अडानी-वेदांता की 'बिडिंग वॉर' और बैंकों का खाली खजाना: वो अदृश्य अर्थशास्त्र जिसका सीधा बिल आम जनता फाड़ती है

प्रॉफिट का निजीकरण, नुकसान का राष्ट्रीयकरण: टेंडर, स्टे ऑर्डर और कानूनी लूपहोल्स से बुना गया भारत का सबसे बड़ा 'कॉर्पोरेट चक्रव्यूह', NCLT का 'कुरुक्षेत्र' और दिवालिया कंपनियों की 'मेगा सेल': कैसे 'हेयरकट' के नाम पर आपकी जेब काट रहे हैं देश के अरबपति?

क्या आपने कभी सोचा है कि जो कंपनी हजारों करोड़ के घाटे में डूबकर दिवालिया हो चुकी है, उसे खरीदने के लिए भारत के सबसे बड़े अरबपति आपस में क्यों लड़ते हैं? एक तरफ देश का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रुप है, तो दूसरी तरफ माइनिंग और मेटल्स का बेताज बादशाह। 

जब भी Mines या पावर प्लांट्स की नीलामी होती है, तो टेंडर की रकम रातों-रात कैसे हजार करोड़ से बढ़कर 5 हजार करोड़ पहुंच जाती है? आज हम उस दुनिया में चलेंगे, जहां नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के कोर्ट रूम किसी कुरुक्षेत्र से कम नहीं होते हैं। हम डिकोड करेंगे उस 'इकॉनोमिक्स' को, जो इन बिडिंग विवादों के पीछे काम करता है।

इसका खेल शुरू होता है साल 2016 से, जब भारत सरकार IBC कानून लेकर आती है। नियम साफ था, अगर कोई कंपनी बैंकों का कर्ज नहीं चुका पा रही है, तो उसे नीलाम करके बैंकों का पैसा वसूला जाएगा। लेकिन बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए यह कानून एक 'मेगा सेल' बन गई। 

पावर सेक्टर और माइनिंग सेक्टर की दिवालिया कंपनियों को खरीदने के लिए होड़ मच गई। टेंडर की इस प्रक्रिया में जो विवाद होते हैं, वो किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं हैं। मान लीजिए एक दिवालिया पावर प्लांट के लिए वेदांता ने 3,000 करोड़ की बोली लगाई। 

अचानक आखिरी मिनट पर कोई दूसरी कंपनी, जैसे अडानी या रिलायंस 3,500 करोड़ का लिफाफा रख देती है। फिर शुरू होता है अदालतों का चक्कर, स्टे ऑर्डर और 'काउंटर बिडिंग' का खेल, जो सालों-साल चलता है। आखिर ये अरबपति एक डूबी हुई कंपनी के लिए इतना पैसा क्यों लुटाते हैं? 

इसके पीछे तीन बड़े इकोनॉमिक फैक्टर्स काम करते हैं। अगर आज कोई नया पावर प्लांट या स्टील प्लांट लगाना हो, तो जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी और निर्माण में 5 से 10 साल लग जाएंगे, लेकिन NCLT में प्लांट बना-बनाया मिलता है। टेंडर जीतो, और अगले दिन से बिजली या कोयला बेचना शुरू! 

कॉर्पोरेट की दुनिया में 'हेयरकट' शब्द बहुत प्रचलित होता है, इसका मतलब बाल काटना नहीं, बल्कि बैंकों के बही खातों से हजारों करोड़ रुपये के कर्ज को हमेशा के लिए व्हाइट ओफ कराना है। जब कोई कंपनी दिवालिया हो जाती है और उसे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के जरिए नीलाम किया जाता है, तो बैंक अपना मूल कर्ज भूलकर बहुत कम कीमत पर उस कंपनी को किसी नए कॉर्पोरेट घराने को सौंप देते हैं। 

