एक आलीशान और भव्य महल, जिसके एक-एक झूमर की कीमत करोड़ों में है। देश-विदेश में फैली करीब 40,000 करोड़ रुपये की अकूत संपत्ति, और भारत की राजनीति का एक ऐसा रसूखदार नाम, जो दशकों से सत्ता के केंद्र में रहा है। लेकिन इसी शाही चमक-दमक के पीछे पिछले 16 साल से एक ऐसी कानूनी जंग चल रही थी, जिसने अदालतों के गलियारों से लेकर अखबारों के पन्नों तक को हिलाकर रख दिया था। अब इस हजारों करोड़ की जंग से भरी कहानी में एक ऐसा मोड़ आया है। बुआ और भतीजे के बीच ठनी इस जंग की असली जड़ क्या थी? और अब किस आधार पर इस ऐतिहासिक विवाद का अंत हो रहा है? आज मैं इस पूरे घटनाक्रम की इनसाइड स्टोरी को आपके सामने ला रहा हूं।
इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें उस बुनियादी टकराव को समझना होगा, जहां एक तरफ भारत का आधुनिक कानून खड़ा था और दूसरी तरफ सदियों पुरानी राजशाही परंपराएं हैं। दरअसल, ग्वालियर के इस पूर्व राजघराने में सालों से यह माना जाता रहा कि संपत्ति का मुख्य वारिस और मालिकाना हक परिवार के बेटे या पोते के पास ही रहेगा, लेकिन साल 2010 में यह सदियों पुरानी परंपरा देश की अदालत के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया की तीन बुआओं—यानी राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, यशोधरा राजे सिंधिया और ऊषा राजे सिंधिया ने जिला अदालत का रुख किया। बुआओं का सीधा और साफ कानूनी तर्क था कि देश के हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत, पिता की पैतृक संपत्ति पर बेटों की ही तरह बेटियों का भी बिल्कुल बराबर का वैधानिक अधिकार है। तो दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का पक्ष था कि पारंपरिक नियमों और पूर्व के घटनाक्रमों के अनुसार, वे ही इस पूरी विरासत के एकमात्र असली हकदार हैं। बस इसी एक कानूनी और वैचारिक मतभेद ने उस मुकदमे को जन्म दिया, जिसने एक ही खून के रिश्तों को अदालत में आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया।
यह कहानी शुरू होती है उस दिन से, जब ग्वालियर नरेश जीवाजी राव सिंधिया इस दुनिया से विदा हुए। जीवाजी का बेटा माधवराव सिंधिया तब केवल सोलह साल का था। उसी दिन एक शख्स राजमहल की दहलीज़ पर वापस लौटा, जिसे पहले बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका था। नाम था सरदार संभाजीराव अंग्रे। यह वही शख्स था, जिसके पिता को एक ज़माने में महाराज जीवाजी राव ने खुद महल से निकाला था, लेकिन उस दिन से संभाजी ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया के जीवन पर ऐसी पकड़ बनाई कि वे कभी नहीं छूटे। माधवराव ऑक्सफोर्ड पढ़ने चले गए। संभाजी ने इधर राजमाता को जनसंघ की राजनीति में उतार दिया। जब इंदिरा गांधी के आपातकाल में विजयाराजे को खतरा था, तब माधवराव ने नेपाल से माँ को बुलाया, लेकिन संभाजी ने राजमाता के कान में यही डाला कि बेटे ने माँ को नहीं, अपनी कायरता को बचाने के लिए बुलाया है। विजयाराजे ने खुद को बचाने के लिए नेपाल भाग जाने के बजाए जेल जाना स्वीकार किया। तब संभाजी ही विजयाराजे के सबसे खास सलाहकार थे। संभाजी की चालों से धीरे-धीरे माँ और बेटे के बीच खाई इतनी गहरी हो गई कि माधवराव ने 1979 में कांग्रेस जॉइन कर ली, वही कांग्रेस जिसने उनकी माँ को जेल भेजा था। यह राजमाता के लिए किसी घाव से कम नहीं था, लेकिन संभाजी ने उस घाव को भरने नहीं दिया।
