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भारत को सोना, तेल और चीन ने खोखला कर दिया, हर सेकंड 3.80 लाख रुपये घाटा



10 मई 2026 को हैदराबाद में एक विशाल जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक साल तक सोना मत खरीदो, तेल-पेट्रोल का इस्तेमाल कम करो, विदेश यात्रा मत करो, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से काम चलाओ, और खाने का तेल कम खाओ। भारत सोने के आयात पर हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च कर देता है, इसलिए शादी-ब्याह में सोना खरीदने से बाज़ आएं। कोरोना काल में वर्क फ्रॉम होम और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की जो व्यवस्था हमने बनाई थी, आज राष्ट्रहित में उसे फिर से शुरू करने का वक्त आ गया है। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई, जो प्रधानमंत्री को इस तरह की अपील क्यों करनी पड़ी? एक तरफ हम बात कर रहे हैं दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की, और अगले दो से तीन साल में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहे हैं। दूसरी ओर पीएम को इस तरह की अपील करनी पड़ रही है। जवाब एक ही है भारत को हर साल बढ़ता व्यापार घाटा, ऐसा ज़ख्म जो हर साल गहरा होता जा रहा है। आज हम इसी की पूरी पड़ताल करेंगे आँकड़ों के साथ, तथ्यों के साथ, और उस सच्चाई के साथ जो अक्सर बड़े-बड़े भाषणों में छुप जाती है।

तो सबसे पहले आप यह समझिए कि व्यापार घाटा क्या होता है? असल में कोई देश जितना बेचता है उससे ज़्यादा खरीदता है, तो बीच का जो फ़र्क बचता है उसे व्यापार घाटा कहते हैं। सीधी भाषा में बोलें तो जैसे आप दुकान से 100 रुपये का सामान लाते हैं और उस दुकानदार को 60 रुपये का सामान बेचते हैं, तो आपका घाटा 40 रुपये हुआ। यही काम भारत दशकों से कर रहा है, बस इसका पैमाना खरबों रुपयों का है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का माल व्यापार घाटा, यानी मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिएट 282.83 अरब डॉलर, यानी करीब 23 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, और अगर ट्रेड और सर्विसेज दोनों को मिलाएं तो 2025-26 में यह कुल व्यापार घाटा 119.30 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जो 2024-25 के 94.66 अरब डॉलर से काफी ज़्यादा है। प्रधानमंत्री ने जिस 12 लाख करोड़ के घाटे का ज़िक्र किया है, वो इसी का एक हिस्सा है। यानी हर सेकंड भारत करीब 3.80 लाख रुपये का घाटा उठा रहा है।

अब आते हैं असली मुद्दे पर कि भारत सबसे ज़्यादा किस चीज़ पर खर्च करता है? भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ फोरेन से आने वाले ओयल एनर्जी पर टिकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा कि हमारे देश में बड़े-बड़े तेल के कुएँ नहीं हैं, और यही हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85 फ़ीसदी कच्चा तेल विदेश से मँगाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल आयात 720 अरब डॉलर से ज़्यादा रहा, जिसमें कच्चा तेल अकेला सबसे बड़ा हिस्सा है करीब 120 से 130 अरब डॉलर, यानी 10 से 11 लाख करोड़ रुपये सालाना। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल के आयातकर्ताओं में तीसरे स्थान पर है। रूस से सबसे ज़्यादा खरीदता है, उसके बाद इराक से, जिसके कुल तेल निर्यात का करीब 30 फ़ीसदी भारत खरीदता है, और अभी पश्चिम एशिया में जो तनाव चल रहा है, होर्मुज़ स्ट्रीट में जो उठापटक है, उसने इस आयात बिल को और भड़का दिया है। जब तेल महँगा होता है, तो भारत का घाटा रातों-रात अरबों डॉलर बढ़ जाता है।