कर्ज की जो रकम बैंक छोड़ देते हैं, उसे ही 'हेयरकट' कहा जाता है। सतही तौर पर यह लगता है कि नुकसान बैंकों का हुआ है, लेकिन अगर हम इसके पीछे का अर्थशास्त्र समझें, तो यह 'प्रॉफिट का निजीकरण और नुकसान का राष्ट्रीयकरण' का सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसका सीधा बिल आम जनता फाड़ती है। 

IBC के तहत कंपनियों को 'कौड़ियों के भाव' बेचा जा रहा है। वीडियोकॉन ग्रुप पर बैंकों का 64,838 करोड़ रुपये का कर्ज था। NCLT में इसे अनिल अग्रवाल की कंपनी 'ट्विन स्टार टेक्नोलॉजीज' ने मात्र 2,962 करोड़ रुपये में खरीदने की बोली लगाई। यानी 95% का हेयरकट! बाद में अदालतों ने इस पर रोक लगाई, लेकिन यह दिखाता है कि सिस्टम में किस स्तर की छूट मांगी जाती है। 

इसी तरह से आलोक इंडस्ट्रीज पर लगभग 29,500 करोड़ रुपये का बकाया था। इसे रिलायंस इंडस्ट्रीज और जेएम फाइनेंशियल ने मिलकर 5,000 करोड़ रुपये में खरीदा, और बैंकों को 83% का हेयरकट लेना पड़ा। शिवा इंडस्ट्रीज के मामले में बैंकों ने 93% का हेयरकट लेना स्वीकार कर लिया था। जब अरबों रुपये का यह कर्ज माफ होता है, तो बैंकों की बैलेंस शीट में एक बहुत बड़ा गड्ढा बन जाता है। इस गड्ढे को भरने के लिए सरकार और बैंक जो नीतियां अपनाते हैं, उसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है।

बैंकों के पास अपना कोई पैसा नहीं होता; उनके पास जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा होता है। हेयरकट का सीधा असर इन 3 तरीकों से जनता पर पड़ता है। भारत में फंसे हुए NPA का सबसे बड़ा हिस्सा Public Sector Banks का है। जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया या पंजाब नेशनल बैंक 10,000 करोड़ रुपये का 'हेयरकट' लेते हैं, तो उनकी पूंजी कम हो जाती है। बैंक को डूबने से बचाने के लिए भारत सरकार को उसमें नई पूंजी डालनी पड़ती है, जिसे 'बैंक रीकैपिटलाइजेशन' कहते हैं। सरकार यह पूंजी कहां से लाती है? 

आपके और हमारे द्वारा दिए गए इनकम टैक्स, पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स और माचिस से लेकर कार तक पर चुकाए गए GST से। यानी कॉर्पोरेट के पापों को धोने के लिए आम करदाता के पैसे का इस्तेमाल किया जाता है। जब बैंक कॉर्पोरेट्स को लाखों करोड़ की छूट देते हैं, तो अपने प्रॉफिट मार्जिन को बनाए रखने के लिए वे आम जनता से वसूली करते हैं। इसका सबसे आसान तरीका है FD और सेविंग्स अकाउंट पर ब्याज दरें घटा देना। 

जो सीनियर सिटीजन अपनी पेंशन और FD के ब्याज पर जिंदा है, वह कॉर्पोरेट हेयरकट की कीमत अपनी कम होती आमदनी से चुकाता है। बैंक अपने घाटे की भरपाई के लिए आम आदमी के होम लोन, एजुकेशन लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। इसके अलावा, ATM ट्रांजेक्शन, SMS अलर्ट, मिनिमम बैलेंस न रखने पर पेनल्टी और प्रोसेसिंग फीस के नाम पर हर महीने आम जनता के खाते से जो 50-100 रुपये काटे जाते हैं, वह असल में उन्हीं बड़े 'हेयरकट' की भरपाई का एक सूक्ष्म तरीका है।

