटाना को जिताना चाहेंगे, लेकिन बाकी सीटों पर सचिन पायलट के इशारे पर निर्भर करता है कि वो क्या चाहते हैं। 


यदि उन्होंने पिछली बार की तरह इस बार पूरी ताकत से कांग्रेस के पक्ष में बात नहीं की तो कांग्रेस कमजोर रहेगी। भाजपा के पास इस बार करोड़ीलाल मीणा का पूरा साथ है तो इसके अलावा सत्ता विरोधी लहर भी काफी मायने रखती है। पायलट के साथ आजतक न्याय नहीं हुआ है, जिसका भी रियेक्शन के तौर पर भाजपा को लाभ होगा।

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