उत्तर प्रदेश में एक ऐसा मुख्यमंत्री, जिसने वो कर दिखाया जो 35 साल में कोई नहीं कर पाया, लेकिन अब उसी के घर में आग लगी है। ब्राह्मण नाराज़ हैं, OBC खिसक रहा है, और विपक्ष मौके की तलाश में है। 2027 में योगी की हैट्रिक होगी या यूपी फिर पलट जाएगा?
पश्चिम बंगाल से लेकर आसाम तक पांच राज्यों में चुनाव निपट चुके हैं, और अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सवाल इन दिनों हर चौक—चोराहे पर गूंज रहा है, क्या अपराध को समाप्त करने वाले बुल्डोजर मॉडल के आविष्कारक योगी आदित्यनाथ 2027 में हैट्रिक मारेंगे? उत्तर प्रदेश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड योगी के नाम दर्ज हो चुका है, लगातार दो कार्यकाल पूरे करके वे अब तीसरी बार की तैयारी में हैं। 2022 में जब योगी ने अखिलेश यादव को दोबारा सत्ता से दूर रखा, तब 1985 के बाद पहली बार किसी सत्तारूढ़ दल ने यूपी में वापसी की थी। यानी जो काम तीन दशकों में कोई नहीं कर पाया, वो योगी ने कर दिखाया। अब सवाल है कि क्या तीसरी बार भी यही होगा?
योगी खुद एक टीवी कॉन्क्लेव 2025 में ऐलान कर चुके हैं कि 2027 एक 80-20 की लड़ाई होगी, यानी 80 फीसदी BJP और उसके साथी, और बाकी सब मिलाकर 20 फीसदी। यह आत्मविश्वास दिखावे का नहीं है। 2022 में BJP-NDA ने 403 में से 291 सीटें जीती थीं, यानी 72 फीसदी से ज़्यादा, लेकिन राजनीति में अहंकार और आत्मविश्वास के बीच का फर्क अक्सर चुनाव परिणामों में दिखता है।
क्योंकि एक बड़ा झटका 2024 में लग चुका है। लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसने 80 में से 37 सीटें जीतीं, इसके अलावा कांग्रेस ने 6, और INDIA ब्लॉक का कुल आंकड़ा 43 पहुंचा, जबकि 5 साल पहले 71 सीटें जीतने वाली BJP महज 33 सीटों पर सिमट गई। OBC और दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा बीजेपी से खिसका, अखिलेश के PDA फॉर्मूले ने एक बार फिर से काम किया। पीडीए फॉर्मूला पिछडे, दलित और अल्पसंख्यकों को एक करने का है। ओबीसी को छिटकाकर, दलितों को बहकाकर और अल्पसंख्यकों को डराकर समाजवादी पार्टी पहले भी दो बार शासन कर चुकी है। अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव कभी एमवाई फॉर्मेले, यानी मुस्लिम—यादव को एक करके चुनाव जीते थे। पीडीए फॉर्मेले के कारण भाजपा अयोध्या में भी हारी, जहां 500 साल बाद राम मंदिर बना है।
लेकिन BJP की असली मुसीबत सिर्फ बाहर से नहीं है, घर के अंदर भी आग सुलग रही है, और उस आग का नाम है ब्राह्मण बनाम ठाकुर की अनकही जंग। योगी आदित्यनाथ खुद ठाकुर समुदाय से आते हैं, और यूपी की सियासत में यह जातिगत पहचान हमेशा से एक दोधारी तलवार रही है। शंकराचार्य विवाद से यह दरार खुलकर सामने आ गई, प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके ब्राह्मण शिष्यों के साथ कथित बदसलूकी का मामला उठा, शंकराचार्य ने योगी सरकार पर सनातन धर्म के अपमान का आरोप तक लगाया। योगी ने विधानसभा में पलटवार किया कि संविधान सबके ऊपर है, लेकिन उनके अपने डिप्टी सीएम केशव मौर्य और ब्राह्मण चेहरे ब्रजेश पाठक ने संतों के सम्मान को लेकर अलग संवेदनशीलता दिखाई, यह भाजपा के भीतर जातीय गुटबाजी का खुला संकेत था।
यह अकेली घटना नहीं है, उससे पहले पुलिस भर्ती परीक्षा के एक सवाल में ‘पंडित’ शब्द को ‘अवसरवादी’ के अर्थ में इस्तेमाल किया गया, जिसने ब्राह्मण समाज की नाराजगी भड़का दी, और BJP के अपने ब्राह्मण विधायकों ने भी सार्वजनिक रूप से विरोध जताया। ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक पर पार्टी संगठन की तरफ से नोटिस तक जारी हुआ। यह दिखाता है कि दिल्ली और लखनऊ के बीच संतुलन बनाए रखना BJP के लिए आसान नहीं रह गया।
असल में उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राहम्ण और राजपूत समाजों में वैसी ही पॉलिटिकल रायवलरी है, जैसे राजस्थान में जाट और राजपूत समाजों में है। वैसे तो दोनों ही समाजों में कोई लड़ाई नहीं है, लेकिन नेताओं ने अपने फायदे के लिए समय—समय पर दोनों समाजों में दुश्मनी फैलाने का काम किया है। ठीक ऐसे ही यूपी की पॉलिटिक्स में ब्राह्मण—राजपूत संघर्ष बना दिया जाता है। दोनों समाजों में तब विवाद पैदा किया जाता है, जब चुनाव आते हैं। जैसे ही कोई चुनाव नजदीक होता है तो इन जातियों में विवाद करवाया जाता है। ताकि वोट बैंक का फायदा लिया जा सके। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण और राजपूत, दोनों ही भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं, और इसी में सेंधमारी करने का प्रयास किया जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि भाजपा की लोकल लीडरशिप आलाकमान की इच्छा या सहमति के बिना इतना बड़ा कदम उठा सके, कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए योगी के विरोध में उतर आए। आपको याद होगा 2017 में जब पहली बार भाजपा जीती थी, तब दिल्ली से लेकर लखनउ तक सीएम पद को लेकर कई दिनों तक खींचतान चली थी। उस खींचतान के वक्त सामने आया था कि 150 से ज्यादा विधायकों ने योगी के पक्ष में खड़े होकर भाजपा आलाकमान को झुकने को मजबूर कर दिया था। उसके बाद खुद अमित शाह ने कमान संभाली और योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने का प्रस्ताव रखा। तब बढ़ते विवाद को देखते हुए भाजपा आलाकमान ने एक तरह से खुद का बचाव किया था, लेकिन इसके बाद 2022 में योगी आदित्यनाथ दुबारा सीएम बने, तब से भाजपा में ही कई नेताओं को पच नहीं रहे हैं।
2024 के आम चुनाव में एक बात खूब उड़ी थी, कि योगी ने लोकसभा प्रत्याशियों के जिन 39 नामों की सूची सौंप गई थी, उनमें से 33 नाम काट दिए और उसके बाद वो सभी 33 चुनाव हार गए। हालांकि, इसमें कितनी सच्चाई है, इसका खुलासा तो योगी या अमित शाह ही कर सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि भाजपा की सेंटर लीडरशिप की सहमति के बिना उत्तर प्रदेश में कोई जाति के विधायक बगावत जैसा काम नहीं कर सकते। सोशल मीडिया पर एक बात और तैरती रहती है, यदि 2027 में योगी तीसरी बार भी सीएम बन गए, तो यह तय मानकर चलिए कि 2029 के आम चुनाव में या उसके बाद योगी को पीएम बनाने का दबाव बनेगा, जो अमित शाह की राह में सबसे बड़ा रोड़ा होगा। इसमें कोई दोराय नहीं है कि मोदी अपने बाद अमित शाह को ही पीएम बनाना चाहेंगे, लेकिन योगी की बढ़ती लोकप्रियता ने इन दोनों नेताओं को चिंतित कर रखा है।
भाजपा में मचे कोहराम के इस पूरे माहौल को भुनाने में विपक्ष पीछे नहीं है। मायावती ने खुलकर कहा कि योगी राज में ब्राह्मण समाज अपनी उपेक्षा और अपमान के खिलाफ अब खुलकर बोल रहा है, और BJP सरकार में केवल मुट्ठी भर लोग खुश हैं। यह वही मायावती हैं जिन्होंने 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ से सत्ता पाई थी, और अब वे फिर उसी फॉर्मूले को आजमाना चाह रही हैं। हालांकि, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी रहीं मायावती बीते 10 साल से भाजपा की बी टीम की तरह काम कर रही हैं। इसलिए मायावती के बयान को भी मोदी—शाह की रणनीति के तौर पर ही देखा जा रहा है।
दूसरी तरफ BJP इस बार मौर्य, कुर्मी, कश्यप, कुशवाहा, निषाद, राजभर, सैनी, पाल और प्रजापति जैसी OBC जातियों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है। विपक्ष पूरी ताकत से योगी को ‘ठाकुर सीएम’ बताने की कोशिश में लगा है, ताकि अगड़ा बनाम पिछड़ा की लकीर खिंच जाए, और यही वो खेल है जो 2027 में BJP के लिए सबसे खतरनाक साबित हो सकता है।
हालांकि BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने साफ कर दिया है कि 2027 का चुनाव योगी आदित्यनाथ के ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा, किसी भी संशय पर विराम लगाने की कोशिश की गई है। RSS का समर्थन योगी के साथ है, यह उनकी सबसे बड़ी ताकत है। दिखावे के तौर पर तो केंद्रीय लीडरशिप भी योगी के साथ बताई जाती है, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और कह रही है।
तो तस्वीर यह है कि योगी के पास संगठन है, मोदी का आशीर्वाद है, बुलडोजर की छवि है, और Operation Sindoor के बाद राष्ट्रवाद की लहर भी बीजेपी के साथ है, लेकिन घर के अंदर ब्राह्मण नाराजगी, बाहर से PDA की चुनौती, और 2024 का लोकसभा का ज़ख्म, ये तीनों मिलकर 2027 को UP की राजनीति का सबसे दिलचस्प और अनिश्चित चुनाव बना रहे हैं। इतिहास गवाह है, यूपी में जो सबसे मजबूत दिखता है, वही सबसे बड़े उलटफेर का शिकार होता है। इसलिए योगी के लिए यह चुनाव दोतरफा होगा, एक तरफ विपक्ष की चुनौती है तो दूसरी ओर भाजपा के अंदर की लड़ाई भी उनको लड़नी है। यदि इन दोनों चीजों से योगी ने पार पा लिया तो यह भी पक्का है कि हैट्रिक लगाने के साथ ही मोदी के बाद योगी पीएम के सबसे बड़े दावेदार बन जाएंगे।

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