हेयरकट के इस अर्थशास्त्र में सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो नया कॉर्पोरेट घराना दिवालिया कंपनी को खरीदता है, वह अपने घर से पैसा नहीं लाता। मान लीजिए, 10,000 करोड़ की कंपनी 3,000 करोड़ में नीलाम हो रही है। जीतने वाली कंपनी उन 3,000 करोड़ को चुकाने के लिए भी उन्हीं बैंकों से नया लोन ले लेती है! यानी, बैंकों के पैसे से ही बैंकों की कंपनी को भारी डिस्काउंट पर खरीद लिया जाता है। 

नए मालिक को बनी-बनाई फैक्ट्री, मशीनरी और जमीन 70-80% की छूट पर मिल जाती है, और वह अगले ही दिन से उससे प्रॉफिट कमाने लगता है। अर्थशास्त्री और सरकारें IBC और हेयरकट का बचाव यह कहकर करती हैं कि अगर दिवालिया कंपनी को नीलाम नहीं किया गया, तो वह फैक्ट्री हमेशा के लिए बंद हो जाएगी, मशीनें कबाड़ हो जाएंगी और वहां काम करने वाले हजारों मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। 

बैंकों का मानना है कि 10 साल कोर्ट में लड़कर कुछ न मिलने से अच्छा है कि आज 30% पैसा वापस ले लिया जाए, ताकि उस पैसे को किसी और को लोन देकर अर्थव्यवस्था को चलाया जा सके। IBC भारत के कॉर्पोरेट इतिहास का एक जरूरी सुधार जरूर था, जिसने कम से कम पुराने प्रमोटर्स से उनकी कंपनियां छीनने का डर पैदा किया, लेकिन जिस तरह से 'हेयरकट' के नाम पर 80-90% तक की भारी-भरकम छूट आम बात हो गई है, वह इसे देश के इतिहास के सबसे बड़े 'वेल्थ ट्रांसफर मैकेनिज्म' में बदल रहा है। 

यह एक ऐसा अदृश्य सिस्टम है, जहां आम जनता के टैक्स और बचत का पैसा चुपचाप तरीके से चंद बड़े कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरियों में ट्रांसफर किया जा रहा है।

कॉर्पोरेट्स सिर्फ एक कंपनी नहीं खरीदते, वो पूरा 'इकोसिस्टम' कंट्रोल करना चाहते हैं। अगर आपके पास कोयले की खदान है, तो आपको बिजली बनाने वाली कंपनी भी चाहिए और उसे ट्रांसपोर्ट करने के लिए पोर्ट भी। बिडिंग में दूसरी कंपनियों को हराकर वो दरअसल अपने कॉम्पिटिशन को खत्म कर रहे होते हैं। यह सिर्फ दो अमीरों की लड़ाई नहीं है; इसका सीधा असर आपकी और हमारी जेब पर पड़ता है। 

जब बड़े कॉर्पोरेट्स टेंडर में उलझते हैं, तो प्रोजेक्ट लटक जाते हैं। बैंकों का पैसा फंसा रहता है। और जब कोई एक कंपनी पावर या माइनिंग सेक्टर में अपनी Monopoly स्थापित कर लेती है, तो भविष्य में बिजली के बिल से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत तक, सब कुछ उसी कंपनी के इशारे पर तय होता है। 

बिडिंग के इस खेल में कभी-कभी नियम इतने लचीले हो जाते हैं कि जो कल तक रेस से बाहर था, वो कोर्ट के एक फैसले से वापस टेंडर जीत लेता है। यह कॉर्पोरेट राइवलरी सिर्फ बिजनेस नहीं है; यह पावर, पॉलिटिक्स और लीगल लूपहोल्स का ऐसा चक्रव्यूह है, जिसे भेदना हर किसी के बस की बात नहीं। क्या आपको लगता है कि दिवालिया कंपनियों की इस नीलामी से देश की अर्थव्यवस्था को फायदा हो रहा है, या यह सिर्फ कुछ बड़े घरानों को और बड़ा बनाने का टूल है? 