सितंबर 1985 में राजमाता ने एक हस्तलिखित वसीयत बनाई। इस वसीयत में उन्होंने अपने बेटे माधवराव सिंधिया और पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया को संपत्ति से पूरी तरह बेदखल कर दिया। वसीयत में लिखा था कि संपत्ति का दो-तिहाई हिस्सा उनकी बेटियों को मिलेगा और एक-तिहाई एक ट्रस्ट को। यहाँ तक कि उन्होंने यह भी लिखा कि उनके अंतिम संस्कार का अधिकार भी माधवराव को नहीं, बल्कि संभाजीराव अंग्रे जैसे विश्वस्त लोगों को होगा। यह वसीयत उस समय किसी को पता नहीं थी। यह एक राज़ था, जो वर्षों तक दफन रहा। जनवरी 2001 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस दुनिया से विदा हुईं। उनके जाते ही संभाजीराव ने वो हस्तलिखित वसीयत सार्वजनिक कर दी। इससे पूरा सिंधिया परिवार हिल गया। माधवराव ने इस वसीयत को अदालत में चुनौती दी। उन्होंने ज्येष्ठाधिकार परंपरा के आधार पर समस्त संपत्ति पर अपना दावा ठोक दिया, लेकिन इससे पहले कि यह लड़ाई कोई निर्णायक मोड़ लेती, सितंबर 2001 में विमान हादसे में माधवराव सिंधिया का निधन हो गया और पूरी लड़ाई उनके बेटे ज्योतिरादित्य के कंधों पर आ गई। ज्योतिरादित्य ने अपने पिता का रास्ता अपनाया। उन्होंने ग्वालियर की अदालत में दावा किया कि रियासत के उत्तराधिकार की परंपरा के अनुसार वे ही इस पूरी संपत्ति के एकमात्र वारिस हैं। दूसरी तरफ उनकी बुआएँ, उषा राजे, वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे खड़ी थीं। उनका तर्क था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार बेटियों का भी अपने पिता की संपत्ति में समान अधिकार है। यहाँ रियासती परंपरा का आधुनिक कानून से, और ज्येष्ठाधिकार का महिला अधिकार से टकराव था। इसी दौरान संभाजीराव की भी मौत हो गई। फिर 2010 में तीनों बहनें भी कोर्ट में चली गईं।
अगर हम पिछले 16 सालों के पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें, तो यह कानूनी लड़ाई किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं रही। साल 2010 में जब तीनों बुआओं ने जिला न्यायालय में अपना दावा पेश कर अपने कानूनी हिस्से की मांग की, तो उसी दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से भी एक अलग वाद दायर कर दिया गया। दोनों ही पक्षों के मुकदमे जिला अदालत में सालों तक चलते रहे। वकील दलीलें देते रहे, तारीखें आगे बढ़ती रहीं और यह पारिवारिक खाई और चौड़ी होती गई। देखते ही देखते साल 2017 आ गया और यह मामला जिला अदालत से निकलकर सीधे ग्वालियर हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच गया। हाईकोर्ट में 'सिविल रिवीजन' के तहत इस पर नए सिरे से सुनवाई शुरू हुई। दोनों ही पक्ष कानूनी रूप से बेहद मजबूत थे और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था, लेकिन अदालत भी जानती थी कि यह सिर्फ जमीन-जायदाद की लड़ाई नहीं है, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित परिवारों में से एक की प्रतिष्ठा का सवाल है। इसीलिए अदालत की देखरेख में दोनों पक्षों के बीच कोर्ट से बाहर आपसी सहमति बनाने के प्रयास तेज किए गए और आखिरकार हाईकोर्ट ने इस राजीनामे की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए दोनों पक्षों को तीन महीने का एक निश्चित समय दे दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से बिचौलिये की फीस भी जमा करा दी गई, लेकिन इससे पहले की विवाद निपटने की तरफ बढ़ता, कानूनी बिचौदिये की मौत हो गई। फिर मार्च 2020 में एक ऐसा बदलाव आया, जिसने इस पूरे विवाद की दिशा ही बदल दी। कोविड का पहला दौर शुरू हुआ था और कांग्रेस की मध्यप्रदेश सरकार हिल रही थी। 