तीन साल बाद राजस्थान की मुख्यमंत्री महिला होगी, or उस पार्टी से होगी, जो भी महिलाओं का सम्मान करेगी, उनको लीडरशिप देगी और जो लेडी लीडर खुद पॉलिटिक्स में आगे बढ़ने के सारी एलिजिबिलिटीज पूरी करेगी, जिसके साथ अन्य महिलाओं का साथ होगा और सेंट्रल लीडरशिप जिसपर मेहरबान होगी। इसलिए अब जरूरी है कि जो महिलाएं पॉलिटिक्स में आगे बढ़ना चाहती हैं, जिनके एमएलए, मिनिस्टर या चीफ मिनिस्टर बनने के ड्रीम है, वो आज से ही तैयारी कर लें, ताकि तीन साल बाद अचानक ज्यादा एफर्ड्स नहीं लगाने पड़े।
इस वीडियो में आज हम एक ऐसे कानून की बात करते हैं जो 27 साल की लड़ाई के बाद 2023 में बना, लेकिन लागू नहीं हो सका और अब मोदी सरकार उसे 2029 से पहले ही लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने जा रही है। यह कानून है 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023', जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच्चा महिला सशक्तिकरण है या केवल 2029 की चुनावी बिसात है?
आगे बढ़ने से पहले इस कानून का पूरा इतिहास समझते हैं। महिला आरक्षण बिल 27 साल से अटका पड़ा था। सबसे पहले 1996 में एचडी देवेगौड़ा की सरकार में इसे ड्राफ्ट कर पार्लियामेंट में इंडरड्यूज किया गया था। साल 2010 में यह बिल यूपीए सरकार में राज्यसभा से पास भी हो गया था, लेकिन लोकसभा में इसे पेश नहीं किया गया। फिर 19 सितंबर 2023 को लोकसभा और 21 सितंबर 2023 को राज्यसभा द्वारा यह विधेयक पारित किया गया। 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस ऐतिहासिक नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को मंजूरी दी। यह संविधान का 128वां संशोधन है। खास बात यह है कि नए संसद भवन में पारित होने वाला यह पहला विधेयक बना था।
लेकिन यह कानून बना और एक बार फिर से क्यों अटक गया? इसे इंपलीमेंट करने से पहले जनगणना और डीलिमिटेशन की दो शर्तों को पूरा करना होगा। अगली जनगणना 2027 के आसपास होने की उम्मीद है, जिसके डेटा पब्लिश करने में 12 से 18 महीने लगने की संभावना है, जिससे यह प्रोसेस 2029 तक पेंडिंग हो जाता। यानी 2029 में नहीं, बल्कि 2034 के इलेक्शन में लागू होता। तो सवाल यह उठता कि अब नया संशोधन क्यों? क्योंकि इसको इंपलीमेंट करने के लिए जनगणना होना जरूरी है, लेकिन हर 10 साल में होने वाली जनगणना कोरोना के कारण 2021 में नहीं हुई, जबकि 75 साल पार कर चुके पीएम मोदी अब यह इंतज़ार नहीं करना चाहते। इसलिए नए प्रस्तावित संशोधन में 2011 में हुई जनगणना को ही आधार मानकर महिलाओं के लिए आरक्षण लागू कर दिया जाएगा। इस बिल को लाने के पीछे एक कारण यह बताया जा रहा है कि किसी भी सूरत में केंद्र सरकार 2029 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहती है। यानी जनगणना और परिसीमन की शर्त हटाकर सीधे 2011 के आँकड़ों के आधार पर ही महिला आरक्षण लागू किया जाएगा।
अब डीलिमिटेशन और पार्लियामेंट में सीटों का गणित समझते हैं। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं। आरक्षण लागू होने के बाद 181 सीटें महिलाओं के लिए होंगी। अनुसूचित जाति की सीटें 84 से बढ़कर 126 और अनुसूचित जनजाति की सीटें 47 से बढ़कर 70 हो जाएंगी। राजस्थान की बात करें तो अभी 200 विधानसभा सीटें हैं। परिसीमन के बाद 250 से 260 सीटें होने का अनुमान है। यदि 250 सीट भी मानें तो 33 प्रतिशत, यानी करीब 83 से 84 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। जब महिलाओं की सीटें 84 होंगी तो उनका पलड़ा भारी होगा और उनके एकजुट होने पर सियासी दलों को उनकी बात सुननी ही होगी। कांग्रेस में सीएम फेस कोई नहीं है, भाजपा में भी सीएम किस बनाए रखना है, इसकी कोई गारंटी नहीं है। राजस्थान कांग्रेस की महिलाओं को आगे बढ़ाने की तैयारियां नहीं हैं, लेकिन भाजपा को केंद्रीय निर्देश पर महिलाओं का पूल बनाकर तेजी से तैयारी की जा रही है।