अब आते हैं उस चीज़ पर जिसका ज़िक्र मोदी जी ने सबसे पहले किया। कभी भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था, यानी भारत और सोने का रिश्ता सदियों पुराना है, लेकिन आज यह भावना हमें आर्थिक रूप से कमज़ोर कर रही है। 2025-26 में भारत ने 71.98 अरब डॉलर का सोना आयात किया, जो पिछले साल के 58 अरब डॉलर से काफी ज़्यादा है। यानी करीब 6 लाख करोड़ रुपये सिर्फ सोने पर खर्च हुए, और विडंबना देखिए कि सोने का आयात कीमत में बढ़ा, मात्रा में लगभग वही है। मतलब हम उतना सोना नहीं खरीद रहे, लेकिन उसके लिए ज़्यादा पैसे दे रहे हैं, प्रति किलो कीमत 76,617 डॉलर से उछलकर 99,825 डॉलर तक पहुँच गई। सोना भारत में पैदा नहीं होता, भारत में बनता नहीं, जो सोना हम ख़रीदते हैं, उसके बदले में देश से डॉलर बाहर जाते हैं, वो डॉलर जो हमें तेल खरीदने के लिए, दवाएँ बनाने के लिए, मशीनें लाने के लिए चाहिए।

चीन से मिलने वाला घाव हमें सबसे ज़्यादा टीसता है। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 2025 में 106 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान था। 2024 में यह 94.5 अरब डॉलर था। यानी करीब 8 से 9 लाख करोड़ रुपये सालाना व्यापार घाटा तो तो सिर्फ चीन से हो रहा है। 2024 में भारत ने चीन से 109.6 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जबकि चीन को सिर्फ 15.1 अरब डॉलर का निर्यात किया। चीन से आयात का करीब 80 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ चार श्रेणियों में है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल्स और प्लास्टिक हैं। वो मोबाइल जो आपके हाथ में है, उसके पुर्जे, वो लैपटॉप, वो सस्ती चार्जर गाड़ी, वो LED बल्ब जैसी चीजें बड़े पैमाने पर चीन से आते हैं, और यह सिर्फ आर्थिक घाटा नहीं, यह भारत की चीन पर रणनीतिक निर्भरता है। समय समय पर चीन के सामानों के बहिष्कार के अभियान तो चलाए जाते हैं, लेकिन इसका असर कुछ दिनों तक रहता है, भारत के लोग फिर से भूल जाते हैं और चीन के सामानों को खरीदना शुरू कर देते हैं।

किसानों की आय दोगुनी करने का दावा किया जाता है, लेकिन देश को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता है और सबसे बड़ा आयातक भी। DAP, पोटाश, यूरिया, ये सब हम बड़े पैमाने पर बाहर से मँगाने पड़ते हैं। सालाना करीब 12 से 15 अरब डॉलर, यानी 1 से 1.25 लाख करोड़ रुपये का उर्वरक आयात किया जाता है। प्रधानमंत्री ने खुद किसानों से कहा कि रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल 50 प्रतिशत तक घटाएँ और टिकाऊ खेती अपनाएँ। यानी ओर्गेनिक खेती पर बल दिया जा रहा है। देश में जैविक खेती से हर साल एक लाख करोड़ रुपये का घाटा कम किया जा सकता है। अगर भारत का किसान उर्वरक पर निर्भरता घटाए, तो यह एक तरफ मिट्टी बचाएगा, दूसरी तरफ करोड़ों डॉलर की विदेशी मुद्रा भी।

भारत के पांच राज्य सरसों उत्पादन में नित नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, लेकिन सरसों और नारियल के देश में यह विडंबना है कि हम खाने का तेल भी बाहर से मँगाते हैं। इंडोनेशिया से पाम ऑयल, यूक्रेन-रूस से सूरजमुखी तेल खरीद पर भारत को सालाना करीब 15 से 18 अरब डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। मोदी जी ने कहा कि खाने का तेल कम करो, यह आपकी सेहत के लिए भी ज़रूरी है और देश की आर्थिक सेहत के लिए भी। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सबसे ज़्यादा घाटा किस देश से हो रहा है? हाल के वर्षों में भारत को सबसे बड़ा व्यापार घाटा चीन, स्विट्ज़रलैंड, सऊदी अरब, इराक और इंडोनेशिया से हुआ है, इनमें चीन सबसे ऊपर है। सिर्फ 2024-25 में चीन के साथ व्यापार घाटा 99.2 अरब डॉलर था, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। स्विट्ज़रलैंड से घाटे की वजह है सोने का आयात। क्योंकि दुनिया का अधिकतर सोना स्विस रिफाइनरियों से होकर आता है। सऊदी अरब और इराक तो भारत के लिए कच्चे तेल के सबसे बड़े स्रोत हैं, और इंडोनेशिया पाम ऑयल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।