भारत के कॉर्पोरेट जगत में माइनिंग और मिनर्ल्स का सेक्टर एक ऐसा अखाड़ा बन चुका है, जहां देश के दो सबसे बड़े संसाधन दिग्गज आमने-सामने हैं। यह लड़ाई सिर्फ एक खदान से कोयला या लोहा निकालने की नहीं है; यह भारत की 'रॉ मटेरियल सप्लाई चेन' और भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर Monopoly स्थापित करने का आर्थिक युद्ध है। 

सतही तौर पर यह सिर्फ टेंडर भरने की प्रक्रिया लगती है, लेकिन इसके पीछे का अर्थशास्त्र बेहद आक्रामक और रणनीतिक है।  भारत सरकार ने जब 2020 में कमर्शियल कोल माइनिंग को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोला, तो सबसे बड़ी टक्कर इन्हीं दो समूहों के बीच देखने को मिली। अडानी भारत का सबसे बड़ा प्राइवेट थर्मल पावर उत्पादक है। इसके साथ ही, उनका पूरा बिजनेस मॉडल 'वर्टिकल इंटीग्रेशन' पर टिका है, Mine से कोयला निकालो, अपनी मालगाड़ी से ढोओ, अपने पोर्ट पर लाओ, और अपने पावर प्लांट में जलाकर बिजली बेचो। 

उनके लिए खदान जीतना बिजली की लागत को न्यूनतम करने की गारंटी है। वेदांता मुख्य रूप से एल्युमिनियम और जिंक बनाती है। एल्युमिनियम उत्पादन एक 'पावर-इंटेंसिव' प्रक्रिया है; यानी इसमें भारी मात्रा में बिजली खर्च होती है। वेदांता को अपने कैप्टिव पावर प्लांट्स सस्ते में चलाने के लिए कैप्टिव कोयला खदानों की सख्त जरूरत है। 

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार, जैसे इंडोनेशिया या ऑस्ट्रेलिया में कोयले की कीमतें आसमान छूती हैं, तो जिनके पास घरेलू खदानें होती हैं, उनका प्रॉफिट मार्जिन कई गुना बढ़ जाता है। इसीलिए दोनों समूहों ने ओडिशा, झारखंड और मध्य प्रदेश के कोल ब्लॉक्स की नीलामी में करोड़ों रुपये की आक्रामक बोलियां लगाईं।

माइनिंग सेक्टर में इन दोनों की सबसे बड़ी राइवलरी तांबे के बाजार में है, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए सबसे महत्वपूर्ण धातु है। 2018 तक वेदांता का 'स्टरलाइट कॉपर' प्लांट, जो तूतीकोरिन, तमिलनाडु में है, भारत का लगभग 40% तांबा उत्पादन करता था। 

पर्यावरण विवादों और हिंसक प्रदर्शनों के बाद इसे बंद कर दिया गया। इसके बंद होते ही भारत जो कभी कॉपर एक्सपोर्टर था, वह कॉपर इम्पोर्टर बन गया। वेदांता के इस वैक्यूम को भरने के लिए अडानी ग्रुप ने 'कच्छ कॉपर लिमिटेड' के जरिए मेगा-एंट्री मारी। अडानी का लक्ष्य दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-लोकेशन कॉपर स्मेल्टर बनाना है।

वेदांता कानूनी लड़ाइयों में उलझकर अपना माइनिंग और स्मेल्टिंग मार्केट शेयर खो रहा है, जबकि अडानी उसी बाजार में भारी पूंजी निवेश करके अपनी मोनोपॉली बना रहा है। यह एक क्लासिक केस है कि कैसे एक कॉर्पोरेट की विफलता दूसरे के लिए बिलियन-डॉलर का अवसर बन जाती है।

वेदांता भारत की सबसे बड़ी एल्युमिनियम उत्पादक कंपनियों में से एक है और ओडिशा इसका मुख्य गढ़ है। लेकिन अब इस किले में अडानी ग्रुप सेंध लगा रहा है। अडानी ग्रुप ने ओडिशा में एल्युमिना रिफाइनरी स्थापित करने के लिए सरकार के साथ एमओयू साइन किया है। एल्युमिनियम बनाने के लिए बॉक्साइट खदानों की जरूरत होती है। 

