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20 साल से नजरबंद पानी की कहानी


पूर्वी राजस्थान का करौली जिला, जहां मौजूद है एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का डेम, नाम है पाँचना बाँध। यह डेम पानी से लबालब भरा है, लेकिन इसका पानी पिछले 20 सालों से नजरबंद है। इस पानी की एक-एक बूंद के लिए पिछले दो दशकों से ऐसी 'जंग' चल रही है, जिसने पूरे राजस्थान की राजनीति को हिला कर रख दिया है। पांचना बांध के पवित्र जल ने 74 गांवों के दो समाजों को आमने-सामने कर दिया है। 

एक तरफ 35 गाँवों के किसान हैं जो पानी की आस में 20 साल से तरस रहे हैं, ये गांव मीणा समाज के बताए जाते हैं,  तो दूसरी तरफ गुर्जर समाज के 39 गाँवों के लोग हैं जो बाँध पर पहरा देकर बैठे हैं कि पानी की एक बूंद भी आगे नहीं जाने देंगे। कोर्ट के आदेश आ चुके हैं, इन दो दशकों में चार सरकारें बदल चुकी हैं, लेकिन ये पानी आज भी राजनीति और सामाजिक गतिरोध की बेड़ियों में 'नजरबंद' है। 

कहानी शुरू होती है साल 1977 में, जब गंभीर नदी की सहायक भद्रावती, बरखेड़ा, माचकी, भैंसावट और अटा के पानी को रोककर इस अनूठे मिट्टी के बाँध का निर्माण शुरू किया गया। इसे बनाने का मुख्य मकसद था पूर्वी राजस्थान के करौली, सवाई माधोपुर और भरतपुर के सूखे इलाकों में सिंचाई और पेयजल के लिए पानी पहुँचाना।

सालों के इंतजार के बाद, 2004 में यह बाँध आधिकारिक रूप से बनकर तैयार हुआ। इसे बनाने के लिए 39 गाँवों की उपजाऊ जमीन, घर और पुरखों की यादें इस बाँध के डूब क्षेत्र में समा गईं। ये ही वो गुर्जर बहुल 39 गांव हैं। शुरुआत में सब ठीक था। साल 1992 से 2005 के बीच बाँध से कमांड एरिया में पानी भी छोड़ा गया और फसलें लहलहाईं, लेकिन फिर आया साल 2006, जहाँ से इस विवाद की ऐसी शुरुआत हुई जो आज तक नहीं थमी।

इस 74 गाँवों के विवाद में दो धड़े आमने-सामने आ गए। एक पक्ष डूब क्षेत्र के 39 गाँवों का है, इनका नेतृत्व विजय बैंसला जैसे नेता कर रहे हैं। इनका तर्क बेहद सीधा और भावनात्मक है। इनका कहना है कि बाँध के लिए जमीनें हमारी गईं, घर हमारे उजड़े, तो पानी पर पहला हक हमारा होना चाहिए। सरकार ने चंबल-पाँचना-जगार लिफ्ट सिंचाई परियोजना का वादा किया था, ताकि डूब क्षेत्र के ऊपरी गाँवों को पानी मिल सके, लेकिन 20 साल बाद भी वो वादा अधूरा है। जब तक इन्हें पानी नहीं मिलेगा, ये बाँध के गेट नहीं खुलने देंगे।

दूसरा पक्ष कमांड क्षेत्र के 35 गाँवों का है, जो खण्डीप पंचायत समिति में है। सवाई माधोपुर और गंगापुर सिटी के इस क्षेत्र का नेतृत्व कांग्रेस विधायक और उपनेता प्रतिपक्ष रामकेश मीणा कर रहे हैं। इनका कहना है कि सिंचाई का पानी इनका कानूनी और संवैधानिक हक है। नहरें बनी हुई हैं, लेकिन पानी नहीं मिलने से करीब 40 हजार बीघा उपजाऊ जमीन बंजर हो रही है।

कहानी तब बदली, जब साल 2006 में राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन चरम पर था। इसी दौरान गुर्जर-मीणा समाजों में सामाजिक और राजनीतिक दूरियां बढ़ीं और डूब क्षेत्र के ग्रामीणों ने पाँचना बाँध की नहरों को बंद कर दिया। तब से साल में सिर्फ एक बार श्रीमहावीरजी मेले के अभिषेक के लिए गंभीर नदी में थोड़ा पानी छोड़ा जाता है, बाकी समय नहरें सूखी रहती हैं। विवाद बढ़ता गया और मामला कोर्ट में चला गया।