ऐसा नहीं है कि भारत को केवल नुकसान ही होता है। भारत दुनिया से खरीदता है तो बेचता भी है। तो सवाल यह उठता है कि भारत अपना उत्पादन सबसे ज़्यादा किस देश को बेचता है? भारत को सबसे बड़ा व्यापार लाभ, यानी surplus अमेरिका, यूएई, हांगकांग, यूनाइटेड किंगडम और वियतनाम से मिलता है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है। 2023-24 में भारत ने अमेरिका को 77.52 अरब डॉलर का सामान बेचा, जो कुल निर्यात का करीब 18 फ़ीसदी है। यूएई दूसरे नंबर पर है, तो पेट्रोलियम उत्पाद, जेम्स, टेक्सटाइल, खाद्य पदार्थ भारत से खरीद करता है। इसके अलावा नीदरलैंड और यूके भी भारत के लिए बड़े बाज़ार हैं। यह जानना बेहद ज़रूरी है कि भारत को सबसे अधिक विदेशी मुद्रा कहां से मिलती है? 

सर्विस एक्सपोर्ट, यानी IT, सॉफ्टवेयर, बिज़नेस प्रोसेसिंग हमारी असली ताकत है। 2024-25 में सेवा निर्यात 383.51 अरब डॉलर रहा, जो माल निर्यात से भी ज़्यादा है। इसमें सबसे बड़ा योगदान अमेरिका का है। इसके अलावा भारतीय प्रवासियों का पैसा भी बड़ा योगदान देता है। 2024 में भारत को विदेश में बसे अपने लोगों से रिकॉर्ड 129.1 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिली, जो अब तक का सबसे बड़ा आँकड़ा है। इसमें सबसे ज़्यादा हिस्सा अमेरिका से आया, जो 27.7 फ़ीसदी है, उसके बाद UAE से 19.2 फ़ीसदी आय हुई है। यानी भारत की विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत कोई सरकारी स्कीम नहीं, बल्कि वो भारतीय हैं जो दूसरे देशों में पसीना बहाकर अपने परिवार को पैसे भेजते हैं।

तो सवाल यह भी उठता है कि मोदी की अपील में कितना दम है? प्रधानमंत्री की अपील भावनात्मक रूप से सही है, लेकिन इसकी सीमाएँ भी हैं। सोना खरीदना ज़्यादातर भारतीयों के लिए शादी की परंपरा से जुड़ा है, इसे रोकना इतना आसान नहीं। पेट्रोल-डीज़ल की खपत पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बिना कम नहीं होगी। असली सवाल यह है कि जब हम हर साल 9 लाख करोड़ रुपये सिर्फ चीन को दे रहे हैं, तब क्या हम अपनी इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को उस स्तर तक ले जा सकते हैं, जहां आयात के बजाए निर्यात किया जाए? 

जब हम हर साल 10-11 लाख करोड़ रुपये तेल पर बाहर भेज रहे हैं, तब क्या हम रिनुएबल एनर्जी में उतना इनवेस्ट कर सकते हैं, जितना हमारी ज़रूरत है? जब हम 6 लाख करोड़ रुपये सोने पर उड़ा रहे हैं, तब क्या कोई सरकारी योजना लोगों को सोने की बजाय वित्तीय निवेश की ओर मोड़ सकती है? व्यापार घाटे को नागरिकों की जीवनशैली में बदलाव से नहीं, बल्कि उत्पादन नीति, ऊर्जा नीति और विनिर्माण में क्रांति से काबू में किया जाता है। मोदी की अपील एक संकेत है, लेकिन यह संकेत सरकार के लिए भी उतना ही बड़ा है, जितना नागरिकों के लिए। क्योंकि अगर देश को हर साल 12 लाख करोड़ का घाटा हो रहा है, तो यह सिर्फ आपके-हमारे सोना खरीदने से नहीं हो रहा, यह दशकों की विदेशी निर्भरता का नतीजा है, जिसे बदलने के लिए नागरिक की इच्छाशक्ति और सरकार की दूरदर्शिता, दोनों एक साथ मिलकर चलनी चाहिए।

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