अब ओडिशा में जब भी बॉक्साइट या आयरन खदानों की नीलामी होती है, तो वेदांता और अडानी के बीच सीधी और महंगी बिडिंग वॉर होती है। वेदांता जमीन से खनिज निकालने में एक्सपर्ट है। अब वो चाहता है कि वे सिर्फ खनिज न बेचें, बल्कि उससे एंड-प्रोडक्ट, जैसे सेमीकंडक्टर या स्टील भी बनाए। अडानी इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स का बादशाह है। 

उसके पास पोर्ट्स और पावर प्लांट्स हैं, अब वो बैकवर्ड इंटीग्रेशन के जरिए रॉ मटेरियल पर भी पूरा कंट्रोल चाहता है, ताकि सप्लाई चेन में किसी तीसरे पक्ष पर निर्भरता शून्य हो जाए। अडानी और वेदांता के बीच माइनिंग सेक्टर की इस जंग का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। एक तरफ इन दोनों के पास इतनी भारी Capital और रिस्क लेने की क्षमता है कि ये भारत को खनिजों के मामले में आत्मनिर्भर बना सकते हैं। 

लेकिन अर्थशास्त्र का एक कड़वा सच यह भी है कि जब माइनिंग जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर में दो-चार बड़े घरानों का ही एकाधिकार हो जाता है, तो भविष्य में कच्चे माल की कीमतें बाजार नहीं, बल्कि ये कॉर्पोरेट्स तय करते हैं। जो भी कंपनी खदानों की नीलामी जीतती है, वह आने वाले 30 से 50 सालों तक उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, वहां के पर्यावरण और वहां की राजनीति को सीधे तौर पर नियंत्रित करती है।

NCLT भारतीय कॉर्पोरेट जगत का वह नया कुरुक्षेत्र है, जहाँ लड़ाई हथियारों से नहीं, बल्कि वकीलों की फौज, स्टे ऑर्डर और Insolvency and Bankruptcy Code के कानूनी लूपहोल्स से लड़ी जाती है। जब हजारों करोड़ की दिवालिया कंपनी की नीलामी होती है, तो हारती हुई कंपनियां सिर्फ पैसा नहीं बढ़ातीं, बल्कि कानूनी दांव-पेंच का ऐसा जाल बुनती हैं कि पूरी प्रक्रिया सालों तक लटक जाती है। 

IBC का नियम कहता है कि एक तय Deadline के भीतर Bids आनी चाहिए, लेकिन जब कोई कंपनी देखती है कि उसका प्रतिद्वंद्वी टेंडर जीत रहा है, तो वह डेडलाइन खत्म होने के बाद NCLT में एक नई और Revised Bid का लिफाफा लगा देती है। उनका वकील कोर्ट में तर्क देता है कि "IBC का मुख्य उद्देश्य बैंकों का ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूलना है, इसलिए हमारी बड़ी बोली स्वीकार की जाए।" इसके जरिए पूरी टेंडर प्रक्रिया को री-ओपन करवा दिया जाता है।

2017 में सरकार ने IBC में 'Section 29A' जोड़ा था, जिसका मकसद था कि जिस प्रमोटर ने कंपनी डुबाई है, वह पिछले दरवाजे से उसे वापस न खरीद ले। कॉर्पोरेट्स इसका इस्तेमाल एक-दूसरे को 'डिसक्वालिफाई' करने के लिए करते हैं। वे NCLT में याचिका लगाते हैं कि जीतने वाली कंपनी का किसी ऐसे व्यक्ति से संबंध है जो 'डिफॉल्टर' है। 