साल 2022 में राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कमांड एरिया के किसानों को उनके हक का पानी दिया जाए, लेकिन धरातल पर टकराव के डर से प्रशासन आज तक कोई कदम नहीं उठा पाया। 

मई 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बार फिर बेहद सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के सचिव को फटकार लगाते हुए तुरंत प्रभाव से नहरों में पानी छोड़ने और नई लिंक कैनाल बनाने का आदेश दिया। धरातल पर कोर्ट के आदेश की पालना नहीं होने पर 30 जून को कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और अगली सुनवाई 27 जुलाई हो होगी।

मई में आए कोर्ट के आदेश के बाद दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। 16 मई 2026 से 39 गाँवों के लोग बाँध पर दिन-रात पहरा देने बैठ गए। दूसरी तरफ 5 जून 2026 से गंगापुर सिटी के खंडीप गाँव में विधायक रामकेश मीणा के नेतृत्व में 35 गाँवों के किसानों का अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया, जिन्होंने 28 जून को रेल रोकने तक की चेतावनी दे दी थी।

24 जून 2026 को खंडीप में चल रही महापंचायत में कैबिनेट मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म पहुँचे। उन्होंने किसानों को आश्वस्त किया कि सरकार किसी भी किसान के साथ अन्याय नहीं होने देगी और कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए सर्वसम्मति से रास्ता निकाला जाएगा, जिसके बाद यह 20 दिनों से चल रहा धरना समाप्त हुआ। 

30 जून को ही सचिवालय में इसको लेकर अहम बैठक हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला और इसके कारण गुस्से में लाल हुए मंत्री किरोड़ीलाल मीणा बीच में ही इस बेहद महत्वपूर्ण मीटिंग छोड़कर निकल गए। बुधवार को, यानी एक जुलाई को पानी छोड़ने का वादा किरोड़ीलाल मीणा और जवाहर सिंह बेढ़म ने किया था, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है।

अगर यह बाँध पूरी तरह चालू होता है, तो इसके कमांड एरिया में आने वाले सवाई माधोपुर, करौली और नवगठित गंगापुर सिटी जिले के 35 गाँवों की 9,985 हेक्टेयर, यानी करीब 40,000 बीघा कृषि भूमि को साल में दो बार सिंचाई का भरपूर पानी मिलेगा, लेकिन इस पानी के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है वोटबैंक की राजनीति। पूर्वी राजस्थान की 20 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर गुर्जर और मीणा समुदाय का राजनीतिक प्रभाव बेहद निर्णायक है। 

चुनावी नफा-नुकसान को देखते हुए सभी नेता इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर फैसला लेने से कतराते रहे हैं, और इसी वजह से दो समुदायों के बीच यह खाई और चौड़ी होती गई। बड़े नेता बयानबाजी से बच रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर असामाजिक लोगों द्वारा भद्दी टिप्पणियां करके दोनों समाजों में दूनियां बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। दूसरी तरफ बीजेपी सरकार के मंत्री अब बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन किरोड़ीलाल मीणा जैसे नेता का मीटिंग छोड़ने सरकार के अंदर चल रहे द्वंद और शीतयुद्ध की ओर इशारा कर रहा है।

पाँचना बाँध का यह संकट हमें सिखाता है कि जब संसाधनों का सही नियोजन नहीं होता और राजनीति हावी हो जाती है, तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ आम किसान का होता है। चाहे वह डूब क्षेत्र का किसान हो, जिसने अपनी जमीन खोई, या कमांड क्षेत्र का किसान जिसकी फसलें पानी के बिना सूख गईं। 

उम्मीद है कि इस बार सरकार दोनों पक्षों को साथ बिठाकर एक ऐसा न्यायपूर्ण हल निकालेगी, जिससे किसी का हक न मरे और पूर्वी राजस्थान की धरती फिर से लहलहा उठे। आपको क्या लगता है, पाँचना बाँध के इस विवाद का सबसे सही समाधान क्या होना चाहिए? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें। 

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