10 मार्च को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर दी और अगले ही दिन 11 मार्च 2020 को भाजपा जॉइन कर ली। जो परिवार दशकों से दो अलग-अलग दलों में बँटा था, वह पहली बार एक ही पार्टी की छत के नीचे आ गया। वसुंधरा राजे भाजपा में, यशोधरा राजे भाजपा में, और अब ज्योतिरादित्य भी भाजपा में। भाजपा के बड़े नेता अमित शाह को 16 अक्टुबर 2022 को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर के 'जय विलास पैलेस' में डिनर कराया। कहते हैं कि अमित शाह ने ही इस राजनीतिक परिवार के मेल-मिलाप और समझौते की ज़मीन तैयार की है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस पूरी जंग में दांव पर क्या लगा था? ऐसी कौन सी चीजें थीं, जिसके लिए देश के इतने बड़े दिग्गज दशकों से अलग थे और 16 साल तक कानूनी दांव-पेंच लड़ते रहे? एक ऐसा साम्राज्य, जिसकी आज की तारीख में करीब 40,000 करोड़ रुपये कीमत है। इस विशाल संपत्ति में सिर्फ जमीनें नहीं, बल्कि भारत की ऐतिहासिक विरासत शामिल है। इसमें सबसे ऊपर नाम आता है ग्वालियर के भव्य और ऐतिहासिक 'जय विलास पैलेस' का, जो अपनी वास्तुकला और दुनिया के सबसे विशालकाय झूमरों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा शिवपुरी में स्थित 'माधव विलास पैलेस', 'हैप्पी विलास' और 'जॉर्ज कैसल' जैसी ऐतिहासिक इमारतें भी इसी विवाद का हिस्सा हैं। यही नहीं, उज्जैन का प्रसिद्ध 'कालियादेह पैलेस' और देश की राजधानी दिल्ली के सबसे महंगे इलाके में स्थित 'ग्वालियर हाउस' और 'सिंधिया विला' जैसी बेशकीमती संपत्तियां भी इस कानूनी लड़ाई के दायरे में हैं। इन विशाल महलों और अरबों की जमीनों पर मालिकाना हक की जंग ही इस पूरे विवाद का मुख्य केंद्र बिंदु है।
सालों तक चली इस लंबी और थका देने वाली कानूनी खींचतान के बाद, आखिरकार वो ऐतिहासिक मोड़ आ ही गया, जिसका इंतजार हर कोई कर रहा था। इस महा-विवाद का अंत किसी अदालती फैसले, किसी की जीत या किसी की हार से नहीं हो रहा है, बल्कि इसका आधार बना है 'आपसी सहमति और राजीनामा'। दोनों ही पक्षों ने बेहद समझदारी और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इस 16 साल पुराने विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला कर लिया है। हाल ही में दोनों पक्षों के बीच आपसी रजामंदी से तैयार किया गया पूरा समझौता पत्र, यानी सेटलमेंट डीड जिला अदालत में प्रस्तुत कर दिया गया है। आने वाली 8 जुलाई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में दोनों पक्षों की औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई जाएगी, जिसके बाद इस समझौते पर अदालत की अंतिम मुहर लग जाएगी और औपचारिक पुष्टि की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
इस ऐतिहासिक फैसले ने एक बात साफ कर दी है कि जब बात परिवार की गरिमा, मान-सम्मान और परंपराओं की हो, तो अदालती लड़ाइयों से बेहतर आपस में बैठकर रास्ते निकालना होता है। इस समझौते के बाद न सिर्फ कोर्ट में सालों से लंबित एक बड़ा मामला हमेशा के लिए शांत हो जाएगा, बल्कि देश की राजनीति के इन बड़े चेहरों के बीच पारिवारिक रिश्तों की एक नई शुरुआत भी होगी। यह थी सिंधिया परिवार के 40,000 करोड़ रुपये के संपत्ति विवाद की पूरी कहानी। आपको क्या लगता है, क्या राजघरानों के ऐसे मामलों में आधुनिक कानून और बेटियों के अधिकारों को परंपराओं से ऊपर रखना एक सही कदम है?

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