इससे प्रतिद्वंद्वी को अपनी सफाई देने में ही महीनों लग जाते हैं, जैसे एस्सार स्टील मामले में आर्सेलरमित्तल और नुमेटल ने एक-दूसरे पर यही दांव खेला था। दिवालिया कंपनी को किसे बेचना है, इसका अंतिम फैसला बैंकों की कमिटी करती है। सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि CoC की 'व्यावसायिक समझ' सर्वोपरि है। जब कोई कंपनी हारती है, तो वह CoC के 'इवैल्यूएशन मैट्रिक्स' पर सवाल उठाती है। 

वह कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले आती है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं थी और रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल ने भेदभाव किया है। अगर NCLT से कोई फैसला प्रतिद्वंद्वी के पक्ष में आ भी जाए, तो हारने वाली कंपनी तुरंत NCLAT पहुंच जाती है और वहां से स्टे ले आती है। अगर NCLAT भी खिलाफ जाए, तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है। इस 'स्टे ऑर्डर' के खेल में जो कंपनी फाइनेंशियली कमजोर होती है, वह थककर पीछे हट जाती है।

रिलायंस (अंबानी), अडानी पावर, वेदांता और पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन का कंसोर्टियम। छत्तीसगढ़ में स्थित 1920 MW का पावर प्लांट, जिस पर बैंकों का 14,000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज था। इस केस में कानूनी लूपहोल्स का ऐसा इस्तेमाल हुआ, जिसने IBC की पूरी प्रक्रिया का मजाक बना दिया। शुरुआत में वेदांता ने करीब 3,000 करोड़ रुपये की बोली लगाई, लेकिन जैसे ही लगा कि वेदांता जीत सकती है, अडानी पावर ने जनवरी 2024 में 4,101 करोड़ रुपये की बोली लगा दी। 

रिलायंस और PFC कंसोर्टियम ने इसका विरोध किया, लेकिन बैंकों ने 'वैल्यू मैक्सिमाइजेशन' का तर्क देकर अडानी की बोली स्वीकार कर ली और नीलामी फिर से खोल दी। मामला यहीं नहीं रुका। इसके बाद रिलायंस और अन्य कंपनियों ने NCLT का दरवाजा खटखटाया और Auction के तरीकों पर सवाल उठाए। इसके चलते कोर्ट में महीनों तक तारीखें पड़ती रहीं और प्लांट का भविष्य लटका रहा। 

अंततः जब कानूनी दांव-पेंच के बाद ऑक्शन फिर शुरू हुआ, तो अडानी पावर ने 4,101 करोड़ रुपये की अपनी बोली को और आक्रामक करते हुए इसे जीत लिया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में नियम, डेडलाइन और बिडिंग की गरिमा तार-तार हो गई।

जब बड़े घराने NCLT में स्टे ऑर्डर और 'लेट बिडिंग' का खेल खेलते हैं, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था को होता है। जो पावर प्लांट या खदान 6 महीने में चालू होकर बिजली दे सकती थी, वह 3 साल तक कोर्ट के चक्कर में बंद पड़ी रहती है। उसकी मशीनें जंग खा जाती हैं और वैल्यू गिर जाती है।

मुकदमेबाजी के दौरान बैंकों का ब्याज बढ़ता जाता है, लेकिन रिकवरी अमाउंट वहीं रुका रहता है, जिससे अंततः बैंकों और परोक्ष रूप से आम जनता को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। NCLT को इसलिए बनाया गया था, ताकि दिवालिया कंपनियों का 330 दिन के भीतर समाधान हो सके। 

लेकिन कॉर्पोरेट्स ने अपने महंगे वकीलों के जरिए इसे एक ऐसे 'टैक्टिकल बैटलग्राउंड' में बदल दिया है, जहाँ 'स्टे ऑर्डर' ही सबसे बड़ा हथियार है। जब तक IBC में 'लेट बिडिंग' पर सुप्रीम कोर्ट सख्त पाबंदी नहीं लगाता, तब तक ये बिडिंग वॉर इसी तरह अदालतों में उलझते रहेंगे।

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