सवाल यह उठता है कि इससे भाजपा को कितना फायदा होगा? एनडीए सरकार ने 27 साल से लटके इस बिल को विशेष सत्र बुलाकर ऐतिहासिक बहुमत से पारित किया था। इसे नारी शक्ति वंदन नाम देकर सरकार ने महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया था। सरकार महिला आरक्षण लागू कर 48 फीसदी एकमुश्त वोट अपने साथ होने की उम्मीद कर सकती है। भाजपा के पास संगठन है, महिला मोर्चा है, वह 84 सीटों पर तैयार उम्मीदवार खड़े कर सकती है, लेकिन कांग्रेस और अन्य दलों के पास आज भी यह तैयारी नहीं है।
आज की तारीख में भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा... किसी के पास भी 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों का कोई pool तैयार नहीं है। जो लोकसभा या विधानसभा सीट महिलाओं के एक चुनाव में आरक्षित होगी, अगले चुनाव में वो महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं होगी, बल्कि अन्य 33 प्रतिशत सीटें रिजर्व की जाएंगी। यानी rotation system लागू होगा। इसमें बड़े-बड़े बाहुबली और दबंग नेताओं की सीटें महिलाओं को जाएंगी। तो क्या ये नेता अपनी सीट छोड़ेंगे? यह सबसे बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा होगी। कानून भले ही महिला शक्ति वंदन नाम से बनाया गया हो, लेकिन असल बात यह कि आज भी जितनी महिलाएं चुनाव लड़ रही हैं, उनके पीछे पति, पुत्र या ससुर का बैकअप होता है और ये ही लोग महिला के नाम से पॉलिटिक्स करते हैं। तो नये कानून के लागू होने से क्या महिलाओं को उतनी मजबूती मिलेगी, जितना दावा किया जा रहा हे?
सरकार का पक्ष तो यही है कि हम महिलाओं को ताकतवर बना रहे हैं, लेकिन विपक्ष के सवाल भी ज़रूरी हैं। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने कहा कि जब महिलाओं की जनसंख्या के लिए 2011 के पुराने आँकड़ों को आधार बनाएंगे तो महिला आरक्षण की आधारभूमि ही गलत होगी। पहले जनगणना कराई जाए फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए। दक्षिण भारत में एक और चिंता है, जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि सफलतापूर्वक नियंत्रित की, जैसे केरल और तमिलनाडु, उन्हें डर है कि डीलिमिटेशन के बाद वे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उच्च-वृद्धि वाले राज्यों की तुलना में अपना प्रतिनिधित्व खो देंगे। यानी पोपुलेशन कंट्रोल करने वाले राज्य दंडित होंगे और जनसंख्या बढ़ाने वाले पुरस्कृत किए जाएंगे। एक और ज़रूरी बात, आरक्षण केवल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं पर लागू होता है, इसमें राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों को शामिल नहीं किया गया है। यानी यह कानून आधा-अधूरा है और OBC महिलाओं के लिए इसमें कोई प्रावधान नहीं है, जो देश की सबसे बड़ी महिला आबादी है। इसका मतलब भले ही सरकार दावा करे कि इससे महिलाओं को लीडरशिप मिलेगी, लेकिन जब तक ओबीसी की महिलाओं के लिए रिजर्वेशन नहीं होगा, तब तक उनके पदों पर पॉलिटिकल पार्टीज जनरल कोटे से महिलाओं को टिकट देंगी, जिससे ओबीसी महिलाओं का हक मारा जाएगा।
तो आखिर में सवाल वही है। क्या यह सच्चा महिला सशक्तिकरण है? अगर होता तो 2023 में कानून बनने के बाद तुरंत जनगणना कराई जाती, OBC महिलाओं को भी शामिल किया जाता और राज्यसभा को भी इसके दायरे में लाया जाता। लेकिन अब जब 2029 का चुनाव सामने है, तब अचानक विशेष सत्र की ज़रूरत पड़ गई। ऐसा भी लगता है कि पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए सरकार ने यह दांव चला है। ईरान और अमेरिका का युद्ध से हमारी अर्थव्यवस्था पर भी लंबा असर रहेगा, सरकार के सामने रोजगार से लेकर आय तक चुनौतियाँ आएंगी। ऐसे में महिला आरक्षण लागू कर महिलाओं का एकमुश्त वोट साधने की कोशिश हो रही है। 27 साल की लड़ाई का नतीजा महिलाओं को मिले, यह बहुत ज़रूरी है। लेकिन यह अधिकार सिर्फ चुनाव से पहले नहीं, बल्कि हर दिन, हर नीति में मिलना चाहिए।

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